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ईरान-पाक वार्ता पर विवाद: ‘परमाणु मुद्दे पर चर्चा एक रणनीतिक चूक’

  • विवाद का केंद्र: पाकिस्तान में हुई ईरान-अमेरिका वार्ता।
  • ईरान की आपत्ति: परमाणु मुद्दे को चर्चा में शामिल करना।
  • अमेरिका की मांग: 60% यूरेनियम संवर्धन पर 20 साल की रोक।
  • ट्रंप का रुख: “समझौता तभी होगा जब वह अमेरिका के लिए फायदेमंद होगा।”

तेहरान/वाशिंगटन

ईरान और अमेरिका के बीच पाकिस्तान में हुई हालिया बातचीत को लेकर ईरान के भीतर ही विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। ईरानी संसद की ‘राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति’ के वरिष्ठ सदस्य महमूद नबवियन ने इस वार्ता को ईरान की एक बड़ी ‘रणनीतिक गलती’ करार दिया है। नबवियन का मानना है कि पाकिस्तान की धरती पर परमाणु मुद्दे को बातचीत की मेज पर लाना तेहरान के लिए आत्मघाती कदम साबित हुआ है, जिससे ‘दुश्मन’ के हौसले और बुलंद हो गए हैं।


ईरानी सांसद का तीखा हमला: ‘शत्रु हुआ और भी साहसी’

ईरानी सांसद महमूद नबवियन ने एसएनएन टीवी (SNN TV) को दिए अपने साक्षात्कार के अंश साझा करते हुए स्पष्ट कहा कि पाकिस्तान में हुई वार्ताओं में परमाणु कार्यक्रम को चर्चा का विषय बनाना एक बड़ी कूटनीतिक विफलता थी।

नबवियन के बयान के मुख्य बिंदु:

  • रणनीतिक चूक: नबवियन के अनुसार, “हमे परमाणु मुद्दे को बातचीत की मेज पर रखना ही नहीं चाहिए था। ऐसा करके हमने अपनी स्थिति कमजोर की है।”
  • अमेरिका की कड़ी शर्तें: उन्होंने खुलासा किया कि अमेरिका ने मांग की थी कि ईरान के 60% संवर्धित (Enriched) यूरेनियम को हटा दिया जाए और अगले 20 वर्षों के लिए इस पर रोक लगा दी जाए।
  • मांगों को ठुकराया: नबवियन ने स्पष्ट किया कि तेहरान ने अमेरिका की इन शर्तों को स्वीकार नहीं किया है, क्योंकि ये ईरान की संप्रभुता के खिलाफ हैं।

डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी: ‘ईरान के पास समय कम है’

एक तरफ जहां ईरान के भीतर इस वार्ता को लेकर खींचतान जारी है, वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर दबाव और बढ़ा दिया है। ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक कड़े पोस्ट में ट्रंप ने साफ कर दिया कि वह किसी भी दबाव में समझौता नहीं करेंगे।

ट्रंप के बयान के बड़े मायने:

  1. समय का अभाव: ट्रंप ने चेतावनी दी कि “मेरे पास दुनिया का सारा समय है, लेकिन ईरान के पास नहीं। घड़ी की सुइयां टिक-टिक कर रही हैं (The clock is ticking)!”
  2. सैन्य स्थिति पर कटाक्ष: ट्रंप ने ईरान की सैन्य शक्ति पर प्रहार करते हुए कहा कि उनकी नौसेना समुद्र की तलहटी में है, वायु सेना ध्वस्त हो चुकी है और उनके राडार हथियार खत्म हो गए हैं।
  3. अमेरिका का हित सर्वोपरि: ट्रंप ने स्पष्ट किया कि कोई भी समझौता तभी होगा जब वह संयुक्त राज्य अमेरिका, उसके सहयोगियों और पूरी दुनिया के हित में होगा।

अमेरिकी राजनीति में बढ़ता दबाव और 60 दिनों का टर्निंग पॉइंट

राजनीतिक गलियारों (Politico के अनुसार) में यह चर्चा तेज है कि वाशिंगटन में भी इस संघर्ष को लेकर धैर्य कम हो रहा है। बुधवार को कैपिटल हिल में हुई सुनवाई के दौरान अमेरिकी कैबिनेट अधिकारियों ने ऊर्जा की कीमतों में कमी आने की कोई निश्चित समय सीमा नहीं दी।

वहीं, कुछ रिपब्लिकन सांसदों का मानना है कि इस संघर्ष का ’60-दिवसीय’ पड़ाव एक महत्वपूर्ण मोड़ (Turning Point) साबित हो सकता है। इसके बाद संघर्ष के लिए अमेरिकी समर्थन जारी रखने पर पुनर्विचार किया जा सकता है।


निष्कर्ष: अनिश्चितता के मुहाने पर मध्य-पूर्व

ईरानी सांसद का यह बयान दिखाता है कि ईरान के शासन के भीतर परमाणु नीति और कूटनीति को लेकर गहरे मतभेद हैं। पाकिस्तान में हुई वार्ता ने न केवल क्षेत्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है, बल्कि अमेरिका के कड़े रुख ने ईरान की आर्थिक और सैन्य चिंताओं को भी बढ़ा दिया है।

क्या ईरान अमेरिका की सख्त शर्तों के आगे झुकेगा या नबवियन जैसे नेताओं का दबाव सरकार को और अधिक आक्रामक रुख अपनाने पर मजबूर करेगा? आने वाले कुछ हफ्ते न केवल ईरान की परमाणु क्षमता बल्कि पूरे मध्य-पूर्व की शांति के लिए निर्णायक होने वाले हैं।

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