पूर्व CDS अनिल चौहान और मुस्लिम थिंक टैंक की बहस: आत्ममंथन का वक्त
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मुस्लिम नाउ विशेष, नई दिल्ली
देश की राजधानी नई दिल्ली में इन दिनों एक अलग ही सियासी और वैचारिक बहस छिड़ गई है। मुद्दा यह है कि देश के पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने रिटायरमेंट के बाद दिल्ली के जाने-माने रणनीतिक थिंक टैंक ‘विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन’ (VIF) से जुड़ने का फैसला किया है। इस नियुक्ति के सामने आते ही सोशल मीडिया से लेकर बौद्धिक हलकों तक प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है।
डॉक्टर जफरूल इस्लाम जैसे कई विचारक इसे सीधे तौर पर लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के लिए बड़ा खतरा बता रहे हैं। सवाल यह उठाया जा रहा है कि आखिर सेना के इतने बड़े पदों से रिटायर होने वाले अधिकारी किसी खास वैचारिक पृष्ठभूमि वाले संस्थानों से क्यों जुड़ रहे हैं? क्या यह देश के बुनियादी ढांचे के अनुकूल है? लेकिन यह बहस जितनी सतही दिखती है, इसके गहरे पहलुओं पर गौर करना उससे कहीं ज्यादा जरूरी है।
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असली सवाल क्या है?
आज देश के सामने मुख्य सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन सा पूर्व सैन्य अधिकारी किस संस्थान में जा रहा है। असली और कड़वा सवाल भारत के बहुसंख्यक मुस्लिम समुदाय से जुड़ा हुआ है। आखिर क्या वजह है कि साल 1947 में आजादी मिलने के बाद से लेकर आज तक भारतीय मुसलमान कोई ऐसा मजबूत, प्रभावी और आधुनिक थिंक टैंक खड़ा नहीं कर पाए जो देश की नीति निर्माण (Policy Making) को प्रभावित कर सके?
विवेकानंद फाउंडेशन जैसे संगठनों के बारे में यह चर्चा आम रहती है कि इन्होंने रणनीतिक रूप से बड़ी भूमिकाएं निभाई हैं। इसके संस्थापकों और संचालकों में ऐसे लोग शामिल रहे हैं जिन्होंने प्रशासनिक और सामरिक सेवा के बाद एक ऐसा वैचारिक मंच तैयार किया, जिसकी गूंज सत्ता के गलियारों तक साफ सुनाई देती है। इसके उलट, अगर हम मुस्लिम समाज की तरफ देखें तो तस्वीर बिल्कुल मायूस करने वाली नजर आती है।
पारंपरिक संगठनों की सीमाएं
भारत के मुसलमानों के पास जमीनी स्तर पर धार्मिक और सामाजिक संगठन तो बहुत हैं। जमात-ए-इस्लामी हिंद, जमीयत उलेमा-ए-हिंद और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे नाम हमारे सामने हैं। लेकिन क्या इन संगठनों के पास कोई ऐसा हाई-प्रोफाइल थिंक टैंक या रणनीतिक विंग है जो देश की मुख्यधारा की राजनीति और कूटनीति में कोई ठोस दखल रखता हो?
जवाब साफ है, बिल्कुल नहीं। इन संगठनों का दायरा अक्सर मजहबी मसलों, पर्सनल लॉ की रक्षा या फौरी बयानों तक सिमट कर रह गया है। देश की सुरक्षा नीति, आर्थिक दिशा, विदेश मामलों या रणनीतिक मामलों पर मुस्लिम दृष्टिकोण रखने वाला कोई स्वतंत्र बौद्धिक संस्थान आज तक वजूद में नहीं आ सका। नतीजा यह है कि पिछले एक दशक में सोची-समझी रणनीति के तहत मुस्लिम मतदाताओं और राजनीतिक हस्तियों की सियासी हैसियत को लगातार सीमित किया गया है।
जमीन पर उतरकर काम करने की जरूरत
आज हालत यह हो गई है कि अगर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जंतर-मंतर पर कोई शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना चाहे, तो उसे आसानी से अनुमति नहीं मिलती। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान असंतुष्ट तत्वों द्वारा खलल डालने की कोशिशें आम बात हो गई हैं। पंजाब के शाही इमाम जब सहारनपुर में मस्जिद तोड़े जाने के मामले में मुस्लिम सियासतदानों की नीयत पर सवाल उठाते हैं, तो समाज के नुमाइंदों के पास इसका कोई ठोस वैचारिक जवाब नहीं होता।
सोशल मीडिया पर सिर्फ यह रोना रोने से कोई फायदा नहीं है कि अमुक अधिकारी ने किसी खास विचारधारा का थिंक टैंक ज्वाइन कर लिया है। जमाना सिर्फ उन्हें याद रखता है जो मैदान में उतरकर ठोस काम करते हैं। इतिहास गवाह है कि मौलाना मज़हरुल हक जैसे दिग्गजों और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसी शख्सियतों को लोग उनके बयानों के लिए नहीं, बल्कि उनके धरातलीय और वैज्ञानिक योगदान के लिए आज भी याद करते हैं।
संभलने का यही वक्त है
देश के मुसलमानों के साथ राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर जो प्रयोग पिछले कुछ दशकों से चल रहे हैं, उनके परिणाम अब पूरी तरह परवान चढ़ रहे हैं। जो कौम समय के साथ अपनी रणनीति नहीं बदलती, वह वक्त के पीछे छूट जाती है। सिर्फ पुरानी भावनात्मक बहसों में उलझे रहने से आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित नहीं होने वाला।
अब वक्त आ गया है कि सोशल मीडिया की नाराजगी से बाहर निकलकर जमीनी हकीकत का सामना किया जाए। देश के युवाओं को वीर अब्दुल हामिद और डॉ. कलाम जैसे प्रेरणास्त्रोतकी राह पर चलना होगा। समाज को शिक्षा, विज्ञान, कूटनीति और आधुनिक शोध के क्षेत्र में मजबूत कदम बढ़ाने होंगे। जब तक मुसलमान खुद अपने बौद्धिक और रणनीतिक संस्थान (Think Tanks) तैयार नहीं करेंगे, तब तक दूसरों पर उंगली उठाने का कोई मतलब नहीं बनता। रोने-धोने का दौर खत्म हो चुका है, अब उठने और संभलने का वक्त है।

