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दहेज की नुमाइश या समाज को बर्बादी का संदेश? गाजियाबाद की करोड़ों वाली शादी और पसमांदा सियासत का दोहरा चेहरा

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश

राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद में हाल ही में एक ऐसी शादी हुई जिसने न केवल सोशल मीडिया पर सुर्खियां बटोरीं बल्कि समाज के सामने कई गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। यह शादी उन लोगों के लिए एक कड़वा सबक है जो आज के दौर में भी मुसलमानों के बीच ऊंच-नीच और जात-पात की सियासत कर रहे हैं। गाजियाबाद का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। इसमें दहेज की ऐसी नुमाइश की गई जिसे देखकर आम आदमी के होश उड़ गए।

इस वीडियो में एक शख्स अपने नए दामाद को एक करोड़ एक लाख ग्यारह हजार रुपये नकद दे रहा है। इतना ही नहीं साथ में एक चमचमाती बीएमडब्ल्यू कार भी दी गई। तोहफों का सिलसिला यहीं नहीं थमा। दुल्हन को हीरे के 11 जेवरात, सोने के 42 और चांदी के 18 जेवरात दिए गए। कुल मिलाकर यह दहेज कई करोड़ रुपये का बैठता है। यह शादी किसी बड़े रसूखदार राजनीतिक परिवार की नहीं थी। यह शादी मंसूरी बिरादरी के एक परिवार की थी। इस बिरादरी का पारंपरिक काम रुई धुनने का रहा है।

दहेज का जहर और समाज पर दबाव

इस वीडियो के वायरल होने के बाद समाज में दो तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक तरफ वो लोग हैं जो इस अमीरी की नुमाइश को कामयाबी मान रहे हैं। दूसरी तरफ वो समझदार तबका है जो इसे समाज के लिए एक बड़ा खतरा मान रहा है। दहेज का यह जहर अब मुसलमानों में इस कदर फैल चुका है कि चाहे कोई गरीब हो या अमीर हर कोई इसकी चपेट में है।

जब कोई शख्स सार्वजनिक तौर पर करोड़ों का दहेज देता है तो इसका सीधा असर उस गरीब पिता पर पड़ता है जिसकी आमदनी कम है। समाज में एक ऐसा आर्थिक और मानसिक दबाव बनता है जिससे गरीब बेटियों की शादी होना मुश्किल हो जाता है। लोग अपनी हैसियत से बाहर जाकर कर्ज लेते हैं। दिखावे की इस होड़ में कई परिवार पूरी तरह बर्बाद हो जाते हैं। गाजियाबाद की यह शादी उन लोगों के हौसले बुलंद करेगी जो शादी को एक व्यापार की तरह देखते हैं।

मंसूरी बिरादरी: इतिहास और आज की हकीकत

मंसूरी बिरादरी मुख्य रूप से भारत और पाकिस्तान के सुन्नी मुस्लिम समुदाय का हिस्सा है। ऐतिहासिक तौर पर इन्हें रुई धुनने वाले यानी दुनिया या पिंजारा के रूप में जाना जाता है। इस समुदाय का नाम मशहूर सूफी संत ख्वाजा मंसूर अल-हल्लाज के नाम पर पड़ा है। मंसूरी बिरादरी को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा माना जाता है। इसी कारण इन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी की श्रेणी में रखा गया है।

पुराने समय में इनका मुख्य पेशा हाथ से रुई साफ करना और रजाई-गद्दे बनाना था। लेकिन मशीनीकरण के दौर ने इनके पारंपरिक काम को काफी प्रभावित किया। इसके बाद इस समुदाय के लोगों ने कड़ी मेहनत की। आज मंसूरी बिरादरी के लोग व्यापार, इंजीनियरिंग, प्रशासन और शिक्षा के क्षेत्र में काफी आगे निकल चुके हैं। गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार में इनकी अच्छी-खासी आबादी है। यह बिरादरी 100 फीसदी मुस्लिम है और सुन्नी हनफी विचारधारा को मानती है।

पसमांदा सियासत की खामोशी पर सवाल

मंसूरी बिरादरी के इस मामले ने एक और बड़े मुद्दे को जन्म दिया है। वह है देश में चल रही पसमांदा राजनीति। आजकल कुछ लोग मुसलमानों के बीच पिछड़ेपन को मुद्दा बनाकर अशराफ और अरजाल की सियासत कर रहे हैं। दावा किया जाता है कि पिछड़े वर्ग के मुसलमानों के साथ भेदभाव हो रहा है। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि गाजियाबाद की इस शादी पर पसमांदा राजनीति करने वाले बड़े नेताओं की बोलती बंद है।

