Culture

बाराबंकी में गूँजी भाईचारे की गूँज: होली-ईद मिलन मुशायरे में बिखरे मोहब्बत के रंग

अबू शहमा अंसारी,बाराबंकी (ब्यूरो)

उत्तर प्रदेश की गंगा-जमुनी तहजीब और अदब के मरकज बाराबंकी में एक बार फिर साहित्य और सौहार्द का अनूठा संगम देखने को मिला। ‘अदबी कैनवस’ के तत्वावधान में आयोजित ‘होली और ईद मिलन’ के विशेष गैर-तरही मुशायरे ने यह साबित कर दिया कि कविता और शायरी केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने का सबसे सशक्त माध्यम है। लखपेड़ा बाग स्थित ‘बज्म-ए-अदबी कैनवस’ के अध्यक्ष जियाउद्दीन अहमद मॉडर्न शूज के आवास पर सजी इस महफिल में जनपद के नामचीन रचनाकारों ने अपनी गजलों से सांप्रदायिक एकता और इंसानी जज्बातों की नई इबारत लिखी।

साहित्यिक गलियारों में भाईचारे का संदेश

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जियाउद्दीन अहमद ने अपने संबोधन में कहा कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में होली और ईद जैसे त्यौहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि ये हमारी साझा संस्कृति की पहचान हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसे मुशायरों का आयोजन समाज में एकता और भाईचारे का संदेश प्रसारित करने के लिए अनिवार्य है। उन्होंने कहा, “तरही और गैर-तरही बैठकें उर्दू सीखने और समझने वालों के लिए एक चलती-फिरती पाठशाला की तरह हैं, जहाँ नवांकुरों को गजल की बारीकियों को समझने का कीमती अवसर मिलता है।”

शायर और उनकी दिलकश गजलों का जादू

मुशायरे की निजामत (संचालन) बज्म के सचिव आदर्श बाराबंकवी ने बेहद संजीदा अंदाज में की। महफिल की शुरुआत होते ही शब्दों का ऐसा कारवां चला कि श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए। मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद वरिष्ठ कवि एडवोकेट हाशिम अली हाशिम ने जब अपने शेर पढ़े, तो महफिल ‘वाह-वाह’ के शोर से गूँज उठी। उनके चुनिंदा शेर ने जीवन की नश्वरता और सत्य को बखूबी बयां किया:

“तरे जहाँ में कयाम-ए-मुदाम किसका है, चखे न मौत की लज्जत वो नाम का है।”

इसी क्रम में एडवोकेट जाबिर ने अपनी शोहरत और कलम की ताकत पर चोट करते हुए कहा:

“कहते यही हैं शहर के सारे अदब नवाज, जाबिर को एक शेर ने मशहूर कर दिया।”

उर्दू की महक और सामाजिक सरोकार

जमीर फैजी ने उर्दू जुबान की हिफाजत और उसकी रूह को बयां करते हुए जो शेर पढ़ा, उसने महफिल में जोश भर दिया:

“कई चिराग बुझे कितने माहताब मरे, मगर मजाल कि उर्दू की आब ओ ताब मरे।”

वहीं सगीर नूरी ने बिखरते हुए मानवीय जीवन और गहन सोच को इन शब्दों में पिरोया:

“बताऊं कैसे करूं मैं यकजा निजाम-ए-हस्ती बिखर चुका है, परिंदा फिक्र ओ नजर का मेरी जुनून की हद से गुजर चुका है।”

वकार बाराबंकवी की गजल के इन शेरों ने मानवीय संवेदनाओं को गहराई से छुआ:

“शौक से वार करो मुझ पे दोबारा लेकिन, तुमने पहले जो दिए जख्म वो भर जाने दो।”

अध्यात्म और नैतिकता का आईना

महफिल में जहां एक तरफ इश्किया और जज्बाती शायरी हुई, वहीं दूसरी तरफ डॉक्टर फिदा हुसैन ने इंसान के कर्मों और अतीत की गलतियों पर करारा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि जब इंसान का झूठ दुनिया के सामने आता है, तो उसे अपने अतीत पर पछतावा होता है। कैफी रुदौलवी ने शमा और परवाने के शाश्वत प्रेम को एक नए नजरिए से पेश किया।

आदर्श बाराबंकवी ने व्यवस्था और न्याय प्रणाली पर तंज कसते हुए कहा:

“मुंसिफ से रूबरू था मगर इसके बाद भी, देना पड़ा सबूत कि जिंदा हूं मैं अभी।”

नफीस अहमद पुरी ने भारतीय संस्कृति और यहाँ की तहजीब पर गर्व करते हुए जो शेर पढ़ा, वह मुशायरे का हासिल रहा:

“मेरी तहजीब पर सारा जमाना रश्क करता है, यही तहजीब है जिसको सितम ढाना नहीं आता।”

समापन और भविष्य की घोषणा

मुशायरे में डॉक्टर रिहान अलवी, डॉक्टर खालिद, इरशाद बाराबंकवी, तुफैल जैदपुरी और मुजीब रुदौलवी जैसे कई अन्य कवियों ने भी अपनी गजलों से महफिल को ऊंचाइयों पर पहुँचाया। श्रोताओं में मोहम्मद रिजवान, जीशान अहमद, अब्दुल सत्तार और मोहम्मद शोएब किदवई सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के अंत में ‘अदबी कैनवस’ के महासचिव डॉक्टर रिहान अलवी ने सभी रचनाकारों और उपस्थित दर्शकों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने घोषणा की कि भविष्य में भी ऐसी साहित्यिक गोष्ठियां जारी रहेंगी और जल्द ही एक विशाल ‘तरही मुशायरा’ आयोजित किया जाएगा, जो उर्दू शायरी के संवर्धन के लिए समर्पित होगा।

निष्कर्ष: बाराबंकी की यह शाम केवल शायरी के नाम नहीं थी, बल्कि यह उन लोगों के लिए एक करारा जवाब थी जो समाज को बांटने की कोशिश करते हैं। होली के गुलाल और ईद की मिठास को शायरी की चाशनी में घोलकर जो संदेश यहाँ से निकला, वह दूर तलक जाएगा।