धार्मिक स्थलों पर बुलडोजर कार्रवाई: मुस्लिम बुद्धिजीवियों में कानूनी लड़ाई पर मंथन
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प्रोफेसर अख्तर जमाल
देश के अलग-अलग राज्यों से इन दिनों अवैध निर्माण के नाम पर मस्जिदों, मदरसों और दरगाहों को हटाए जाने की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। इस प्रशासनिक कार्रवाई ने अब मुस्लिम समुदाय के भीतर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। देश के मुस्लिम बुद्धिजीवियों और जानकारों के बीच इस बात को लेकर गंभीर मंथन शुरू हो गया है कि क्या इस स्थिति से निपटने के लिए उन्हें भी देश भर में बने कथित अवैध मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों के खिलाफ एक व्यवस्थित कानूनी अभियान शुरू करना चाहिए।
हाल ही में दिल्ली में हुई मुस्लिम बुद्धिजीवियों की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस इसी वैचारिक हलचल की ओर इशारा करती है। इस बैठक में खुलकर यह बात सामने आई कि हालांकि उन्हें मौजूदा न्यायिक व्यवस्था से पूरी राहत मिलने की उम्मीद महज पचास प्रतिशत ही है, फिर भी वे पीछे नहीं हटेंगे। मुस्लिम समुदाय अब मस्जिदों और दरगाहों को अवैध बताकर ढहाने के सरकारी फैसलों के खिलाफ देश की अदालतों में मजबूती से कानूनी लड़ाई लड़ने की तैयारी कर रहा है।
क्या देश में शुरू होगा अवैध धार्मिक स्थलों के खिलाफ जवाबी कानूनी मोर्चा
इस पूरे घटनाक्रम के बीच मुस्लिम समाज के भीतर यह सवाल भी तेजी से उठ रहा है कि क्या उन्हें सूचना का अधिकार (RTI) और जनहित याचिकाओं (PIL) का सहारा लेना चाहिए। इस विचार के समर्थकों का मानना है कि इसके जरिए देश भर में सार्वजनिक जमीनों पर बने अवैध मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों का पुख्ता आंकड़ा इकट्ठा किया जा सकता है। इसके बाद यह डेटा सरकार और प्रशासन को सौंपकर उन्हें भी हटाने की कानूनी मांग की जा सकती है।
हालांकि, इस तरह के किसी भी अभियान को लेकर देश के गंभीर नागरिकों में एक बड़ी चिंता भी है। जानकारों का मानना है कि अगर इस तरह का कोई जवाबी अभियान शुरू होता है तो इससे देश के भीतर सामाजिक तनाव और सांप्रदायिक दूरियां काफी बढ़ सकती हैं। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की छवि पर इसका विपरीत असर पड़ सकता है। इसके बावजूद, जमीनी स्तर पर बढ़ रही कार्रवाइयों के कारण मुस्लिम बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग अब ‘जैन पिता-पुत्र’ जैसी कानूनी लड़ाइयों का उदाहरण दे रहा है ताकि हर तरह के अवैध निर्माणों का कानूनी शिजरा यानी इतिहास खंगाला जा सके।
कई राज्यों से आ रही हैं धार्मिक और आवासीय स्थल ढहाने की खबरें
पिछले कुछ समय में देश के विभिन्न हिस्सों जैसे गुजरात के कच्छ, राजस्थान के बाड़मेर, उत्तर प्रदेश के संभल के साथ-साथ हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से मुस्लिम धार्मिक स्थलों को हटाए जाने के मामले सामने आए हैं।
गुजरात के कच्छ स्थित वरनोरा गांव में हाल ही में मुस्लिम समुदाय के घरों, दुकानों और कुछ धार्मिक स्थलों पर प्रशासन का बुलडोजर चला। इस कार्रवाई के विरोध में स्थानीय लोगों और न्यायप्रिय नागरिकों ने बड़ी संख्या में इकट्ठा होकर कलेक्टर ऑफिस पर प्रदर्शन किया और प्रशासन को एक ज्ञापन सौंपा। इस प्रदर्शन के दौरान स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं ने साफ तौर पर कहा कि अगर उन्हें इस मामले में प्रशासन और कानून से न्याय नहीं मिला, तो वे इसके खिलाफ एक बड़ा ‘जेल भरो आंदोलन’ शुरू करने के लिए मजबूर होंगे।
इसके अलावा, राजस्थान के बाड़मेर में भारत-पाकिस्तान सीमा के पास भी कुछ धार्मिक ढांचों को हटाने की खबरें आई थीं। वहीं, उत्तर प्रदेश के संभल में भी हाल ही में एक मस्जिद को ढहाया गया। हरियाणा के फरीदाबाद में भी पुराने शहर की एक काफी पुरानी मस्जिद को हटाकर वहां सड़क निर्माण किए जाने का मामला सामने आया है। पश्चिम बंगाल से भी एक रेलवे स्टेशन के किनारे बनी मस्जिद को हटाने की प्रशासनिक प्रक्रिया शुरू होने की चर्चा है।
