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जम्मू कश्मीर में जुमे के खुतबे पर विवाद, वक्फ बोर्ड की सफाई

श्रीनगर, नई दिल्ली।

जम्मू कश्मीर में जुमे की नमाज के दौरान मस्जिदों में दिए जाने वाले खुतबे को लेकर राजनीतिक और धार्मिक बहस तेज हो गई है। विवाद का केंद्र वक्फ बोर्ड की ओर से इमामों और धार्मिक विद्वानों के साथ मिलकर सामाजिक मुद्दों पर समन्वित खुतबे की पहल है। नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और कई मुस्लिम धार्मिक संगठनों ने इस पहल पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि मस्जिद के मिंबर और धार्मिक उपदेशों की दिशा तय करने का अधिकार सरकार या राजनीतिक संस्थाओं के बजाय उलेमा और इमामों के पास होना चाहिए।

दूसरी ओर, जम्मू कश्मीर वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष और भाजपा नेता डॉ. दरख्शां अंदराबी ने आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि नशे की लत, आत्महत्या, पारिवारिक समस्याओं, लड़कियों की शादी और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर समाज में जागरूकता बढ़ाना इस पहल का उद्देश्य है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इमामों को जुमे के खुतबे के लिए कोई अनिवार्य निर्देश या आदेश जारी नहीं किया गया है।

इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। सामाजिक समस्याओं पर अलग-अलग मस्जिदों में समान विषयों पर बात करने की पहल और सरकार की ओर से धार्मिक उपदेशों की सामग्री निर्धारित करना दो अलग बातें हैं। उपलब्ध रिपोर्ट में वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष ने किसी बाध्यकारी आदेश से इनकार किया है, जबकि आलोचक इस पहल के धार्मिक स्वायत्तता पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर चिंतित हैं।

खुतबे की धार्मिक परंपरा और उसका महत्व

इस्लाम में खुतबे का विशेष महत्व है। खुतबा केवल धार्मिक उपदेश नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से इमाम लोगों को ईमान, नैतिकता, सामाजिक जिम्मेदारियों और इंसानी रिश्तों के बारे में मार्गदर्शन देते हैं। जुमे की नमाज के दौरान दिया जाने वाला खुतबा मुस्लिम समुदाय के धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ईद और बकरीद के अवसर पर होने वाले धार्मिक संबोधन भी मुसलमानों के लिए विशेष महत्व रखते हैं।

इस्लामी परंपरा में पैगंबर मुहम्मद साहब का विदाई खुतबा भी विशेष स्थान रखता है। इसमें इंसानी समानता, न्याय, अधिकारों और जिम्मेदारियों से संबंधित महत्वपूर्ण संदेश दिए गए थे। समय और परिस्थितियों के अनुसार इमाम अपने खुतबे में धार्मिक शिक्षाओं के साथ समाज की समस्याओं पर भी चर्चा करते हैं।

जम्मू कश्मीर में मौजूदा विवाद इसी सवाल से जुड़ा है कि क्या विभिन्न मस्जिदों में एक ही विषय पर खुतबा देने के लिए समन्वय किया जाना चाहिए और ऐसी पहल की सीमाएं क्या होनी चाहिए।

आलोचकों का कहना है कि खुतबे का विषय तय करने में धार्मिक विद्वानों की स्वतंत्रता और स्थानीय परिस्थितियों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उनके अनुसार, किसी प्रशासनिक या राजनीतिक संस्था की ओर से धार्मिक उपदेशों की सामग्री तय करने की कोशिश धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप का कारण बन सकती है।

हालांकि, सामाजिक बुराइयों के खिलाफ सामूहिक जागरूकता अभियान चलाने के समर्थक इसे समुदाय के भीतर सकारात्मक बदलाव की कोशिश मानते हैं। विवाद इस बात पर है कि ऐसी पहल किस प्रक्रिया से आगे बढ़े और इसमें निर्णय लेने का अधिकार किसके पास हो।

वक्फ बोर्ड ने क्या कहा?

जम्मू कश्मीर वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष डॉ. दरख्शां अंदराबी ने आलोचनाओं का जवाब देते हुए कहा कि सामाजिक समस्याओं पर चर्चा के लिए इमामों और धार्मिक विद्वानों की बैठक हुई थी। इस बैठक में समाज के सामने मौजूद कई गंभीर मुद्दों पर विचार किया गया।

इनमें नशे की बढ़ती समस्या, आत्महत्या की घटनाएं, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताएं, लड़कियों की शादी से जुड़े मामले और कश्मीर के कुछ इलाकों में बागों के पेड़ काटे जाने की घटनाएं शामिल हैं।

