वक्फ संशोधन कानून को रद्द करो : केरल में मुस्लिम महिलाओं की कॉन्फ्रेंस में उठी मांग
फैसल मसूद:,एर्नाकुलम
वक्फ संशोधन कानून को रद्द करने की मांग को लेकर केरल के एर्नाकुलम टाउन हॉल में “वक्फ बचाओ, संविधान बचाओ” के शीर्षक के तहत एक भव्य कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन का आयोजन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और केरल की विभिन्न मुस्लिम महिला संगठनों ने संयुक्त रूप से किया। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि के रूप में कैराना, उत्तर प्रदेश की सांसद इकरा हसन मौजूद रहीं और उन्होंने विशेष संबोधन दिया।

अपने भाषण में उन्होंने कहा:
“वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 सीधे समुदाय की स्वायत्तता को चोट पहुंचाता है, अल्पसंख्यकों के अधिकारों को कमजोर करता है और हमारे लोकतंत्र के संवैधानिक संतुलन को बिगाड़ता है।”
कानून विशेषज्ञों के अनुसार, “वक्फ संपत्तियाँ ऐतिहासिक रूप से समुदाय द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, अनाथालयों, दरगाहों, मस्जिदों और सामाजिक कल्याण के लिए बनाई गई थीं। यह देश में सामुदायिक नेतृत्व वाली जनकल्याण की सबसे पुरानी और स्थायी व्यवस्थाओं में से एक रही हैं।”
“सदियों से वक्फ प्रणाली ने बिना राज्य पर निर्भर हुए लाखों भारतीयों की मदद की है। लेकिन नई संशोधन ने वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन, निगरानी और यहाँ तक कि उनके निपटान का अभूतपूर्व अधिकार केंद्र सरकार को दे दिया है। यह स्वायत्तता को छीनने वाला कदम है, जो समुदाय की समझ, इतिहास और स्वराज को नजरअंदाज करता है। यह सुधार नहीं, नियंत्रण है — और वह भी बिना किसी परामर्श के। यह लोकतांत्रिक शासन नहीं, बल्कि अतिक्रमण है।”

उन्होंने आगे कहा कि संविधान का अनुच्छेद 26 प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय को अपने धार्मिक मामलों और संस्थानों का प्रबंधन करने का अधिकार देता है।
“अगर आज वक्फ की ज़मीनें छीनी जा सकती हैं, तो कल यह ईसाई धर्मार्थ ट्रस्ट, सिख गुरुद्वारों की संपत्तियों या किसी अन्य धार्मिक न्यास पर भी लागू हो सकता है। यह केवल मुसलमानों का मुद्दा नहीं है, यह भारत के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष चरित्र का मुद्दा है।”
इकरा हसन ने यह भी कहा,
“ऐसा समझा जाता है कि ज़मीन, कानून और शासन जैसे मुद्दे महिलाओं से दूर होते हैं। लेकिन यह धारणा मुस्लिम महिलाओं पर कभी लागू नहीं हुई। मुस्लिम महिलाएं केवल दर्शक नहीं हैं, बल्कि इस वक्फ व्यवस्था की भागीदार, सहयोगी और नेतृत्वकर्ता भी हैं।”
उन्होंने इसे “संवैधानिक संकट” करार देते हुए कहा कि यह केवल ज़मीन का मामला नहीं, बल्कि अधिकारों, सम्मान और सरकार की शक्ति की सीमा का सवाल है।
“इस कानून को आगे बढ़ाकर सरकार ने लोकतांत्रिक परामर्श की प्रक्रिया को नज़रअंदाज़ किया है, अल्पसंख्यकों की स्वायत्तता को कुचला है, और केंद्र तथा राज्यों के बीच संतुलन को अस्थिर कर दिया है।”
कॉन्फ्रेंस में समाज, संस्कृति और राजनीति के क्षेत्र की कई जानी-मानी हस्तियों ने भाग लिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की कार्यकारिणी सदस्य रहमतुन्निसा ए. ने की, जबकि संचालन बोर्ड की संयोजिका एडवोकेट जलीसा सुल्ताना ने किया।
सम्मेलन को संबोधित करने वालों में प्रमुख थीं:
- फातिमा मुजफ्फर – राष्ट्रीय अध्यक्ष, IUML महिला विंग
- डॉ. सोया जोसफ – राज्य महासचिव, यूथ कांग्रेस
- डॉ. क़ुदूसा सुल्ताना – प्रोफेसर, डेक्कन कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग
- साजिदा पीटीपी – राज्य अध्यक्ष, जमाअत इस्लामी हिंद केरल महिला विंग
- सलमा अनवारिया – राज्य अध्यक्ष, MGMVA
- फैज़ा – राज्य अध्यक्ष, वीमेन जस्टिस मूवमेंट
- एडवोकेट कुलसुम – राज्य सचिव, ALIG
- एडवोकेट फरीदा अंसारी – लीगल सेल कन्वीनर
- अर्शना – राज्य महासचिव, वीमेन इंडिया मूवमेंट
- रज़िया के. – सचिव, MSS एर्नाकुलम
- मुबश्शिरा एम. – राज्य सचिव, GIO
- हाजरा के.ए. – सचिव, IGM
- और डॉ. समी आमिर
सभी वक्ताओं ने वक्फ एक्ट 2025 के दुष्परिणामों पर गहरी चिंता व्यक्त की और सरकार की दोहरी नीति को उजागर किया।
उन्होंने निम्नलिखित मांगें कीं:
- वक्फ संशोधन कानून 2025 की तत्काल रद्दीकरण
- राज्य वक्फ बोर्ड की स्वायत्तता की बहाली
- संविधान के अनुच्छेद 26, 29 और 30 के तहत अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा
- और धार्मिक न्यासों पर किसी भी क़ानूनी संशोधन से पहले समुदाय से परामर्श
वक्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह समाज की भलाई, धार्मिक विश्वासों और सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा का मामला है — जिसे अनदेखा करना भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को नुकसान पहुंचा सकता है।
कार्यक्रम का स्वागत भाषण आयोजक समिति की संयोजिका साजिदा नौशाद ने दिया और धन्यवाद ज्ञापन राज्य समन्वयक खदीजा रहमान ने प्रस्तुत किया।

