गुजरात में एंटी रेडिकलाइजेशन सेल सक्रिय, सरकारी फैसले पर खड़ा हुआ बड़ा विवाद
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली, अहमदाबाद
गुजरात सरकार ने राज्य में चरमपंथ और कट्टरता से निपटने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। राज्य के स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो ने एक बेहद गोपनीय आदेश जारी किया है। इसके तहत राज्य के सभी जिलों और पुलिस कमिश्नरेट में एंटी रेडिकलाइजेशन सेल यानी एआरसी का गठन कर दिया गया है। गृह विभाग की मंजूरी के बाद इस सेल के संचालन के लिए एक विस्तृत गाइडलाइन जारी की गई है। इस नई व्यवस्था को जमीन पर उतारने की शुरुआत भी हो चुकी है। जामनगर पुलिस ने इस यूनिट को सक्रिय करते हुए पीएसआई एम वी मोढवाडिया को इसका जिला प्रमुख नियुक्त किया है। यह पूरी कार्रवाई जामनगर के पुलिस अधीक्षक डॉ रवि मोहन सैनी की देखरेख में चल रही है।
इस सरकारी फैसले के सार्वजनिक होने के बाद से राज्य में एक नई राजनीतिक और सामाजिक बहस छिड़ गई है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और नागरिक संगठनों ने इस फैसले का कड़ा विरोध करना शुरू कर दिया है। उनका आरोप है कि इस आदेश की आड़ में एक खास समुदाय को निशाना बनाया जा सकता है। वहीं सरकार और सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि यह कदम देश की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने और युवाओं को भटकने से बचाने के लिए उठाया गया है।

क्या है खुफिया विभाग का वह गोपनीय दस्तावेज
गांधीनगर स्थित स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो की तरफ से जारी यह आदेश सोशल मीडिया पर सामने आया है। इस गोपनीय दस्तावेज पर डीसीआई प्रफुल्ल वानिया के हस्ताक्षर हैं। आदेश के मुताबिक सभी जिला पुलिस कप्तानों को अपने क्षेत्रों में इस विशेष सेल की स्थापना करने का निर्देश दिया गया है। इसके साथ ही हर महीने की पांच तारीख तक इस सेल की प्रगति रिपोर्ट खुफिया मुख्यालय को भेजने के लिए कहा गया है। सरकार ने इस काम के लिए राज्यभर में 136 नए पदों को भी मंजूरी दी है। इन पदों पर भर्ती और तैनाती की प्रक्रिया काफी तेजी से चल रही है।
इस गाइडलाइन में कट्टरता को परिभाषित भी किया गया है। इसमें कहा गया है कि जब कोई व्यक्ति देश विरोधी विचारों को अपनाता है या देश की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है तो उसे कट्टरता माना जाएगा। इसके अलावा अपने धर्म को सच्चा और दूसरों के धर्म को झूठा बताने वाले प्रचार को भी इसी दायरे में रखा गया है। पुलिस को ऐसे लोगों पर नजर रखने को कहा गया है जो सोशल मीडिया, अखबारों, जनसभाओं या धार्मिक भाषणों के जरिए समाज में नफरत फैलाने की कोशिश करते हैं।
निगरानी के लिए तय किए गए कई कड़े पैमाने
खुफिया विभाग की इस गाइडलाइन में संदिग्धों की पहचान करने के लिए कई तरह के संकेत तय किए गए हैं। पुलिस को निर्देश दिया गया है कि वे इन संकेतों के आधार पर लोगों के व्यवहार और डिजिटल गतिविधियों की निगरानी करें।
The BJP government in Gujarat has put beards, Itikaf, Arabic greetings and other ordinary expressions of Islamic faith under the shadow of radicalisation.
— Dr Syed Naseer Hussain, M P (@NasirHussainINC) July 15, 2026
The BJP continues to foster an atmosphere where religious identity itself becomes suspect, while hate campaigns and… https://t.co/eEHWC8Htve
डिजिटल और तकनीकी गतिविधियां
- इंटरनेट पर वीपीएन सेवाओं का लगातार इस्तेमाल करना।
- सिग्नल और एलिमेंट जैसे पूरी तरह एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स का उपयोग करना।
- टेलीग्राम पर संदिग्ध और कट्टरपंथी ग्रुप्स का हिस्सा बनना।
- आईएसआईएस या अल कायदा जैसे प्रतिबंधित संगठनों के सोशल मीडिया खातों को फॉलो करना।
- इंटरनेट से चरमपंथी साहित्य या पत्रिकाएं डाउनलोड करना।
- बिना किसी ज्ञात कमाई के साधन के अचानक क्रिप्टोकरेंसी में लेन-देन करना।
व्यवहार में आने वाले बदलाव
- अचानक से परिवार और दोस्तों से पूरी तरह दूरी बना लेना।
- समाज से अलग-थलग रहकर अकेले समय बिताना।
- दुनिया के अन्य हिस्सों में मुस्लिम समुदाय से जुड़ी घटनाओं पर बहुत उग्र प्रतिक्रिया देना।
- आतंकवादी गतिविधियों या आतंकियों की खुलकर तारीफ करना।
- किसी खास धार्मिक विचारधारा के प्रभाव में आकर पढ़ाई या नौकरी को अचानक छोड़ देना।

