Assam Muslims Success Story : कुरान को आसान बनाने वाले मौलाना नूरुल अमीन कासिमी
Assam Muslim Success Story Maulana Noorul Amin Qasimi
मुस्लिम नाउ विशेष
असम की मिट्टी से निकला एक ऐसा नाम, जिसने धर्म, शिक्षा और समाज सेवा को एक साथ जोड़कर नई मिसाल पेश की है। यह कहानी है मौलाना नूरुल अमीन कासिमी की। एक ऐसे इस्लामिक स्कॉलर की, जिन्होंने कुरान को सिर्फ मस्जिदों और मदरसों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि आम लोगों तक पहुंचाने का एक आसान रास्ता तैयार किया। खासकर उन लोगों के लिए जो अरबी नहीं जानते या पढ़ने में कठिनाई महसूस करते हैं।

मुस्लिम नाउ की विशेष सीरीज ‘मुस्लिम सक्सेज स्टोरी’ की इस कड़ी में हम बात कर रहे हैं असम के उस शख्सियत की, जिन्होंने असमिया भाषा में कुरान का अनुवाद, व्याख्या और ऑडियो वर्जन जारी कर हजारों लोगों के लिए कुरान समझना आसान बना दिया। आज असम के कई घरों में लोग कुरान को सुन रहे हैं, समझ रहे हैं और अपनी मातृभाषा में उसके संदेश से जुड़ रहे हैं।
मौलाना नूरुल अमीन कासिमी का सफर पारंपरिक धार्मिक शिक्षा तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने इस्लामी शिक्षा के साथ आधुनिक पढ़ाई को भी उतनी ही अहमियत दी। यही वजह है कि वे आज सिर्फ एक मौलाना नहीं बल्कि शिक्षाविद, शोधकर्ता और समाज सुधारक के रूप में भी पहचाने जाते हैं।
असम के सोनितपुर जिले के सोतिया हायर सेकेंडरी स्कूल से उनकी शुरुआती शिक्षा शुरू हुई। बचपन से ही पढ़ाई में रुचि रखने वाले नूरुल अमीन ने धार्मिक शिक्षा हासिल करने के लिए खुटाकटिया दिनी आलिया मदरसा और होजाई जलालिया मदरसा का रुख किया। इसी दौरान उन्होंने दसवीं की पढ़ाई भी पूरी की। इसके बाद वे देश के प्रतिष्ठित इस्लामिक शिक्षण संस्थान दारुल उलूम देवबंद पहुंचे। यहां उन्होंने इस्लामी शिक्षा की उच्च पढ़ाई पूरी की।
आमतौर पर दारुल उलूम देवबंद से शिक्षा लेने वाले कई छात्र मस्जिदों, मदरसों या धार्मिक संस्थाओं से जुड़कर दीन की खिदमत करते हैं। लेकिन मौलाना नूरुल अमीन कासिमी ने एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने महसूस किया कि इस्लाम को लेकर समाज में कई तरह की गलतफहमियां हैं। खासकर मुस्लिम समाज की छवि को लेकर। ऐसे में जरूरत सिर्फ उपदेश देने की नहीं, बल्कि संवाद बनाने की भी है।

देवबंद से लौटने के बाद उन्होंने मरकजुल मआरिफ होजाई में अध्यापन शुरू किया। वहीं अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। उन्होंने हायर सेकेंडरी की परीक्षा पास की। फिर रुफी कॉलेज से स्नातक और गौहाटी विश्वविद्यालय से परास्नातक की डिग्री हासिल की। मौजूदा समय में वे गौहाटी विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे हैं। धार्मिक और आधुनिक शिक्षा का यह संतुलन उन्हें एक अलग पहचान देता है।
मौलाना कासिमी का मानना है कि इस्लाम शांति, शिक्षा और सहिष्णुता का धर्म है। लेकिन कई बार अज्ञानता और अधूरी जानकारी के कारण लोग इसकी गलत व्याख्या करने लगते हैं। यही वजह है कि उन्होंने इस्लाम के असली संदेश को लोगों तक उनकी भाषा में पहुंचाने का फैसला किया।
वे कहते हैं, “हम असमी मुसलमान हैं और अपनी संस्कृति के साथ इस्लाम को समझते हैं। कुरान अगर अरबी में है तो हमारी जिम्मेदारी है कि हम उसे अपनी भाषा में समझाएं ताकि लोग उसकी असली शिक्षा को जान सकें।”
यही सोच आगे चलकर एक बड़े काम की वजह बनी। मौलाना नूरुल अमीन कासिमी ने असमिया भाषा में कुरान शरीफ का अनुवाद और व्याख्या प्रकाशित की। इससे उन लोगों को बड़ी राहत मिली जो अरबी भाषा नहीं समझते थे। लेकिन उन्होंने यहीं रुकना मंजूर नहीं किया। बदलते दौर और तकनीक की जरूरत को समझते हुए उन्होंने कुरान का ऑडियो वर्जन भी जारी किया।