अंदराबी ने सवाल उठाया कि अगर समाज में ऐसी समस्याएं मौजूद हैं, तो उनके समाधान के लिए जागरूकता कौन फैलाएगा। उनका कहना था कि इमाम और धार्मिक विद्वान अपने उपदेशों के माध्यम से लोगों को सामाजिक सुधार के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि अलग-अलग मस्जिदों में इमाम पहले से ही अपने इलाकों की समस्याओं पर बात करते रहे हैं। वक्फ बोर्ड की पहल का उद्देश्य धार्मिक विद्वानों को एक मंच पर लाकर सामाजिक मुद्दों पर चर्चा को प्रोत्साहित करना है।

अंदराबी ने इस आरोप को भी खारिज किया कि सरकार ने इमामों को खुतबे के लिए कोई निर्देश दिया है। उन्होंने कहा कि इमाम और उलेमा स्वतंत्र हैं और वे जानते हैं कि उन्हें किन विषयों पर बात करनी चाहिए।

उन्होंने नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं पर आधी अधूरी जानकारी के आधार पर विवाद खड़ा करने का आरोप भी लगाया। उनके मुताबिक, धार्मिक मामलों में राजनीतिक बयानबाजी से बचना चाहिए और सामाजिक सुधार के प्रयासों को राजनीति से दूर रखना चाहिए।

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नेशनल कॉन्फ्रेंस ने उठाए अधिकारों पर सवाल

जम्मू कश्मीर की सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस ने वक्फ बोर्ड की पहल पर आपत्ति जताई है। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता और विधायक तनवीर सादिक ने सवाल उठाया कि भाजपा या वक्फ बोर्ड यह कैसे तय कर सकता है कि इमाम और खतीब जुमे की नमाज में क्या बोलेंगे।

उन्होंने कहा कि इस्लाम की शिक्षा हासिल करने में धार्मिक विद्वान अपना जीवन लगाते हैं। इसलिए उनके उपदेश धार्मिक शिक्षाओं, नैतिक मूल्यों और समुदाय की जरूरतों के आधार पर तैयार होने चाहिए।

नेशनल कॉन्फ्रेंस का तर्क है कि यदि किसी संस्था की ओर से खुतबे के विषय निर्धारित किए जाते हैं, तो इससे धार्मिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप की आशंका पैदा होती है। पार्टी ने इस मामले में संबंधित निर्देश वापस लेने की मांग भी उठाई है।

इस विवाद ने जम्मू कश्मीर में वक्फ बोर्ड की भूमिका को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। वक्फ बोर्ड धार्मिक संपत्तियों और उनसे जुड़े प्रशासनिक मामलों के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन धार्मिक उपदेशों के विषय तय करने में उसकी भूमिका कितनी होनी चाहिए, इस पर अलग-अलग विचार सामने आ रहे हैं।

महबूबा मुफ्ती ने भी जताई आपत्ति

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष और जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि भाजपा वक्फ बोर्ड के माध्यम से इमामों के उपदेश तय नहीं कर सकती।

महबूबा मुफ्ती के अनुसार, जुमे के खुतबे में स्थानीय परिस्थितियों और समुदाय के सामने मौजूद समस्याओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए। अलग-अलग इलाकों की सामाजिक चुनौतियां एक जैसी नहीं होतीं। इसलिए सभी मस्जिदों के लिए एक समान प्रारूप अपनाना स्थानीय वास्तविकताओं की अनदेखी कर सकता है।

उनका कहना है कि धार्मिक विद्वानों को अपने समुदाय का मार्गदर्शन करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। धार्मिक परंपराओं से जुड़े फैसलों में समुदाय और उसके विद्वानों की भूमिका महत्वपूर्ण है।

इस तरह नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी, दोनों ने इस पहल को धार्मिक मामलों में संभावित हस्तक्षेप के रूप में देखा है। हालांकि, वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष का कहना है कि किसी बाध्यकारी निर्देश की बात सही नहीं है। यही अंतर इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

मीरवाइज उमर फारूक और मुत्तहिदा मजलिस ए उलेमा की भूमिका

कश्मीर के प्रमुख धार्मिक नेता मीरवाइज उमर फारूक ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। मुत्तहिदा मजलिस ए उलेमा (एमएमयू) ने एक समान जुमे के खुतबे निर्धारित करने के किसी भी प्रयास का कड़ा विरोध किया है।

मीरवाइज से जुड़े संगठन का कहना है कि मस्जिद का मिंबर एक धार्मिक अमानत है। धार्मिक मार्गदर्शन की जिम्मेदारी उलेमा और इमामों की है, न कि सरकार से जुड़ी संस्थाओं की। संगठन ने वक्फ बोर्ड से अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों तक सीमित रहने की अपील की है।

हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, मीरवाइज उमर फारूक ने श्रीनगर की जामिया मस्जिद में अपने खुतबे के दौरान समाज की समस्याओं पर भी चर्चा की थी। उन्होंने शेख नूरुद्दीन नूरानी को श्रद्धांजलि देते हुए ईमान को मुस्लिम उम्माह को जोड़ने वाला साझा आधार बताया।

