#हीरा_है_सदा_केलिए : मजहब नहीं देशसेवा है पहचान- अबुल कासिम नोमानी
भारत निर्माण में मुस्लिम योगदान को सलाम
मुस्लिम नाउ विशेष श्रृंखला
बीते एक दशक में एक खास विचारधारा के लोगों ने यह वातावरण रचने की भरसक कोशिश की है कि जैसे भारत में मुसलमान महज एक “बोझ” हैं — जिनका इस देश की तरक्की में कोई सार्थक योगदान नहीं। इस सोच के तहत एक सांस्कृतिक युद्ध चलाया गया — जिसमें मुसलमानों की छवि को धूमिल करने, उनकी पहचान, धार्मिक अधिकारों, शिक्षा प्रणाली और ऐतिहासिक योगदान को मिटाने के प्रयास हुए।
यह भ्रम फैलाया गया कि बंटवारे के बाद मुसलमानों को “उनका देश” पाकिस्तान मिल गया, और जो भारत में रह गए उन्हें चुपचाप उस खास विचारधारा के एजेंडे के सामने झुक जाना चाहिए। लेकिन इतिहास और वर्तमान गवाही देते हैं कि भारत की मिट्टी को सींचने, इसे संवारने और दुनिया के मंच पर खड़ा करने में मुसलमानों की भूमिका न कभी कम थी, न आज है।
इन्हीं सच्चाइयों को सामने लाने के लिए “मुस्लिम नाउ” की एक नई पहल — “हीरा है सदा के लिए” — शुरू की गई है। इस श्रृंखला में हम उन मुसलमान शख्सियतों को रोजाना सामने लाएंगे, जिन्होंने तमाम विरोधों, तिरस्कार और भ्रामक प्रचारों के बावजूद भारत के निर्माण और उसकी सांस्कृतिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक पहचान को मजबूत किया।
इस श्रृंखला की पहली कड़ी में पेश हैं:
अबुल कासिम नोमानी
प्रख्यात इस्लामी विद्वान | कुलपति, दारुल उलूम देवबंद
वाराणसी की मिट्टी में 1945 में जन्मे अबुल कासिम नोमानी भारतीय इस्लामी शिक्षा और चिंतन की दुनिया में एक अत्यंत प्रतिष्ठित नाम हैं। उनका जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि विद्वता, नेतृत्व और प्रतिबद्धता कैसे एक संस्थान को ही नहीं, पूरी कौम को दिशा दे सकती है।
नोमानी साहब ने 1960 में दारुल उलूम मऊ से अपनी औपचारिक इस्लामी शिक्षा की शुरुआत की। 1962 में मिफ्ताहुल उलूम मऊ में दाखिला लिया और फिर 1963 में दारुल उलूम देवबंद में प्रवेश लिया — जो दुनिया के सबसे पुराने और सम्मानित इस्लामी शिक्षण संस्थानों में से एक है। वहां से उन्होंने 1967 में स्नातक की डिग्री प्राप्त की।
उनकी प्रतिभा और विद्वता को देखते हुए उन्हें 1992 में दारुल उलूम देवबंद की सर्वोच्च शासी संस्था मजलिस-ए-शूरा में शामिल किया गया। यह किसी भी इस्लामी शिक्षाविद् के लिए एक अत्यंत प्रतिष्ठित मान्यता होती है।
24 जुलाई 2011 को उन्हें देवबंद का कुलपति (मोहतमिम) नियुक्त किया गया, जब उन्होंने गुलाम मोहम्मद वस्तानवी का स्थान लिया। उनका नेतृत्व इस ऐतिहासिक संस्थान के लिए निर्णायक रहा — एक ओर जहां उन्होंने इसकी पारंपरिक शैक्षणिक गरिमा को बनाए रखा, वहीं दूसरी ओर समकालीन चुनौतियों से भी टकराने की राह बनाई।
14 अक्टूबर 2020 को उन्हें शेख अल-हदीस के सर्वोच्च पद पर नियुक्त किया गया — यह दारुल उलूम में सबसे सम्माननीय शिक्षण पद है, जिसे केवल वही पा सकता है जिसकी विद्वता निर्विवाद हो और जिसकी सेवाएं संस्था के लिए प्रेरणादायक रही हों।
अबुल कासिम नोमानी न केवल एक प्रशासनिक प्रमुख हैं, बल्कि वे एक विचारशील शिक्षक, मार्गदर्शक और आधुनिक इस्लामी विमर्श के सजग प्रहरी भी हैं। उनका कार्य भारत और समूचे दक्षिण एशिया में इस्लामी शिक्षा की दिशा और स्वरूप को प्रभावित करता है।
उनकी सोच, शिक्षण शैली और नेतृत्व कौशल ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारत का मुसलमान न तो किसी पर बोझ है और न ही किनारे बैठा तमाशबीन। वह इस देश की सामाजिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक विकास यात्रा का सक्रिय, जिम्मेदार और प्रेरक सहभागी है।
अबुल कासिम नोमानी जैसे लोग भारत की उस साझी विरासत की मिसाल हैं, जो धर्म, जाति या क्षेत्र की सीमाओं से परे जाकर ज्ञान, नैतिकता और सेवा को सर्वोच्च मानती है।
“हीरा है सदा के लिए” — ये सिर्फ नारा नहीं, सच्चाई है।
यदि आप चाहें तो अगली कड़ी के लिए अन्य प्रेरणादायक मुस्लिम शख्सियतों के नाम भी सुझाए जा सकते हैं।

