रमज़ान 2026 से पहले फतेहपुरी मस्जिद के इमाम की चेतावनी, बोले- सतर्क रहें मुसलमान
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
भारत की ऐतिहासिक फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मुफ्ती मुकर्रम ने आगामी रमजान 2026 के पवित्र महीने को लेकर देश के मुसलमानों के लिए एक महत्वपूर्ण और गंभीर परामर्श जारी किया है। जुमे के खुतबे (प्रवचन) के दौरान उन्होंने समुदाय को सचेत करते हुए कहा कि इबादत के इस महीने में जहां मुसलमान अल्लाह की बंदगी में डूबे होते हैं, वहीं कुछ शरपसंद और इस्लाम विरोधी तत्व उन्हें नुकसान पहुंचाने की ताक में रह सकते हैं। मुफ्ती मुकर्रम ने न केवल सावधानी बरतने की सलाह दी, बल्कि सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय प्रशासन के साथ समन्वय स्थापित करने पर भी जोर दिया है।
सुरक्षा और सजगता: इबादत के वक्त एहतियात जरूरी
मुफ्ती मुकर्रम ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि रमजान के दौरान सहरी, इफ्तार और तरावीह की नमाज जैसे मौकों पर मुसलमानों की बड़ी तादाद मस्जिदों और सार्वजनिक स्थानों पर मौजूद रहती है। उन्होंने आगाह किया कि फिरकापरस्त (सांप्रदायिक) और शरारती तत्व इस भीड़भाड़ का फायदा उठाकर समुदाय को निशाना बना सकते हैं।
विशेष रूप से सहरी के वक्त, जब गतिविधियां अंधेरे में शुरू होती हैं, और इफ्तार के समय जब लोग सामूहिक रूप से एकत्र होते हैं, तब विशेष सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। मुफ्ती साहब ने ताकीद की है कि किसी भी धार्मिक आयोजन की जानकारी पहले ही स्थानीय पुलिस और प्रशासन को दी जाए ताकि किसी भी अप्रिय घटना से बचा जा सके और समय रहते सुरक्षा मुहैया कराई जा सके।
बीते वर्षों का सबक: षड्यंत्रों के खिलाफ बढ़ी जागरूकता
कुछ साल पहले कट्टरपंथी समूहों द्वारा पर्चे बांटकर अपने वर्ग के लोगों को उकसाया गया था। इन पर्चों में निर्देश दिए गए थे कि उन घरों और स्थानों की रेकी की जाए जहां मुसलमान तरावीह या इफ्तार के लिए बड़ी संख्या में जुटते हैं, ताकि पुलिस को सूचित कर उनके खिलाफ कार्रवाई करवाई जा सके।
इमाम ने संतोष जताया कि इस तरह की सूचनाएं मिलने के बाद मुस्लिम समुदाय अब पूरी तरह सचेत हो गया है। वर्तमान में, यदि कहीं भी बड़ी संख्या में सामूहिक इबादत या इफ्तार का आयोजन होता है, तो आयोजक पहले ही स्थानीय प्रशासन से इसकी अनुमति लेना और उन्हें सूचित करना सुनिश्चित करते हैं। हालांकि, मुफ्ती मुकर्रम ने आगाह किया कि अब चुनौतियां और खतरे नए रूप में सामने आ सकते हैं, जिसके प्रति चौकन्ना रहना अनिवार्य है।
मीडिया की भूमिका और अलीगढ़ की घटना पर सवाल
शाही इमाम ने अपने खुतबे में उर्दू मीडिया और उन सोशल मीडिया चैनलों की सराहना की जो पूरी बेबाकी के साथ समुदाय के मुद्दों और उनके खिलाफ होने वाले अत्याचारों को दुनिया के सामने रखते हैं। उन्होंने अलीगढ़ की एक हालिया घटना का हवाला दिया, जिसमें एक तहसील की मस्जिद में आधी रात को घुसकर इमाम के साथ मारपीट की गई थी। मुफ्ती मुकर्रम ने अफसोस जताते हुए कहा कि इस गंभीर खबर को मुख्यधारा (Mainstream) के मीडिया ने नजरअंदाज कर दिया और केवल उर्दू अखबारों ने ही इसे प्रमुखता से छापा।
संवैधानिक अधिकार और ‘वंदे मातरम’ विवाद
वंदे मातरम विवाद पर अपनी राय रखते हुए मुफ्ती मुकर्रम ने धार्मिक मान्यताओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच के संतुलन को रेखांकित किया। उन्होंने तर्क दिया कि जब एक मुसलमान अपने जन्मदाता माता-पिता की भी पूजा (इबादत) नहीं करता, तो वह किसी और की पूजा कैसे कर सकता है? उन्होंने कहा कि यह केवल मुसलमानों का मसला नहीं है, बल्कि सिख, ईसाई, जैन और बौद्ध समुदाय भी अपने धार्मिक सिद्धांतों के कारण इस पर आपत्ति रखते हैं।
संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि भारत का संविधान हर नागरिक को अपने मजहब को मानने और उसके अनुसार आचरण करने का मौलिक अधिकार देता है। इस अधिकार के तहत किसी के साथ भी जबरदस्ती नहीं की जा सकती।
सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल: ताज मोहम्मद का मामला
खुतबे के अंत में मुफ्ती मुकर्रम ने आगरा के एक प्राथमिक स्कूल का उदाहरण देकर उम्मीद की किरण दिखाई। उन्होंने उन हिंदू अभिभावकों, छात्रों और शिक्षकों की जमकर तारीफ की, जिन्होंने शिक्षक ताज मोहम्मद के समर्थन में आवाज उठाई। ताज मोहम्मद पर एक स्थानीय भाजपा नेता ने बच्चों को नमाज सिखाने का झूठा आरोप लगाकर उन्हें सस्पेंड करवा दिया था।
इमाम ने कहा कि जिस तरह से स्थानीय हिंदू आबादी और स्कूल के स्टाफ ने 17 साल से सेवा दे रहे शिक्षक के पक्ष में खड़े होकर इस ‘ओछी राजनीति’ का विरोध किया, वह भारत की साझा संस्कृति और आपसी विश्वास का सबसे बड़ा प्रमाण है।
मुफ्ती मुकर्रम का यह संदेश केवल सावधानी का ही नहीं, बल्कि एकता, संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और सामूहिक जिम्मेदारी का आह्वान है, ताकि रमजान 2026 का महीना अमन और शांति के साथ संपन्न हो सके।

