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एएमयू न्यूज़ डायरी : कुल्लियात-ए-तिब पर विशेष व्याख्यान, यूनानी चिकित्सा पर गहन विमर्श

देश के प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालय अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) लगातार शैक्षणिक, शोध और अकादमिक उपलब्धियों के नए आयाम गढ़ रहा है। शिक्षा, चिकित्सा, भाषा-विज्ञान और शोध के क्षेत्र में एएमयू की सक्रियता यह साबित कर रही है कि विश्वविद्यालय निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर है। हर दिन यहां नई शैक्षणिक गतिविधियां, शोध संवाद और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उपलब्धियों की श्रृंखला जुड़ रही है। इसी क्रम में हाल ही में एएमयू में तीन महत्वपूर्ण शैक्षणिक घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने विश्वविद्यालय की अकादमिक प्रतिष्ठा को और मजबूत किया है।

कुल्लियात-ए-तिब पर विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन

एएमयू के अजमल खान तिब्बिया कॉलेज के कुल्लियात विभाग द्वारा “कुल्लियात-ए-तिब के मसादिर व मराजे” विषय पर एक विशेष अतिथि व्याख्यान का आयोजन किया गया। यह व्याख्यान यूनानी चिकित्सा पद्धति के मूल सिद्धांतों और उनके स्रोतों को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक पहल रहा।

इस अवसर पर यूनानी चिकित्सा के प्रख्यात विद्वान डॉ. एम. रज़ीउल इस्लाम नदवी ने मुख्य वक्ता के रूप में व्याख्यान दिया। कार्यक्रम में विभाग के शिक्षकों के साथ-साथ परास्नातक (PG) छात्रों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। डॉ. नदवी ने अपने संबोधन में यूनानी चिकित्सा में कुल्लियात (मौलिक सिद्धांतों) की केंद्रीय भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने बताया कि कुल्लियात-ए-तिब की जड़ें प्राचीन यूनानी चिकित्सा परंपरा में निहित हैं, जिसे बाद में अरब-इस्लामी विद्वानों ने सुव्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से विकसित किया। डॉ. नदवी ने प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों की व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया कि किस प्रकार इन सिद्धांतों ने यूनानी चिकित्सा को एक समग्र और व्यावहारिक चिकित्सा पद्धति के रूप में स्थापित किया।

व्याख्यान को इसकी अकादमिक गहराई, ऐतिहासिक संदर्भों और समकालीन प्रासंगिकता के लिए अत्यंत सराहा गया। कार्यक्रम का समापन विभागाध्यक्ष प्रो. एफ. एस. शेरानी द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

एएसआईकॉन 2025 में एएमयू के सर्जरी रेज़िडेंट्स की शानदार सफलता

चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में भी एएमयू ने एक बार फिर अपनी उत्कृष्टता का परिचय दिया है। जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज (JNMCH) के सर्जरी विभाग के परास्नातक रेज़िडेंट डॉक्टरों ने एसोसिएशन ऑफ सर्जन्स ऑफ इंडिया (ASICON) 2025 में शीर्ष सम्मान हासिल कर विश्वविद्यालय का नाम रोशन किया।

कोलकाता में आयोजित इस राष्ट्रीय सम्मेलन में देशभर से लगभग 3,000 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। यह सम्मेलन सर्जरी और उससे संबंधित विशेषज्ञताओं में अकादमिक आदान-प्रदान का एक प्रमुख राष्ट्रीय मंच माना जाता है।

इस प्रतिष्ठित सम्मेलन में सर्जरी विभाग के तृतीय वर्ष के रेज़िडेंट डॉ. हाज़िक जमील ने सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र (Best Research Paper) श्रेणी में द्वितीय पुरस्कार प्राप्त किया। उनके शोध कार्य को वैज्ञानिक कठोरता, मौलिकता और नैदानिक उपयोगिता के लिए विशेष रूप से सराहा गया।

वहीं, सर्जरी विभाग के ही एक अन्य तृतीय वर्ष के रेज़िडेंट डॉ. मोहम्मद अनस ने सर्वश्रेष्ठ पोस्टर और वीडियो प्रस्तुति दोनों श्रेणियों में द्वितीय पुरस्कार हासिल कर उल्लेखनीय उपलब्धि दर्ज की। उनकी प्रस्तुति को स्पष्टता, नवाचार और शैक्षणिक मूल्य के लिए निर्णायक मंडल ने विशेष रूप से सराहा।

इस अवसर पर सर्जरी विभाग की अध्यक्ष प्रो. आतिया ज़का उर रब ने पुरस्कार विजेताओं को बधाई देते हुए कहा कि ये उपलब्धियां जेएनएमसीएच में मजबूत शैक्षणिक वातावरण, प्रभावी मार्गदर्शन और शोध उत्कृष्टता पर दिए जा रहे विशेष ज़ोर को दर्शाती हैं। उन्होंने कहा कि यह पूरे विश्वविद्यालय के लिए गर्व का विषय है।

भारतीय भाषाओं पर राष्ट्रीय सम्मेलन में एएमयू की प्रभावी भागीदारी

भाषा और संस्कृति के क्षेत्र में भी एएमयू की सक्रिय भूमिका देखने को मिली। विश्वविद्यालय के शिक्षकों और शोधार्थियों ने “भारतीय भाषा परिवार: साझा विरासत और विशिष्ट पहचान” विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में महत्वपूर्ण अकादमिक योगदान दिया। यह सम्मेलन 19–20 जनवरी को सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार द्वारा भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से आयोजित किया गया।

सम्मेलन में एएमयू के भाषाविज्ञान विभाग के अध्यक्ष और लिंग्विस्टिक सोसाइटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष प्रो. मोहम्मद जहांगिर वारसी ने व्याख्यान दिया। उन्होंने भारत की बहुभाषी परंपरा को राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक निरंतरता की मजबूत आधारशिला बताया। प्रो. वारसी ने अपने संबोधन में यह रेखांकित किया कि भारत की भाषाई विविधता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत है।

इसके अलावा, एएमयू की शोधार्थी उज़मा आफ़रीन और सना ताहा अकील ने भी सम्मेलन में शोध पत्र प्रस्तुत किया। उनके शोध में बहुभाषी कक्षाओं में समावेशी भागीदारी पर विशेष ध्यान दिया गया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि गैर-अंग्रेज़ी भाषी छात्रों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने हेतु समावेशी और समानता-आधारित पाठ्यक्रम विकसित करना समय की आवश्यकता है।

उनके शोध पत्र को शैक्षणिक दृष्टि से प्रासंगिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील बताया गया, जिससे सम्मेलन में मौजूद शिक्षाविदों के बीच सकारात्मक चर्चा देखने को मिली।

निरंतर प्रगति की ओर एएमयू

इन तीनों प्रमुख शैक्षणिक गतिविधियों और उपलब्धियों से यह स्पष्ट है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी शिक्षा, शोध और अकादमिक संवाद के हर क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ रही है। चाहे यूनानी चिकित्सा की बुनियादी अवधारणाओं पर गंभीर विमर्श हो, चिकित्सा शोध में राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान हो, या भारतीय भाषाओं और बहुभाषिकता पर अकादमिक योगदान—एएमयू हर मोर्चे पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है।

एएमयू की यह प्रगति न केवल विश्वविद्यालय के छात्रों और शिक्षकों के लिए प्रेरणादायक है, बल्कि यह देश के उच्च शिक्षा परिदृश्य में इसकी केंद्रीय भूमिका को भी रेखांकित करती है।

पढ़ते रहें — मुस्लिम नाउ