आज कई लोग जो पढ़ नहीं सकते या व्यस्त जीवन की वजह से किताबों के लिए समय नहीं निकाल पाते, वे कुरान को सुनकर समझ रहे हैं। असमिया भाषा में कुरान का ऑडियो वर्जन मुस्लिम समाज में तेजी से लोकप्रिय हुआ है। इससे बुजुर्गों, महिलाओं और युवाओं को भी लाभ मिला है।
तकनीक के दौर में मौलाना कासिमी ने सोशल मीडिया को भी एक प्रभावी माध्यम बनाया। वे यूट्यूब, फेसबुक और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए इस्लाम, शिक्षा, कुरान और सामाजिक जिम्मेदारियों पर बात करते हैं। उनकी वीडियो क्लिप्स खासकर असमिया मुस्लिम युवाओं के बीच काफी देखी जाती हैं। आसान भाषा और सरल उदाहरणों की वजह से लोग उनसे जल्दी जुड़ जाते हैं।
मौलाना नूरुल अमीन कासिमी केवल धार्मिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं हैं। वे ईदगाहों, मस्जिदों, मदरसों और सामाजिक मंचों पर भी लगातार लोगों को संबोधित करते हैं। उनके भाषणों में धार्मिक शिक्षा के साथ सामाजिक जागरूकता का संदेश भी शामिल होता है। वे शिक्षा, रोजगार, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारियों पर खुलकर बात करते हैं।
मध्य असम के तेजपुर में उन्होंने इस्लामिक रिसर्च एंड स्टडी सेंटर की स्थापना की। यह संस्थान युवा इस्लामिक स्कॉलर्स को एक मंच देने का काम कर रहा है। यहां धार्मिक शोध, सामाजिक अध्ययन और शिक्षा को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है। उनका मकसद है कि नई पीढ़ी सिर्फ धार्मिक ज्ञान तक सीमित न रहे बल्कि समाज की जरूरतों को भी समझे।
मौलाना कासिमी का एक महत्वपूर्ण विचार जुमे की नमाज से भी जुड़ा है। उनका कहना है कि अगर शुक्रवार का खुत्बा केवल अरबी में पढ़ा जाए तो आम लोग उसका संदेश पूरी तरह नहीं समझ पाते। इसलिए जरूरी है कि खुत्बा का सार स्थानीय भाषा में समझाया जाए। इससे लोग इस्लाम की असली भावना जैसे भाईचारा, शांति और सामाजिक जिम्मेदारी को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।
शिक्षा को लेकर उनकी चिंता भी साफ नजर आती है। उनका मानना है कि मुस्लिम समाज को आगे बढ़ाने का सबसे मजबूत रास्ता शिक्षा है। वे अक्सर इस बात पर जोर देते हैं कि उलेमा और मौलाना अगर आधुनिक शिक्षा की अहमियत पर खुलकर बात करें तो समाज में बड़ा बदलाव आ सकता है।
मौलाना कासिमी एक आंकड़ा भी साझा करते हैं। उनके अनुसार केवल चार प्रतिशत मुस्लिम बच्चे मदरसों में पढ़ते हैं। उनका कहना है कि इन बच्चों को भविष्य में धार्मिक नेतृत्व संभालना है, लेकिन बाकी छियानवे प्रतिशत बच्चों को आधुनिक शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और समाजशास्त्र से जोड़ना जरूरी है ताकि वे समाज के लिए उपयोगी बन सकें।
उनकी सोच साफ है। वे धार्मिक पहचान और आधुनिक शिक्षा को एक दूसरे का विरोधी नहीं मानते। बल्कि दोनों को साथ लेकर चलने की बात करते हैं। उनका मानना है कि अगर मुसलमान इस्लामी ज्ञान के साथ आधुनिक शिक्षा हासिल करें तो वे समाज की बेहतरी में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
आज मौलाना नूरुल अमीन कासिमी असम में एक ऐसे चेहरे के रूप में देखे जाते हैं जो धर्म को समाज से जोड़ते हैं। जो भाषा की ताकत समझते हैं। जो तकनीक का इस्तेमाल सकारात्मक बदलाव के लिए करते हैं। और जो चाहते हैं कि मुस्लिम समाज शिक्षा, समझ और जागरूकता के साथ आगे बढ़े।
असम मुस्लिम सक्सेज स्टोरी में मौलाना नूरुल अमीन कासिमी की यह यात्रा केवल एक व्यक्ति की सफलता की कहानी नहीं है। यह उस सोच की कहानी है जो कहती है कि अगर इरादा साफ हो तो ज्ञान को हर घर तक पहुंचाया जा सकता है। चाहे वह किताब के जरिए हो या आवाज के जरिए।

