जामिया में इस्लामी क़ानून और मुस्लिम महिलाओं की स्थिति और आधुनिक सुधारों पर गहन चर्चा
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
इंडिया अरब कल्चरल सेंटर, जामिया मिल्लिया इस्लामिया ने गुरुवार, 5 फरवरी 2026 को “जाहिलियत से कानूनी सुधारों तक: इस्लामी क़ानून का विकास और मुस्लिम महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन” विषय पर एक विस्तार व्याख्यान (Extension Lecture) का आयोजन किया। यह कार्यक्रम IACC के कॉन्फ्रेंस रूम में आयोजित हुआ, जिसमें छात्रों, शोधार्थियों और शिक्षकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
इस अकादमिक कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. हेमायूं अख्तर नज़मी (निदेशक, सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज़, जामिया) ने की, जबकि सत्र का संचालन डॉ. मोहम्मद आफ़ताब अहमद (निदेशक, इंडिया अरब कल्चरल सेंटर) ने किया।

कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए डॉ. आफ़ताब अहमद ने जामिया के कुलपति प्रो. मज़हर आसिफ़ और रजिस्ट्रार प्रो. (डॉ.) मोहम्मद महताब आलम रिज़वी का आभार व्यक्त किया, जिनके संरक्षण और सहयोग से इस तरह की अकादमिक गतिविधियाँ संभव हो पाती हैं। उन्होंने सत्र की अध्यक्षता स्वीकार करने के लिए प्रो. नज़मी का धन्यवाद किया और वक्ता डॉ. अलीशा खातून (फैकल्टी ऑफ लॉ) का परिचय कराते हुए उनके विचार साझा करने के लिए सहमति जताने पर आभार प्रकट किया।
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. हेमायूं अख्तर नज़मी ने इस्लाम से पहले अरब समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर प्रकाश डाला, विशेषकर महिलाओं की स्थिति पर। उन्होंने कहा कि इस्लाम के आगमन के बाद महिलाओं की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ, हालांकि आधुनिक दौर में समकालीन जरूरतों के अनुरूप नए दृष्टिकोण और व्याख्याओं की आवश्यकता बनी हुई है।

मुख्य वक्ता डॉ. अलीशा खातून ने अपने व्याख्यान में बताया कि मुस्लिम महिलाओं की स्थिति एक लंबे ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया से गुज़री है—जाहिलियत के दौर से लेकर शरीअत के उद्भव और फिर आधुनिक कानूनी सुधारों तक। उन्होंने कहा कि प्रारंभिक इस्लामी शिक्षाओं ने महिलाओं को विवाह, विरासत और आर्थिक अधिकारों जैसी महत्वपूर्ण सुरक्षा और अधिकार प्रदान किए। समय के साथ फ़िक़्ही व्याख्याओं और सामाजिक परंपराओं ने महिलाओं की भूमिका को प्रभावित किया, जबकि आधुनिक युग में औपनिवेशिक अनुभवों, राष्ट्रवाद और महिला आंदोलनों के प्रभाव से कानूनी सुधार सामने आए।
डॉ. खातून ने ज़ोर देकर कहा कि मुस्लिम समाजों में परंपरा, सुधार और लैंगिक न्याय के बीच संवाद एक सतत और गतिशील प्रक्रिया है, जो आज भी जारी है।
कार्यक्रम का समापन डॉ. ज़ुल्फ़िकार अली अंसारी द्वारा प्रस्तुत औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने सत्र की अध्यक्षता करने वाले प्रो. नज़मी, वक्ता डॉ. अलीशा खातून, प्रो. नासिर रज़ा ख़ान तथा वेस्ट एशिया और इंडिया अरब कल्चरल सेंटर के सभी शिक्षकों और उपस्थित प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।
यह व्याख्यान जामिया मिल्लिया इस्लामिया में अकादमिक संवाद, आलोचनात्मक चिंतन और समकालीन सामाजिक मुद्दों पर गंभीर विमर्श की प्रतिबद्धता का एक सशक्त उदाहरण साबित हुआ।