कच्छ के मुस्लिम समुदाय द्वारा वरनोरा गाँव में मुस्लिम समुदाय के घरों, दुकानों और कच्छ के अलग अलग विस्तारो में धार्मिक स्थानों के किए जा रहे डिमोलिशन के ख़िलाफ़ बड़ी संख्या में मौजूद न्यायप्रिय लोगों ने कलेक्टर ऑफिस पर प्रदर्शन कर ज्ञापन दिया।
— Abha Shukla (@abhaShukla23) June 27, 2026
अगर न्याय नहीं मिला तो जेल भरो… pic.twitter.com/BjbMACMWyo
नियमों के पालन पर उठ रहे हैं दोहरे मापदंड के सवाल
मुस्लिम बुद्धिजीवियों का कहना है कि जिन मुस्लिम धार्मिक स्थलों को अवैध बताकर निशाना बनाया जा रहा है, उनमें से कई काफी पुराने हैं। जब वे बने थे, तब के नियम-कायदे अलग थे और लंबे समय तक किसी भी सरकारी एजेंसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। वे सवाल उठा रहे हैं कि यही स्थिति देश के कई अन्य धार्मिक स्थलों की भी है, जिनका अगर आज कानूनी रिकॉर्ड ढूंढा जाए तो शायद नहीं मिलेगा।
इस संदर्भ में हरियाणा के दो बड़े शहरों का उदाहरण भी दिया जा रहा है:
- फरीदाबाद: यहां हाल ही में स्थापित की गई एक बहुत बड़ी हनुमान प्रतिमा के निर्माण को लेकर कुछ स्थानीय लोगों ने सवाल उठाए हैं कि क्या इसके लिए जरूरी कानूनी मंजूरियां ली गई थीं।
- गुरुग्राम: शहर के व्यस्त कटारिया चौक के पास बने एक नए मंदिर को लेकर भी विवाद है। यह इलाका अरावली क्षेत्र और इंडियन एयर फोर्स स्टेशन के काफी करीब आता है, जहां सुरक्षा और पर्यावरण नियमों के कारण किसी भी तरह के नए निर्माण पर पूरी तरह पाबंदी है। लोग सवाल कर रहे हैं कि अगर नियम सबके लिए बराबर हैं तो इन महत्वपूर्ण स्थानों पर निर्माण की इजाजत कैसे मिली।
इसी तरह बिहार के कई चौक-चौराहों पर बनी हनुमान जी की मूर्तियों और मंदिरों का जिक्र करते हुए लोग तंज में उन्हें ‘अतिक्रमण वाले बाबा’ तक कहने लगे हैं।
प्राचीन बौद्ध मठों के हक की मांग भी पकड़ रही है जोर
इस पूरी कानूनी और सामाजिक बहस के बीच देश के नवबौद्ध संगठनों की पुरानी मांगें भी एक बार फिर चर्चा में आ गई हैं। नागपुर और देश के अन्य हिस्सों के बौद्ध संगठन पिछले लगभग तीन दशकों से बिहार के बोधगया में स्थित महाबोधि मंदिर को लेकर आंदोलन कर रहे हैं।
बौद्ध बुद्धिजीवियों का कहना है कि इतिहास में कई प्राचीन बौद्ध मठों की वास्तविकता को बदलकर उन्हें दूसरे रूप दे दिए गए थे। अब मुस्लिम बुद्धिजीवियों के एक वर्ग का मानना है कि देश में ऐतिहासिक और कानूनी सच्चाई को सामने लाने के लिए एक ऐसा साझा अभियान चलना चाहिए जो सभी प्राचीन बौद्ध स्थलों की वास्तविकता को सामने लाए और उन्हें उनका पुराना गौरव और सम्मान वापस दिला सके।
सामाजिक सौहार्द के लिए बढ़ता खतरा और राजनीति का खेल
जैसे-जैसे देश के अलग-अलग कोनों से एकतरफा प्रशासनिक कार्रवाइयों की खबरें सोशल मीडिया और समाचारों के माध्यम से आम लोगों तक पहुंच रही हैं, मुस्लिम समुदाय का एक खास वर्ग खुद को असुरक्षित और उद्वेलित महसूस कर रहा है। कुछ समय पहले इस तरह की घटनाओं पर आई तीखी प्रतिक्रियाओं के दौरान जमीयते उलेमा-ए-हिंद के मौलाना अरशद मदनी जैसे धार्मिक नेताओं के बयानों पर काफी बड़ा राजनीतिक बवाल भी खड़ा हो चुका है।
देश के निष्पक्ष विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि धार्मिक स्थलों को राजनीति और वोटों के खेल का जरिया बनाना देश के भविष्य के लिए एक बहुत बड़ी मुसीबत साबित हो सकता है। अगर प्रशासन की कार्रवाइयों में पारदर्शिता और निष्पक्षता नहीं दिखी, तो दोनों समुदायों के बीच पैदा होने वाली तनातनी किसी भी दिन एक विस्फोटक स्थिति का रूप ले सकती है। देश में अमन-चैन बनाए रखने के लिए यह बेहद जरूरी है कि कानून का पालन बिना किसी भेदभाव के हर नागरिक और हर धार्मिक स्थल पर समान रूप से लागू किया जाए।