इसके साथ ही गाइडलाइन में कुछ भौतिक गतिविधियों को भी संदिग्ध माना गया है। जैसे पोटैशियम नाइट्रेट, सल्फर या अमोनियम नाइट्रेट जैसे रसायनों को भारी मात्रा में खरीदना। बिना किसी ठोस वजह के बार-बार जंगलों या सुनसान इलाकों के चक्कर काटना। इसके अलावा अफगानिस्तान या अशांत क्षेत्रों में बैठे लोगों से इंटरनेट के जरिए संपर्क साधना। पुलिस को इन सभी गतिविधियों पर कड़ी नजर रखने के लिए कहा गया है।
पांच चरणों में काम करेगी यह नई सुरक्षा व्यवस्था
गुजरात सरकार ने इस पूरी व्यवस्था को पांच अलग-अलग स्तरों पर लागू करने का खाका तैयार किया है। इसके तहत पुलिस सिर्फ कार्रवाई नहीं करेगी बल्कि सुधार की दिशा में भी काम करेगी।
पहला चरण रोकथाम का है। इसके तहत पुलिस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, ऑनलाइन फोरम्स और मैसेजिंग ऐप्स पर लगातार निगरानी रखेगी। चरमपंथी विचारधारा फैलाने वाले प्रचारकों और धार्मिक संगठनों पर नजर रखी जाएगी।
दूसरा चरण संदिग्धों की पहचान का है। इसमें पुलिस अपने स्थानीय खुफिया तंत्र को मजबूत करेगी। संदिग्ध व्यवहार वाले लोगों का एक पूरा डेटाबेस तैयार किया जाएगा।
तीसरा चरण काउंसलिंग का है। यह इस नीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। अगर कोई युवा भटक गया है तो उसे सीधे जेल भेजने के बजाय सुधरने का मौका दिया जाएगा। इसके लिए स्थानीय धार्मिक विद्वानों, मनोवैज्ञानिकों, शिक्षकों और परिवार के सदस्यों की मदद ली जाएगी। इस पूरी काउंसलिंग प्रक्रिया को पूरी तरह से गुप्त रखा जाएगा ताकि उस व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस न पहुंचे।
चौथा चरण पुनर्वास का है। इसके तहत काउंसलिंग से सुधरे हुए लोगों को मुख्यधारा में वापस लाया जाएगा। उन्हें रोजगार के अवसर और कौशल विकास के साधन मुहैया कराए जाएंगे।
आखिरी चरण दीर्घकालिक निगरानी का है। इसके जरिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि सुधरा हुआ व्यक्ति दोबारा पुरानी राह पर न लौट जाए।

नागरिक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का भारी विरोध
जैसे ही यह गोपनीय आदेश बाहर आया नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ताओं ने इस पर तीखी आपत्ति जताई। मानवाधिकार कार्यकर्ता शबनम हाशमी ने इस फैसले की कड़ी निंदा की है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सरकार एक पूरे समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को संदिग्ध बनाने की कोशिश कर रही है। शबनम हाशमी के मुताबिक दाढ़ी रखना, नकाब पहनना या रमजान के दौरान एतिकाफ में बैठना किसी भी नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। इन सामान्य धार्मिक अभ्यासों को कट्टरता का पैमाना बना देना पूरी तरह से गलत है। यह संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 और 25 का सीधा उल्लंघन है जो देश के हर नागरिक को समानता, निजता और धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देते हैं।
माइनॉरिटी कोआर्डिनेशन कमेटी के संयोजक मुजाहिद नफीस ने भी इस मामले में सरकार को एक ज्ञापन सौंपा है। उन्होंने इस आदेश को तुरंत वापस लेने की मांग की है। मुजाहिद नफीस का कहना है कि इस गाइडलाइन में कट्टरता या कट्टरपंथी संगठन को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। शब्दों के इस अधूरेपन का फायदा उठाकर स्थानीय स्तर पर आम लोगों को परेशान किया जा सकता है। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने इस फैसले पर दोबारा विचार नहीं किया तो वे इस नीति के खिलाफ सीधे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।
मीडिया के एक वर्ग ने भी इस नीति की आलोचना की है। उनका तर्क है कि यह गाइडलाइन सिर्फ एकतरफा सोच पर आधारित लगती है। इसमें अन्य प्रकार के चरमपंथ या गौरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा जैसी गतिविधियों को शामिल नहीं किया गया है।

चुनावी वादे और सरकार का पक्ष
इस पूरे विवाद के बीच भारतीय जनता पार्टी के पुराने चुनावी घोषणापत्र की भी चर्चा हो रही है। साल 2022 के गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने अपने घोषणापत्र में एंटी रेडिकलाइजेशन सेल बनाने का वादा किया था। तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष जे पी नड्डा ने गांधीनगर में इसका एलान किया था। सरकार का कहना है कि वह अपने उसी चुनावी वादे को प्रशासनिक रूप से अमलीजामा पहना रही है।
अधिकारियों का तर्क है कि इस नीति को किसी एक समुदाय के खिलाफ देखना पूरी तरह गलत है। यह ढांचा किसी भी उस व्यक्ति के खिलाफ काम करेगा जो देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होगा, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो। दुनिया भर की सुरक्षा एजेंसियां इसी तरह के पैमानों का इस्तेमाल कर आतंकी साजिशों को समय रहते नाकाम करती हैं। गुजरात पुलिस का यह नया तंत्र भी किसी अपराध के होने का इंतजार करने के बजाय उसे शुरुआती स्तर पर ही रोकने का एक प्रयास है। यदि कोई व्यक्ति काउंसलिंग के बाद भी अपनी देश विरोधी गतिविधियों को जारी रखता है, तभी उसके खिलाफ यूएपीए या भारतीय न्याय संहिता के तहत कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

