संपादकीय: मुसलमानों की सियासी दशा, दिशा और आत्ममंथन की ज़रूरत
मुस्लिम नाउ संपादकीय
आजमगढ़ में एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के इस बयान के बाद कि “हमें गांधी या नेहरू की जरूरत नहीं है, हमें अपने नेताओं की जरूरत है”, क्या ऐसा नहीं लगता कि देश के मुसलमानों के बीच भी कुछ ऐसे ‘कॉकरोचों’ की जरूरत है, जो सड़कों पर उतरकर मुसलमानों के मुद्दे उठाने के बजाय राजनीतिक मंचों और सोशल मीडिया के जरिए उन्हें लगातार बरगलाने और भड़काने वालों के खिलाफ मोर्चा खोल सकें? पंजाब के शाही इमाम तो इस मामले में एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का खुलेआम नाम लेकर सवाल उठाते रहे हैं।
फिलहाल एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) के तहत करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम काटे जाने के मुद्दे पर कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी पार्टियां सड़कों पर हैं। वे मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग कर रही हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी शिकायतें भी सामने आई हैं कि एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। खुद इन पंक्तियों के लेखक, उनकी पत्नी और एक बेटे का नाम भी मतदाता सूची से हटा दिया गया है।
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वरिष्ठ पत्रकार श्याम लाल यादव ने इंडियन एक्सप्रेस के एक कार्यक्रम में आरएसएस की रणनीति और मंशा को लेकर यह बात कही थी कि संघ मुसलमानों को सत्ता से बाहर रखना चाहता है। इसी विचारधारा को आगे बढ़ाने के आरोप भारतीय जनता पार्टी पर भी लगते रहे हैं। पार्टी पर यह सवाल भी उठता रहा है कि वह मुसलमानों को चुनाव में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं देती और उन्हें अपने मंत्रिमंडल में भी जगह देने से परहेज करती है।
आरोप यह भी हैं कि परिसीमन, अनुच्छेद 370 जैसे संवैधानिक मुद्दों और चुनावी मैदान में मुस्लिम उम्मीदवारों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की रणनीति के जरिए मुस्लिम राजनीतिक ताकत को कमजोर किया जा रहा है। हाल के असम उपचुनाव में भी मुस्लिम बहुल सीट पर भाजपा के हिंदू उम्मीदवार की जीत को इसी संदर्भ में देखा गया। यदि सदन के भीतर और बाहर मुसलमानों की राजनीतिक ताकत कमजोर होती गई, तो देश के लोकतांत्रिक ढांचे में उनकी आवाज और प्रभाव दोनों सीमित हो सकते हैं। करीब 25 करोड़ की आबादी वाला समुदाय अपनी लड़ाई खुद लड़ने के बजाय दूसरों की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर होने को मजबूर हो सकता है।
एआईएमआईएम पर लंबे समय से भाजपा की ‘बी टीम’ होने के आरोप लगते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि ओवैसी की पार्टी अक्सर उन सीटों पर उम्मीदवार उतारती है, जहां मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में होती है और उसके मैदान में उतरने से भाजपा विरोधी उम्मीदवारों के वोट बंटने की आशंका पैदा होती है। इसी तरह के आरोप असम के नेता बदरुद्दीन अजमल और कुछ अन्य क्षेत्रीय नेताओं पर भी लगते रहे हैं। हालांकि, इन आरोपों को राजनीतिक आरोपों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
अब ओवैसी के खिलाफ मुस्लिम समाज के कुछ वर्ग खुलकर आवाज उठाने लगे हैं। पंजाब के शाही इमाम उनमें से एक हैं। इसके अलावा पसमांदा, सूफी, चिश्ती, मदनी, इलियासी और बरेलवी पहचान वाले कुछ मुस्लिम चेहरे भी ऐसे हैं, जिनकी भूमिका पर सवाल उठाए जाते रहे हैं। आलोचकों का आरोप है कि ये चेहरे मुसलमानों के बुनियादी मुद्दों पर सड़क पर संघर्ष करते हुए कम दिखाई देते हैं, लेकिन जब मुस्लिम समुदाय सरकार के प्रति नाराजगी जाहिर करता है, तो वे सरकार के बचाव में खड़े हो जाते हैं।
ताजा मामला एसआईआर का ही है। जब देश के विभिन्न हिस्सों में इसके खिलाफ आंदोलन हो रहे हैं, तब ओवैसी जैसे नेता यह कहकर इनसे दूरी बनाते नजर आते हैं कि “दूल्हा बिन बुलाए नहीं जाता।” नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के खिलाफ हुए आंदोलनों का परिणाम हम देख चुके हैं। उन आंदोलनों में सक्रिय रहे कई लोगों को जेल जाना पड़ा और कुछ अब भी कानूनी लड़ाइयां लड़ रहे हैं।
"We no longer need a Gandhi or a Nehru; we need our own leaders" says AIMIM chief Asaduddin Owaisi in Azamgarh, UP. Urging Muslims to build their own political leadership, Owaisi says: "They say, ‘Support them’. I say, ‘You become the leader" https://t.co/8eg3qYdUJW
— Nabila Jamal (@nabilajamal_) October 11, 2026
लेकिन सवाल यह है कि ऐसी दलीलें देने वाले नेता खुद मुसलमानों के पक्ष में सड़क पर कब उतरे? यदि उन्हें दूसरी पार्टियों के साथ आंदोलन में शामिल होने में आपत्ति है, तो वे अपने ही बैनर तले मुसलमानों के हक-हकूक के लिए लोगों को संगठित क्यों नहीं करते? आंदोलन से दूरी बनाने के बावजूद आजमगढ़ में मुसलमानों को यह संदेश देना कि अब उन्हें गांधी या नेहरू की जरूरत नहीं, बल्कि अपने नेताओं की जरूरत है, आखिर किस राजनीति का हिस्सा है? उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे समय में इस बयान को चुनावी राजनीति से अलग करके कैसे देखा जा सकता है?
