विश्लेषण: ईरान के सामने पस्त होती महाशक्तियां? अमेरिका ने चला ‘इनाम’ का दांव, तो इजरायल ने अल-अक्सा पर जड़ा ताला
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
भारत के ग्रामीण अंचलों में एक मशहूर कहावत है— ‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे’। मौजूदा वैश्विक हालात को देखें तो अमेरिका और इजरायल की ईरान को लेकर कुछ ऐसी ही स्थिति नजर आ रही है। बीते दो हफ्तों से जारी भीषण जंग, आसमान से बरसते बारूद और अयातुल्ला अली खामनेई समेत करीब 45 शीर्ष नेतृत्व की हत्या के बावजूद, ईरान न केवल टिका हुआ है, बल्कि पलटवार की ऐसी क्षमता दिखा रहा है जिसने वाशिंगटन से लेकर तेल अवीव तक तहलका मचा दिया है।
आज आलम यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति अमेरिका आर्थिक बोझ के तले दबने लगा है, वहीं इजरायल का वह आधुनिक ढांचा जिसे बनाने में दशकों लगे थे, खंडहर में तब्दील होता दिख रहा है। जब मिसाइलें और बम काम नहीं आए, तो अमेरिका ने अब ‘रिश्वत’ का सहारा लिया है, वहीं इजरायल ने अपनी हताशा निकालने के लिए मुसलमानों के सबसे पवित्र स्थलों में से एक ‘मस्जिद अल-अक्सा’ को निशाना बनाया है।
1. अमेरिका का ‘इनामी’ कार्ड: सैन्य हार की स्वीकारोक्ति?
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में ईरान के 10 मौजूदा शीर्ष नेताओं की जानकारी देने वालों को एक करोड़ डॉलर (लगभग 84 करोड़ रुपये) का इनाम देने का ऐलान किया है। एक वरिष्ठ पत्रकार के नजरिए से देखें तो यह कदम किसी महाशक्ति की ताकत नहीं, बल्कि उसकी बेबसी को दर्शाता है। भारी बमबारी के बाद भी जब ईरान का सरकारी ढांचा नहीं गिरा और वहां की जनता ने बगावत नहीं की, तो अमेरिका ने अब ‘भीतरघात’ कराने के लिए इस भारी-भरकम राशि का लालच दिया है।
इस सूची में ईरान के नए सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई और सुरक्षा प्रमुख अली लारीजानी जैसे नाम शामिल हैं। लेकिन हकीकत यह है कि ये नेता आज भी खुलेआम रैलियों में देखे जा रहे हैं, जो अमेरिकी खुफिया तंत्र की विफलता पर एक बड़ा सवालिया निशान है।
General Secretariats of the #OIC, the League of Arab States, and the African Union Comission Condemn the Israeli occupation authorities' continued closure of the blessed Al-Aqsa Mosque pic.twitter.com/kiNYWYtgJe
— OIC (@OIC_OCI) March 13, 2026
2. रमजान में अल-अक्सा पर पाबंदी: इजरायल की ‘नीच’ हरकत
अपनी सैन्य विफलताओं से बौखलाया इजरायल अब मजहबी भावनाओं को आहत करने पर उतर आया है। रमजान के मुकद्दस महीने में, जब दुनिया भर के मुसलमान इबादत में मशगूल हैं, इजरायल ने तमाम अंतरराष्ट्रीय समझौतों और मानवीय मूल्यों को ताक पर रखकर अल-अक्सा मस्जिद के दरवाजे मुसलमानों के लिए बंद कर दिए हैं।
यह केवल एक सुरक्षा उपाय नहीं है, बल्कि एक पूरी कौम की धार्मिक आजादी पर सीधा हमला है। इजरायल की इस हरकत ने पूरे मध्य पूर्व में तनाव की आग में घी डालने का काम किया है।
3. OIC और अरब लीग का कड़ा रुख: “यह हमला बर्दाश्त नहीं”
इजरायल की इस ‘नीच’ हरकत के खिलाफ इस्लामी सहयोग संगठन (OIC), अरब लीग और अफ्रीकी संघ (AUC) ने एक संयुक्त और बेहद सख्त बयान जारी किया है। इन संगठनों ने इजरायल को स्पष्ट चेतावनी दी है कि अल-कुद्स (यरूशलेम) और अल-अक्सा मस्जिद पर केवल और केवल मुसलमानों का अधिकार है।
