वक्फ संशोधन बिल के पीछे बड़ा खेल, मुसलमानों को बांटने की साजिश?
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
वक्फ संशोधन बिल लोकसभा में पारित होने के बाद देशभर के मुस्लिम संगठनों, विशेष रूप से बिहार के मुस्लिम समुदाय को सतर्क हो जाना चाहिए। इस बिल का विरोध करने वाले ‘हम’ पार्टी के जीतन राम मांझी और लोजपा के चिराग पासवान अब भाजपा के गहरे राजनीतिक षड्यंत्र का हिस्सा बन चुके हैं। भाजपा और आरएसएस के इंद्रेश कुमार के नेतृत्व में एक मुस्लिम संगठन वर्षों से पसमांदा और सूफीवाद के नाम पर मुस्लिम समाज में फूट डालने का प्रयास कर रहा है। इस साजिश को आगे बढ़ाने के लिए दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन दरगाह और अजमेर की ख्वाजा गरीब नवाज दरगाह से जुड़े कुछ लोगों को भी शामिल किया गया है।
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वक्फ संशोधन बिल और राजनीतिक रणनीति
बिल पारित होने के बाद मुस्लिम समाज के आक्रोश को नियंत्रित करने और उनमें भ्रम फैलाने के लिए पसमांदा और सूफीवाद का सहारा लिया जा रहा है। इस पूरे षड्यंत्र में जीतन राम मांझी और चिराग पासवान को एक रणनीतिक मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
जब रमज़ान के दौरान चिराग पासवान की इफ्तार पार्टी का विरोध हुआ था, तब उन्होंने खुद को मुसलमानों का हितैषी बताया था। लेकिन जैसे ही वक्फ संशोधन बिल पारित हुआ, उन्होंने अपना रुख बदल लिया। अब वे यह कहकर भ्रम पैदा कर रहे हैं कि इसका विरोध केवल ऊंची जातियों के मुसलमान कर रहे हैं, जबकि इसका लाभ दबे-कुचले और पिछड़े मुसलमानों को मिलेगा।
भाजपा और आरएसएस का ‘देशज’ मुसलमान बनाम ‘विदेशी’ मुसलमान एजेंडा
आरएसएस और भाजपा से जुड़े कुछ मुस्लिम समूह यह प्रचार कर रहे हैं कि भारतीय मुसलमान दो वर्गों में बंटे हुए हैं—’देशज’ और ‘विदेशी’। वे शेख, सैयद, पठान समुदायों को बाहरी बताते हुए यह सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं कि भारतीय मुसलमानों के पूर्वज हिंदू थे, जो बाद में इस्लाम में परिवर्तित हुए। यह विचारधारा मुस्लिम समाज को विभाजित करने का एक और प्रयास है।
जीतन राम मांझी और चिराग पासवान के बयान
जीतन राम मांझी:
उन्होंने कहा कि 2010 में लालू प्रसाद यादव ने वक्फ कानून को मजबूत करने की मांग की थी, लेकिन अब वे केवल इसलिए विरोध कर रहे हैं क्योंकि इसे मोदी सरकार ने लागू किया है।
चिराग पासवान:
उन्होंने दावा किया कि यह बिल शोषित मुस्लिम समुदाय के लिए फायदेमंद है और विपक्ष जानबूझकर गरीब मुसलमानों को उनका हक मिलने से रोक रहा है।
सूफीवाद के नाम पर भ्रम फैलाने की कोशिश
बिल पारित होते ही दिल्ली की निजामुद्दीन दरगाह के बाहर मिठाई बांटी गई। ‘इंडिया सूफी संगठन’ जैसे कुछ संगठनों ने इसे गरीब मुसलमानों के लिए फायदेमंद बताया। सूफी फाउंडेशन के अध्यक्ष कशिश वारसी और ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने भी इस बिल का समर्थन किया। यह एक सोची-समझी रणनीति थी ताकि मुस्लिम समाज के भीतर विरोध को कमजोर किया जा सके।
आगे की रणनीति
- पिछड़े मुसलमानों को इस विरोध में शामिल किया जाए – उन्हें यह समझाना होगा कि यह बिल उनके खिलाफ है और भाजपा-आरएसएस केवल उन्हें इस्तेमाल कर रही है।
- बिल के समर्थकों को बेनकाब किया जाए – चिराग पासवान और जीतन राम मांझी जैसे नेताओं के असली मंसूबे उजागर किए जाएं।
- पिछड़े मुसलमानों को भाजपा और जदयू से इस्तीफा देने के लिए प्रेरित किया जाए – इससे साबित होगा कि यह केवल ऊंची जातियों का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे मुस्लिम समाज का मामला है।
- चुनावी रणनीति बनाई जाए – मुस्लिम समुदाय को उन नेताओं का समर्थन नहीं करना चाहिए जो उनके मुद्दों पर चुप रहते हैं या उन्हें कमजोर करने की साजिश में शामिल हैं।
- युवाओं को सक्रिय किया जाए – सांस्कृतिक और राजनीतिक संघर्ष में युवाओं की भागीदारी जरूरी है।
काबिल ए गौर
मुसलमानों के खिलाफ लगातार एक सुनियोजित षड्यंत्र चल रहा है। यदि इस पर अभी से कार्रवाई नहीं की गई, तो भविष्य में और भी गंभीर फैसले लिए जा सकते हैं। मुस्लिम समाज को एकजुट होकर अपने हक और पहचान की रक्षा के लिए लड़ना होगा।