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ईरान संकट पर भारत का रुख बदला? जयशंकर की ईरानी विदेश मंत्री से बात, खामेनेई को दी गई श्रद्धांजलि

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

अमेरिका-इज़रायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच भारत की कूटनीतिक स्थिति पर देश के भीतर बहस तेज हो गई है। हाल के घटनाक्रमों में केंद्र सरकार के कुछ कदमों को भारत-ईरान संबंधों की दिशा में एक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि ये कदम अभी प्रतीकात्मक हैं और भारत को अधिक स्पष्ट और मजबूत कूटनीतिक रुख अपनाने की जरूरत है।

पिछले कुछ दिनों से पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते हालात के कारण भारत की विदेश नीति चर्चा के केंद्र में है। विशेष रूप से ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामनेई की हत्या और क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव के बाद भारत सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर विपक्षी दलों, पूर्व सैन्य अधिकारियों, पत्रकारों और रणनीतिक विश्लेषकों के बीच व्यापक बहस देखी जा रही है।

इसी पृष्ठभूमि में पिछले 24 घंटों में भारत सरकार की ओर से दो महत्वपूर्ण घटनाएं सामने आई हैं, जिन्हें भारत-ईरान संबंधों के संदर्भ में देखा जा रहा है।

जयशंकर की ईरानी विदेश मंत्री से बातचीत

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोशल मीडिया मंच एक्स (पूर्व ट्विटर) पर जानकारी दी कि उनकी ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची से टेलीफोन पर बातचीत हुई है।

जयशंकर ने अपने संक्षिप्त संदेश में लिखा कि उन्होंने ईरानी विदेश मंत्री से दोपहर में टेलीफोन पर बातचीत की। हालांकि उन्होंने बातचीत के विषय या उसमें हुई चर्चा के बारे में विस्तार से कोई जानकारी साझा नहीं की।

कूटनीतिक हलकों में इस बातचीत को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह ऐसे समय हुई है जब पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर है और ईरान से जुड़े कई घटनाक्रम वैश्विक राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि भारत और ईरान के बीच लंबे समय से रणनीतिक और आर्थिक संबंध रहे हैं। ऊर्जा सहयोग, चाबहार बंदरगाह परियोजना और मध्य एशिया तक पहुंच के लिहाज से ईरान भारत के लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार रहा है। ऐसे में वर्तमान संकट के दौरान दोनों देशों के बीच संपर्क बनाए रखना भारत की कूटनीतिक प्राथमिकता का हिस्सा माना जा रहा है।

दिल्ली में ईरानी दूतावास में श्रद्धांजलि

इसी दौरान नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास में आयतुल्लाह अली खामनेई के निधन पर रखी गई शोकपुस्तिका पर भारत सरकार की ओर से हस्ताक्षर किए गए। विदेश मंत्रालय के विदेश सचिव विक्रम मिस्री दूतावास पहुंचे और उन्होंने शोक संदेश दर्ज किया।

इस दौरान उन्होंने भारत में ईरान के राजदूत से मुलाकात भी की और मौजूदा क्षेत्रीय हालात पर चर्चा की। विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, यह मुलाकात कूटनीतिक शिष्टाचार के तहत हुई, लेकिन इसे दोनों देशों के बीच संवाद बनाए रखने की प्रक्रिया के रूप में भी देखा जा रहा है।

भारत की विदेश नीति पर उठ रहे सवाल

हालांकि इन घटनाओं के बावजूद भारत की विदेश नीति को लेकर देश के भीतर बहस जारी है। कई रणनीतिक विशेषज्ञों और पूर्व सैन्य अधिकारियों का कहना है कि भारत को वैश्विक मुद्दों पर अधिक स्पष्ट रुख अपनाने की जरूरत है।

एक टेलीविजन बहस में एक पूर्व भारतीय सैनिक अधिकारी ने सवाल उठाते हुए कहा कि भारत को अपनी रणनीतिक साझेदारियों का मूल्यांकन करना चाहिए। उनका कहना था कि भारत को अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखते हुए राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्पष्ट निर्णय लेने चाहिए।

उनका यह भी कहना था कि भारत यदि वैश्विक स्तर पर मजबूत भूमिका निभाना चाहता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर स्पष्ट और सुसंगत नीति अपनानी होगी।

मीडिया और विशेषज्ञों की प्रतिक्रियाएं

पत्रकारों और रणनीतिक मामलों के विश्लेषकों ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय व्यक्त की है। कुछ का मानना है कि भारत को पश्चिम एशिया के जटिल भू-राजनीतिक समीकरणों में संतुलन बनाकर चलना पड़ता है, क्योंकि इस क्षेत्र में उसके कई महत्वपूर्ण साझेदार हैं।

दूसरी ओर कुछ टिप्पणीकारों का कहना है कि भारत को उन घटनाओं पर स्पष्ट प्रतिक्रिया देनी चाहिए जो सीधे तौर पर उसके हितों या उसकी क्षेत्रीय प्रतिष्ठा से जुड़ी हों।

विशेषज्ञों के अनुसार भारत की विदेश नीति लंबे समय से “रणनीतिक संतुलन” की अवधारणा पर आधारित रही है, जिसमें वह एक साथ कई देशों के साथ संबंध बनाए रखता है। यही कारण है कि भारत पश्चिम एशिया में इज़रायल, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के साथ समानांतर रूप से मजबूत संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है।

भारत-ईरान संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत और ईरान के बीच संबंध सदियों पुराने सांस्कृतिक, व्यापारिक और ऐतिहासिक संबंधों पर आधारित रहे हैं। आधुनिक दौर में भी दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं को लेकर घनिष्ठ संबंध रहे हैं।

विशेष रूप से चाबहार बंदरगाह परियोजना को भारत की मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यही वजह है कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बावजूद भारत-ईरान संबंधों को रणनीतिक दृष्टि से अहम समझा जाता है।

आगे की कूटनीतिक दिशा

पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते हालात के बीच भारत की कूटनीतिक रणनीति आने वाले दिनों में और अधिक स्पष्ट हो सकती है। फिलहाल सरकार की ओर से ईरान के साथ संपर्क बनाए रखने के संकेत जरूर मिले हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को इस जटिल संकट में संतुलित और दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना होगा।

पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। ऐसे में भारत की विदेश नीति और उसके कूटनीतिक कदम आने वाले समय में विशेष रूप से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।