OIC के साझा बयान के मुख्य अंश:
- धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन: बयान में कहा गया कि अल-अक्सा मस्जिद मुसलमानों का ‘प्रथम किबला’ और तीसरा सबसे पवित्र स्थल है। इसे इबादत गुजारों के लिए बंद करना अंतरराष्ट्रीय कानूनों और ऐतिहासिक यथास्थिति (Status Quo) का गंभीर उल्लंघन है।
- उकसावे की कार्रवाई: OIC ने चेतावनी दी कि रमजान के दौरान ऐसी पाबंदियां दुनिया भर के दो अरब मुसलमानों की भावनाओं को भड़काने वाली हैं। इसकी पूरी जिम्मेदारी ‘कब्जाधारी’ इजरायल की होगी।
- संप्रभुता का दावा खारिज: संगठनों ने दोहराया कि 1967 के बाद से कब्जे में लिए गए फिलिस्तीनी क्षेत्रों और पूर्वी यरूशलेम पर इजरायल का कोई कानूनी अधिकार या संप्रभुता नहीं है। अल-अक्सा का 144 डुनम का पूरा क्षेत्र विशेष रूप से मुसलमानों के लिए इबादत की जगह है।
- संयुक्त राष्ट्र से अपील: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से मांग की गई है कि वह इजरायल को तुरंत अल-अक्सा के दरवाजे खोलने और फिलिस्तीनियों की धार्मिक स्वतंत्रता बहाल करने के लिए मजबूर करे।
4. युद्ध का बदलता चेहरा: अमेरिका और इजरायल की बढ़ती मुश्किलें
इस युद्ध ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक तकनीक और हथियारों से आप इमारतें तो गिरा सकते हैं, लेकिन किसी राष्ट्र के संकल्प को नहीं।
- अमेरिका का आर्थिक संकट: अमेरिका पहले ही यूक्रेन और अब मध्य पूर्व में अरबों डॉलर झोंक चुका है। घरेलू स्तर पर बढ़ती महंगाई और कर्ज के बोझ ने ट्रंप प्रशासन के हाथ बांध दिए हैं।
- इजरायल का विनाश: हिजबुल्लाह और ईरान की मिसाइलों ने इजरायल के औद्योगिक और रिहायशी इलाकों को भारी नुकसान पहुँचाया है। वहां का पर्यटन और अर्थव्यवस्था पूरी तरह ठप हो चुकी है।
- ईरानी लचीलापन: खामेनेई और अन्य नेताओं की हत्या के बाद अमेरिका को उम्मीद थी कि ईरान का शासन ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। लेकिन नया नेतृत्व और भी अधिक आक्रामक होकर उभरा है।
5. क्या यह ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ का अंत है?
OIC और अंतरराष्ट्रीय समुदाय अभी भी 1967 की सीमाओं के आधार पर एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की मांग कर रहे हैं, जिसकी राजधानी पूर्वी यरूशलेम हो। लेकिन इजरायल जिस तरह से जमीन पर जमीनी हकीकत बदल रहा है—मस्जिदों को बंद करना, बस्तियां बसाना और हत्याएं करना—उससे शांति की उम्मीदें धूमिल होती जा रही हैं।
पत्रकारिता का निष्कर्ष
अमेरिका का ‘पुरस्कार’ और इजरायल की ‘पाबंदी’—दोनों ही इस बात के प्रमाण हैं कि युद्ध के मैदान में वे उस जीत से बहुत दूर हैं जिसका उन्होंने दावा किया था। ईरान को अस्थिर करने की कोशिशें नाकाम रही हैं और अल-अक्सा पर ताला लगाकर इजरायल ने खुद अपने लिए एक नया मोर्चा खोल लिया है, जो अब केवल राजनीतिक नहीं बल्कि पूरी तरह से धार्मिक युद्ध में तब्दील हो सकता है।
ईरान ने साबित कर दिया है कि वह केवल एक देश नहीं, बल्कि एक विचारधारा है जिसे बमों से नहीं मिटाया जा सकता। अब देखना यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय इजरायल को इस ‘नीच’ हरकत से पीछे हटने पर मजबूर कर पाता है या दुनिया एक और महायुद्ध की ओर कदम बढ़ाएगी।

