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दाना बनें और दानी भी

सैयद शहरोज़ क़मर

कोरोना का मूज़ी दौर है, मुझे हज़रत उमर फ़ारूक़ याद आ रहे. जब वो दूसरे ख़लीफ़ा बने तो एक दिन बाज़ार से गुज़ते हुए उन्हें एक औरत मिली. उस ने कहा, मैं फलां की बेटी हूं. हमारे बाबा सुलह हुदैबिया में अल्लाह के रसूल के साथ थे। हज़रत उमर उसे अपने साथ ले गए. राशन से लदी ऊँटनी उसके हवाले करते हुए कहा कि बेटी इसे ले जाओ और अब आइंदा तुम्हारा वज़ीफ़ा तुम्हारे घर पहुंच जाया करेगा तुम अब मत आना. हज़रत उमर ने इस घटना के बाद एक सर्वे कराना शुरू किया ताकि ऐसे

ज़रूरतमन्दों की फ़ेहरिस्त बनाकर उनकी मदद की जाए. दअरसल कई लोग ज़रूरतमंद होते हैं, लेकिन खुद्दारी और शराफ़त में किसी से कह नहीं पाते. किसी के सामने दामन फैलाना उन्हें अपनी तौहीन लगती है। क़ुरआन ऐसे लोगों के लिए मिस्कीन लफ़्ज़ का इस्तेमाल करता है.


रमज़ान अब अपनी रहमत और बरकत लेकर आ चुका है.आओ लिपट कर रो लें. अपनी भूल और कोताहियों के लिए. साथ ही ऐसे तमाम ज़रूरतमंद के लिए अपनी-अपनी थैली खोल दें.
हम तुमसे कह रहे भाई. जिनके पास अपनी जरूरत के बाद इफ़रात जमा है कि उसे जमाखोरी कहने से गुरेज़ नहीं. और कहते हो कि इस्लाम को मानते हो। गर मानते हो तो जान भी लो कि जमाखोरी इस्लाम में हराम है. रसूलल्लाह की सुन लो, जमाखोरी करने वाला मुजरिम है(मुस्लिम 1605).

अगर मालदार के न देने की वजह से भूखे और नंगे लोग तकलीफ़ में पड़ जाएं तो अल्लाह उनसे हिसाब लेगा और सज़ा देगा(मुस्लिम 1785).
तुमने कभी देखा आस पास। घुट-घुट रेंगते बच्चे. पेट संभाले पैर घसीटती औरत. दो महीने की दिहाड़ी को टुक खपरे में गिनता दो बच्चे का बाप. देख रहे हो न! तुम तो समझ रहे कि नमाज़ पढ़ लिया. उमरा और हज कर लिया. ये ढाल इस मामले में कभी नहीं बन सकेंगे. क्योंकि ये दौलत भी उसी की बदौलत है, जो बेबस है। कोई मुफ़्ती हो या आलिम.

मदरसे का मोहतमिम हो या ख़ानक़ाह का सज्जादा नशीं. कोई भी किसी का माल जायदाद हड़पने का अधिकारी नहीं हो जाता है. ” गर लोग सोना-चांदी जमा करते हैं लेकिन अल्लाह की राह में (ज़कात) नहीं निकालते तो उनकी ख़ैर नहीं. जहन्नुम की आग में जब ये तपेंगे. उनकी ललाटों, उनके पहलुओं और उनकी पीठों को दागा जाएगा. और कहा जाएगा, ये वही है जिसे तुमने अपने लिए जमा किया अब इसका मज़ा चखो! (सूर: तौबा: 34-35)


फिर पढ़ो, ” जो नमाज़ तो पढ़ते हैं लेकिन मुहताज (असहाय) को खाना नहीं खिलाते और यतीम (अनाथ) को धक्के देकर भगा देते हैं, तो उनकी नमाज़ का कोई अर्थ नहीं. वो महज़ दिखावा है (सूरे माऊन).
इससे पहले कि तुम्हारी जमा रक़म और जायदाद ज़हरीले सांप बनकर गले में लिपट जाएं और डसते रहें बार-बार हज़ार बार चेत जाओ न! वरना यह कोई झूठ बात नहीं। रसूलल्लाह की हदीस है कि जिसने ज़कात अदा न की तो क़यामत के दिन उसके दोनों जबड़े को पकड़ सांप बोलेगा, मैं ही तेरा माल हूँ। मैं ही तेरा खज़ाना हूँ.

रमज़ान है। दिल पर हाथ रख कर रूह की क़सम बोलना क्या ईमानदारी से ज़कात अदा हो रही है. सवाल इसलिए कि गर ऐसा होता, तो मुस्लिम बेकार न होते, बदहाल न होते. फ़ाक़ा कशी के शिकार न होते. मौजूदा दौर के बड़े इस्लामी स्कॉलर सैयद अब्दुल्लाह तारिक़ कहते हैं कि गर अपने मुल्क में लोग ज़कात देने लगें तो कुल रक़म 25हज़ार करोड़ हर साल हो जाये। सोचो इस रक़म से कितना आर्थिक और सामाजिक बदलाव आ जाए. यही तो इस्लाम चाहता है, कि धीरे-धीरे ग़ैर-बराबरी मिट जाए। इक़बाल जैसा शायर अपने फ़ारसी शेर में कहता भी है:
कस नबाशद दर जहाँ मुहताज कस
नुक्ता-ए-शरअ मुबीं ईं अस्त ओ बस.

(दुनिया में कोई किसी का मोहताज नहीं होगा, शरियत का यही उसूल है और बस)
और इसके लिए ज़रूरियात के बाद किसी भी शक्ल में पैसा, जायदाद क़रीब 87 ग्राम सोना (20 दीनार सोने के सिक्के) के मूल्य का या इससे अधिक जमा है, तो उसका ढाई फ़ीसदी गरीबों में बांट देना है. इसे ही ज़कात कहते हैं. साल में एक बार ही तो देना है, उसमें भी कंजूसी। शर्म नहीं आती जी। इतनी सी बात समझ में नहीं आती. जबकि क़ुरआन में 100 से ज़्यादा जगह पर अक़्ल के इस्तेमाल पर ज़ोर दिया गया है। और मियां रमज़ान है. जिसमें रसूलल्लाह सबसे अधिक सख़ी (दानी) हो जाया करते थे। यही रिवायत है आओ दाना (अक़्लमंद) बनो और दानी भी.

सैयद शहरोज़ क़मर की फेसबुक वाल से साभार