उन्होंने घोषणा की कि शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026 को भाग लेने वाली मस्जिदों और इमामबाड़ों में समन्वित खुतबे का पहला विषय ईमान होगा।

एमएमयू की 15 सितंबर को हुई बैठक में पहचाने गए दूसरे विषयों में मुस्लिम उम्माह की एकता, नशे की समस्या, आत्महत्या, मानसिक स्वास्थ्य, युवाओं की चुनौतियां, सोशल मीडिया का दुरुपयोग, पारिवारिक समस्याएं और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इन विषयों पर आने वाले शुक्रवारों में क्रमशः चर्चा की जानी है।

इससे स्पष्ट होता है कि सामाजिक मुद्दों पर सामूहिक चर्चा का विचार धार्मिक विद्वानों के बीच भी मौजूद है। लेकिन इस कार्यक्रम की प्रकृति, इसके संचालन और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सवालों पर मतभेद बने हुए हैं।

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क्या वाकई जारी हुआ था कोई आदेश?

इस पूरे विवाद में एक और महत्वपूर्ण पक्ष सामने आया है। जम्मू कश्मीर के काउंटर डिसइनफॉर्मेशन सेंटर ने सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ दावों को भ्रामक बताया है। केंद्र के अनुसार, वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष ने स्पष्ट किया था कि एक समान जुमे के खुतबे के संबंध में कोई औपचारिक निर्देश या आदेश जारी नहीं किया गया।

दूसरी ओर, मीडिया रिपोर्टों में इमामों और धार्मिक विद्वानों की एक कोर कमेटी बनाने तथा साझा विषयों की पहचान करने की पहल का उल्लेख किया गया है। इन दोनों बातों को अलग-अलग समझना जरूरी है। किसी साझा कार्यक्रम पर चर्चा होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि सभी मस्जिदों के लिए बाध्यकारी आदेश जारी कर दिया गया है।

इसलिए विवाद पर निष्कर्ष निकालने से पहले बैठक के निर्णय, कोर कमेटी की भूमिका और किसी औपचारिक आदेश की वास्तविक स्थिति को स्पष्ट करना आवश्यक है।

आगे क्या होगा?

जम्मू कश्मीर में जुमे के खुतबे को लेकर उठा विवाद धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक सुधार और संस्थागत अधिकारों के बीच संतुलन का सवाल बन गया है। नशे की लत, आत्महत्या, मानसिक स्वास्थ्य और पर्यावरण जैसे मुद्दे निश्चित रूप से समाज के लिए गंभीर हैं। इन पर मस्जिदों में जागरूकता फैलाने से लोगों तक महत्वपूर्ण संदेश पहुंच सकते हैं।

लेकिन ऐसी किसी पहल की स्वीकार्यता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि उसमें इमामों और उलेमा की स्वतंत्रता का कितना सम्मान किया जाता है। यदि साझा विषयों पर चर्चा धार्मिक विद्वानों की सहमति से होती है, तो इसे सामाजिक जागरूकता का माध्यम बनाया जा सकता है। इसके विपरीत, यदि धार्मिक उपदेशों को राजनीतिक नियंत्रण में लाने की आशंका पैदा होती है, तो विवाद और गहरा सकता है।

फिलहाल वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष ने किसी अनिवार्य आदेश से इनकार किया है, जबकि विपक्षी दलों और एमएमयू ने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप को लेकर चिंता जताई है। आने वाले दिनों में इस पहल का स्वरूप और उसका संचालन यह तय करने में महत्वपूर्ण होगा कि जम्मू कश्मीर में यह विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है।

प्रमुख सवाल-जवाब

सवाल: जम्मू कश्मीर में जुमे के खुतबे को लेकर विवाद क्यों हुआ?

जम्मू कश्मीर वक्फ बोर्ड की ओर से इमामों और धार्मिक विद्वानों के साथ साझा विषयों पर खुतबे के समन्वय की पहल के बाद विवाद हुआ। आलोचकों ने धार्मिक स्वतंत्रता पर संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठाए।

सवाल: दरख्शां अंदराबी ने क्या सफाई दी?

उन्होंने कहा कि सामाजिक समस्याओं पर चर्चा के लिए धार्मिक विद्वानों की बैठक हुई थी। उनके अनुसार, जुमे के खुतबे के लिए कोई अनिवार्य निर्देश या आदेश जारी नहीं किया गया।

सवाल: किन मुद्दों पर खुतबे देने की बात है?

ईमान, मुस्लिम उम्माह की एकता, नशे की समस्या, आत्महत्या, मानसिक स्वास्थ्य, युवाओं की चुनौतियां, सोशल मीडिया का दुरुपयोग, पारिवारिक समस्याएं और पर्यावरण प्रमुख विषय हैं।

सवाल: इस पहल का विरोध कौन कर रहा है?

नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी और मुत्तहिदा मजलिस ए उलेमा ने इस पहल के स्वरूप और धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप की आशंका पर सवाल उठाए हैं।

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