मंसूरी बिरादरी खुद एक पिछड़ा वर्ग है। जिस समुदाय के हक की लड़ाई लड़ने का दावा नेता करते हैं अगर वही समुदाय दहेज जैसी कुरीतियों में लिप्त है तो नेता खामोश क्यों हैं? दरअसल इसके पीछे वोट बैंक की गणित छिपी है। अगर ये नेता इस तरह की शादियों का विरोध करेंगे तो वे अपने ही समर्थकों को नाराज कर बैठेंगे। अपनी राजनीति बचाने के चक्कर में ये लोग समाज को अंदर से खोखला कर रहे दहेज के दानव पर चुप हैं। यह खामोशी उन नेताओं की पोल खोलती है जो सिर्फ सत्ता के लिए पिछड़ेपन का कार्ड खेलते हैं।

मेवात से गाजियाबाद तक एक जैसी बीमारी

दहेज की यह बीमारी सिर्फ गाजियाबाद या शहरों तक सीमित नहीं है। आर्थिक रूप से बेहद पिछड़े माने जाने वाले मेवात के इलाके में भी यही हाल है। हाल के दिनों में मेवात में कई महापंचायतें हुईं। वहां के बड़े बुजुर्गों ने कसम खाई कि वे दहेज नहीं लेंगे और न ही फिजूलखर्ची करेंगे। लेकिन जमीन पर कोई बदलाव नहीं दिखा। मेवात जैसे पिछड़े इलाके में भी शादियों में बड़ी रकम और गाड़ियों की डिमांड बढ़ती जा रही है।

गाजियाबाद की इस शादी ने यह साबित कर दिया है कि पैसा आने के बाद लोग अपनी जड़ों और समाज की मजबूरियों को भूल जाते हैं। रुई धुनने का काम करने वाले पूर्वजों की संतानें जब करोड़ों का दिखावा करती हैं तो वे भूल जाती हैं कि उनके समुदाय के हजारों लोग आज भी दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

दिखावे की संस्कृति और इस्लाम की तालीम

इस्लाम धर्म में निकाह को बहुत सादा और आसान बनाने की बात कही गई है। हदीसों के मुताबिक सबसे बेहतरीन निकाह वह है जिसमें कम से कम खर्च हो। लेकिन आज के दौर में मुसलमानों ने शादी को सबसे महंगा आयोजन बना दिया है। खर्चीले वलीमे, आलीशान पंडाल और फिर करोड़ों का दहेज। यह सब इस्लाम की मूल शिक्षाओं के बिल्कुल उलट है।

गाजियाबाद के इस वायरल वीडियो में जिस तरह से नोटों की गड्डियां दिखाई जा रही हैं वह एक तरह का अहंकार है। यह उन लोगों का मजाक उड़ाने जैसा है जो अपनी बेटी के हाथ पीले करने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। इस तरह के प्रदर्शन से समाज में नफरत और जलन की भावना पैदा होती है।

निष्कर्ष: बदलाव की जरूरत कहां है?

एक वरिष्ठ पत्रकार के तौर पर मेरा मानना है कि समाज को अब जागने की जरूरत है। अगर हम आज इस तरह के प्रदर्शनों पर चुप रहे तो आने वाली पीढ़ियों के लिए शादी एक बोझ बन जाएगी। मुसलमानों को यह समझना होगा कि उनकी असल पहचान उनके नैतिक मूल्यों से है न कि बीएमडब्ल्यू कार या करोड़ों के जेवरात से।

पसमांदा आंदोलन चलाने वालों को भी अपनी नीयत साफ करनी होगी। उन्हें सिर्फ राजनीतिक रोटियां नहीं सेंकनी चाहिए बल्कि समाज में मौजूद बुराइयों के खिलाफ भी खड़ा होना चाहिए। अगर हम अपनी ही बिरादरी के गलत कामों पर पर्दा डालेंगे तो हम कभी तरक्की नहीं कर पाएंगे।

गाजियाबाद की यह शादी हमें आइना दिखा रही है। यह आइना हमें बताता है कि हमने तरक्की तो कर ली है लेकिन हमारे संस्कार कहीं पीछे छूट गए हैं। अब समय आ गया है कि समाज के उलेमा, बुद्धिजीवी और युवा मिलकर इस दहेज प्रथा के खिलाफ एक मजबूत अभियान छेड़ें। वरना यह करोड़ों की शादियां एक दिन पूरे कौम के भविष्य को गरीबी और कर्ज के दलदल में धकेल देंगी।

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