शांति का बड़ा दांव: क्या पाकिस्तान करा पाएगा अमेरिका और ईरान में सुलह? खाड़ी देशों के दौरे पर निकले शहबाज शरीफ
मुख्य अंश:
- शहबाज शरीफ और मोहम्मद बिन सलमान के बीच रियाद में मुलाकात।
- अमेरिका-ईरान वार्ता के दूसरे दौर के लिए पाकिस्तान की कूटनीतिक कोशिश।
- सऊदी अरब ने पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर की नई मदद दी।
- ईरान की रेड सी में व्यापार रोकने की धमकी से दुनिया में खौफ।
- इस्लामाबाद में दोबारा मिल सकते हैं अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि।
रियाद | मुस्लिम नाउ ब्यूरो
दुनिया की राजनीति इस समय एक बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ी है। मध्य पूर्व के रेगिस्तान से उठने वाली युद्ध की चिंगारी पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लेने को बेताब है। ऐसे माहौल में पाकिस्तान अपनी किस्मत और छवि दोनों को बदलने के एक बड़े मिशन पर निकल पड़ा है। पाकिस्तान की कोशिश है कि वह अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी खूनी संघर्ष को रोकने के लिए मुख्य मध्यस्थ की भूमिका निभाए। इसी सिलसिले में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ बुधवार को सऊदी अरब पहुंचे और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ लंबी बातचीत की।

पुरानी छवि को धोने की कोशिश पाकिस्तान पिछले करीब डेढ़ दशक से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हाशिए पर रहा है। उस पर आतंकवाद को पनाह देने के आरोप लगते रहे हैं। अब इस्लामाबाद इस ठप्पे को मिटाना चाहता है। वह दुनिया को दिखाना चाहता है कि वह अशांति नहीं बल्कि शांति फैलाने वाला मुल्क है। अगर पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच समझौता कराने में कामयाब होता है, तो यह कूटनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी जीत होगी। इससे न केवल उसका अंतरराष्ट्रीय रसूख बढ़ेगा, बल्कि उन देशों को भी करारा जवाब मिलेगा जो उसे केवल समस्याओं के नजरिए से देखते हैं।

शहबाज शरीफ का चार दिवसीय दौरा सऊदी अरब की यात्रा शहबाज शरीफ के चार दिवसीय कूटनीतिक दौरे का पहला हिस्सा है। वह सऊदी अरब के बाद कतर और तुर्किये भी जाएंगे। प्रधानमंत्री के साथ एक उच्च स्तरीय दल है। इसमें विदेश मंत्री इशाक डार भी शामिल हैं। डार ने हाल ही में इस्लामाबाद में हुई पहली दौर की बातचीत में मध्यस्थ के तौर पर बड़ी भूमिका निभाई थी। सऊदी प्रेस एजेंसी ने एक वीडियो जारी किया है। इसमें शहबाज शरीफ और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को गंभीरता से चर्चा करते देखा जा सकता है। इस दौरान सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान भी मौजूद रहे।
इस्लामाबाद बनी शांति वार्ता का केंद्र पिछले हफ्ते के अंत में इस्लामाबाद में दशकों बाद अमेरिका और ईरान के बीच आमने-सामने की बातचीत हुई। हालांकि उस बातचीत में कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। इसके बावजूद उम्मीद की किरण बाकी है। व्हाइट हाउस के प्रवक्ता ने संकेत दिए हैं कि बातचीत का सिलसिला जारी रहेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कहा है कि इस हफ्ते इस्लामाबाद में दोबारा बातचीत शुरू हो सकती है। यही वजह है कि शहबाज शरीफ दूसरे दौर की वार्ता से पहले खाड़ी देशों का माहौल अपने पक्ष में करने के लिए निकल पड़े हैं।
युद्ध की तपिश और रेड सी का खतरा क्षेत्र में जमीनी हालात अब भी डरावने हैं। 28 फरवरी को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया था, तब से ही जंग जारी है। ईरान ने अब धमकी दी है कि अगर अमेरिका ने उसकी बंदरगाहों की नाकेबंदी नहीं हटाई, तो वह रेड सी और ओमान की खाड़ी के व्यापारिक रास्ते बंद कर देगा। अगर ऐसा होता है, तो दुनिया भर की अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी। वहीं दूसरी तरफ इजरायल ने लेबनान पर हमले तेज कर दिए हैं। हाल ही में दक्षिण लेबनान के मयफदौन शहर में चार पैरामेडिक्स की मौत हो गई। ये लोग एक आपातकालीन मिशन पर थे। इस हिंसा ने शांति वार्ता की कोशिशों को और मुश्किल बना दिया है।

आर्थिक मोर्चे पर मिली बड़ी राहत शहबाज शरीफ का यह दौरा कूटनीति के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के लिए भी अच्छा रहा। सऊदी अरब ने पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर की नई मदद देने का ऐलान किया है। इससे पाकिस्तान के गिरते विदेशी मुद्रा भंडार को सहारा मिलेगा। इसके अलावा सऊदी अरब ने अपने पुराने 5 अरब डॉलर के डिपॉजिट की अवधि भी बढ़ा दी है। यह पाकिस्तान के लिए बड़ी कामयाबी है। इससे पता चलता है कि मुश्किल वक्त में सऊदी अरब अब भी पाकिस्तान के साथ खड़ा है।
आगे की राह: तुर्किये और कतर का रुख सऊदी अरब के बाद शहबाज शरीफ कतर जाएंगे। कतर पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों में अहम भूमिका निभा चुका है। इसके बाद वह तुर्किये जाएंगे। वहां वह ‘अंताल्या डिप्लोमेसी फोरम’ में हिस्सा लेंगे। तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन के साथ उनकी मुलाकात काफी अहम मानी जा रही है। तुर्किये का ईरान और पश्चिमी देशों, दोनों के साथ अच्छा तालमेल है। पाकिस्तान चाहता है कि ये सभी मुस्लिम देश एकजुट होकर अमेरिका और ईरान को युद्ध खत्म करने के लिए राजी करें।
क्या सफल होगा पाकिस्तान का मिशन? यह रास्ता कांटों भरा है। अमेरिका के भीतर भी इस युद्ध को लेकर राजनीति गर्म है। अमेरिकी सीनेट में डेमोक्रेट्स ने युद्ध रोकने के लिए एक प्रस्ताव लाया था। लेकिन सीनेट ने इसे खारिज कर दिया। इसका मतलब है कि अमेरिकी प्रशासन को अभी भी सैन्य कार्रवाई के लिए कांग्रेस की पूरी हरी झंडी की जरूरत नहीं है।
पाकिस्तान के सेना प्रमुख का दल भी ईरान के अधिकारियों से बातचीत कर चुका है। कोशिश यही है कि किसी भी तरह से एक स्थायी युद्धविराम हो जाए। फिलहाल अगले हफ्ते तक के लिए एक कमजोर सा युद्धविराम लागू है। दुनिया की निगाहें अब अगले हफ्ते इस्लामाबाद में होने वाली संभावित बैठक पर टिकी हैं।
पाकिस्तान के लिए यह केवल एक समझौता नहीं है। यह उसकी पहचान बदलने की लड़ाई है। अगर शहबाज शरीफ इस मिशन में कामयाब होते हैं, तो पाकिस्तान का नाम इतिहास में एक ‘पीस मेकर’ के तौर पर दर्ज होगा। यह मौका दोबारा शायद ही कभी मिले। इसलिए इस्लामाबाद अपनी पूरी ताकत इस कूटनीतिक जंग को जीतने में लगा रहा है।