देश में मुसलमानों की आबादी करीब 25 करोड़ मानी जाती है। इनमें बड़ी संख्या में मतदाता हैं। क्या ओवैसी जैसे कानून के जानकार नेता यह नहीं समझते कि भारत जैसे विविधतापूर्ण लोकतंत्र में कोई भी समुदाय दूसरे समुदायों के सहयोग और समर्थन के बिना अपनी राजनीतिक ताकत को लंबे समय तक मजबूत नहीं रख सकता? इसके बावजूद आजमगढ़ की सभा में मुसलमानों को मौलाना जौहर अली और मौलवी इस्माइल बनने की सलाह देने के पीछे क्या संदेश है?
जब तक मुसलमान धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के साथ मिलकर लोकतांत्रिक राजनीति में भाग लेते रहे, उनकी राजनीतिक ताकत बनी रही। आज भी संसद और विधानसभाओं में मौजूद अनेक मुस्लिम जनप्रतिनिधियों की जीत में धर्मनिरपेक्ष दलों और विभिन्न समुदायों के मतदाताओं का योगदान है। लोकतंत्र की यही खूबी है कि अलग-अलग धर्मों, जातियों और समुदायों के लोग मिलकर राजनीतिक बदलाव ला सकते हैं।
इसके विपरीत, पिछले बारह-तेरह वर्षों में भाजपा सरकार के दौर में यूसीसी, एनआरसी, तीन तलाक कानून, वक्फ कानून और अनुच्छेद 370 को लेकर हुए फैसलों पर मुस्लिम समुदाय के भीतर व्यापक बहस और विरोध देखने को मिला है। आलोचकों का आरोप है कि मुस्लिम समाज की एकजुटता कमजोर करने के लिए सूफी-हनफी, पसमांदा-अशराफ और शिया-सुन्नी जैसे विभाजनों को राजनीतिक विमर्श में उभारा जाता है। ऐसे माहौल में ओवैसी का धर्मनिरपेक्ष दलों के साथ मिलकर मुस्लिम विरोधी समझी जाने वाली राजनीतिक ताकतों को हराने की रणनीति अपनाने के बजाय मुसलमानों को अलग राजनीतिक राह पर चलने की सलाह देना गंभीर सवाल खड़े करता है।
इसलिए अब समय आ गया है कि मुस्लिम समाज के भीतर भी ऐसे लोग सामने आएं, जो समुदाय के नाम पर राजनीति करने वालों से जवाब मांगें। यहां ‘कॉकरोच’ शब्द का इस्तेमाल उन अवसरवादी तत्वों के लिए किया गया है, जो कथित तौर पर समुदाय के हितों की आड़ में अपनी राजनीतिक दुकान चलाते हैं। इन लोगों को सियासी और इस्लामी संस्थानों में मिलने वाली जवाबदेही से बचने नहीं दिया जाना चाहिए। हालांकि, किसी भी व्यक्ति या समूह का विरोध तर्क, तथ्यों और लोकतांत्रिक तरीके से होना चाहिए।
मुसलमानों के हक-हकूक की बात करने वाले हर नेता से यह पूछा जाना चाहिए कि उसने समुदाय के लिए जमीन पर क्या काम किया, किन मुद्दों पर संघर्ष किया और मुश्किल वक्त में उसके साथ कितना खड़ा रहा। जो लोग रात के अंधेरे में या बंद कमरों में मुस्लिम विरोधी चेहरों के साथ गलबहियां करते दिखाई देते हैं और सार्वजनिक मंचों पर मुसलमानों के अधिकारों की बात करते हैं, उनकी राजनीति की भी निष्पक्ष पड़ताल होनी चाहिए।
मुस्लिम समाज को ऐसे नेताओं और स्वयंभू रहनुमाओं की पहचान करनी होगी, जो उसके नाम पर सौदेबाजी करते हैं। जितनी जल्दी जवाबदेही की यह प्रक्रिया शुरू होगी, उतनी ही जल्दी समुदाय अपनी राजनीतिक दिशा और प्राथमिकताएं तय कर सकेगा। देरी का नुकसान केवल किसी एक पार्टी या नेता को नहीं, बल्कि पूरे समुदाय को उठाना पड़ सकता है।

