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Vande Mataram अनिवार्य करने पर विवाद: AIMPLB और जमीयत उलेमा-ए-हिंद का कड़ा विरोध

देश में ‘वंदे मातरम्’ को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। केंद्र सरकार द्वारा जारी एक अधिसूचना में स्कूलों और सरकारी कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के सभी श्लोकों के अनिवार्य पाठ का निर्देश दिए जाने के बाद दो प्रमुख मुस्लिम संगठनों—All India Muslim Personal Law Board (ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड) और Jamiat Ulema-e-Hind—ने इसका कड़ा विरोध दर्ज कराया है।

इन संगठनों का कहना है कि यह कदम न केवल संविधान की भावना के विपरीत है, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता और भारत की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।


“असंवैधानिक और धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ”

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि ‘वंदे मातरम्’ के सभी श्लोकों को अनिवार्य करना संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। बोर्ड ने यह भी दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों में भी यह स्पष्ट किया गया है कि किसी भी नागरिक को उसकी धार्मिक आस्थाओं के विरुद्ध कोई कार्य करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

बोर्ड के अनुसार, गीत के कुछ अंशों में देवी-देवताओं, विशेष रूप से दुर्गा के स्वरूप का उल्लेख है, जो इस्लामी आस्था के अनुरूप नहीं है। इस्लाम में केवल एक ईश्वर—अल्लाह—की इबादत का सिद्धांत है, और किसी भी प्रकार की साझेदारी (शिर्क) की अनुमति नहीं है। ऐसे में मुसलमानों के लिए उन पंक्तियों का पाठ करना धार्मिक दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हो सकता।

बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि सरकार अधिसूचना वापस नहीं लेती है, तो वह न्यायालय का दरवाजा खटखटाएगा।


जमीयत उलेमा-ए-हिंद की प्रतिक्रिया

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के सर्कुलर को “बेहद चिंताजनक” बताया। उनका कहना है कि भारत जैसे बहुलतावादी देश में किसी भी धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतीक को अनिवार्य बनाना संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है।

उन्होंने कहा, “भारत का संविधान हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता देता है। यदि किसी समुदाय की आस्था के विरुद्ध कोई चीज़ थोपी जाती है, तो यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।”


ऐतिहासिक संदर्भ और विवाद

‘वंदे मातरम्’ गीत की रचना प्रसिद्ध साहित्यकार Bankim Chandra Chattopadhyay ने अपने उपन्यास आनंदमठ में की थी। यह गीत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय भावना का प्रतीक बना और इसे देशभक्ति के गीत के रूप में व्यापक स्वीकृति मिली।

हालांकि, गीत के कुछ श्लोकों में देवी-पूजा का उल्लेख होने के कारण समय-समय पर इस पर विवाद भी होता रहा है। अतीत में भी कई मुस्लिम संगठनों ने यह कहा है कि वे गीत की प्रारंभिक दो पंक्तियों को सम्मान के साथ स्वीकार करते हैं, लेकिन संपूर्ण गीत के धार्मिक संदर्भों से सहमत नहीं हैं।


धर्मनिरपेक्षता बनाम राष्ट्रभक्ति की बहस

यह विवाद केवल एक गीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक प्रश्न को भी छूता है कि राष्ट्रभक्ति की अभिव्यक्ति का स्वरूप क्या होना चाहिए और क्या उसे किसी विशेष धार्मिक प्रतीक से जोड़ा जाना चाहिए।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ अंतरात्मा की स्वतंत्रता भी प्रदान करता है। किसी भी प्रकार की बाध्यता, यदि वह व्यक्तिगत धार्मिक विश्वासों से टकराती है, तो न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकती है।


आगे क्या?

सरकार की ओर से अभी तक इस विवाद पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन यदि अधिसूचना पर पुनर्विचार नहीं किया जाता, तो मामला अदालत तक पहुंच सकता है।

विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर संवाद और सहमति का मार्ग अपनाना अधिक प्रभावी होता है। भारत की विविधता उसकी ताकत है, और किसी भी निर्णय में सभी समुदायों की भावनाओं का सम्मान आवश्यक है।


निष्कर्ष

‘वंदे मातरम्’ भारत की स्वतंत्रता संग्राम की विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन उसे अनिवार्य बनाने के निर्णय ने एक नई संवैधानिक और सामाजिक बहस को जन्म दिया है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा-ए-हिंद का कहना है कि वे राष्ट्र के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठा रहे हैं। अब यह देखना होगा कि सरकार और संबंधित पक्ष इस विवाद का समाधान संवाद, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक सौहार्द के आधार पर कैसे निकालते हैं।