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भारत की मानवीय पहल और अफ़ग़ानिस्तान में बढ़ता कैंसर संकट

भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच बढ़ती नज़दीकियों का एक और महत्वपूर्ण उदाहरण हाल ही में सामने आया है। भारत ने अफ़ग़ानिस्तान को लगभग 7,586 किलोग्राम जीवनरक्षक कैंसर-रोधी दवाओं की बड़ी खेप भेजी है। यह सहायता ऐसे समय में दी गई है जब अफ़ग़ानिस्तान गंभीर मानवीय, आर्थिक और स्वास्थ्य संकट से जूझ रहा है।

इस कदम को भारत की मानवीय विदेश नीति और वैश्विक ज़िम्मेदारी के तौर पर देखा जा रहा है। भारत ने स्पष्ट किया है कि यह मदद राजनीति से ऊपर उठकर, केवल जीवन बचाने और पीड़ित मानवता के साथ खड़े होने की भावना से दी गई है। लेकिन इस सहायता ने एक अहम सवाल भी खड़ा कर दिया है—
क्या अफ़ग़ानिस्तान में कैंसर का बोझ तेज़ी से बढ़ रहा है, जिसके चलते उसे बाहरी देशों की मदद लेनी पड़ रही है?


अफ़ग़ानिस्तान में कैंसर: एक गहराता संकट

अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों और क्षेत्रीय रिपोर्टों के मुताबिक, अफ़ग़ानिस्तान दक्षिण एशियाई क्षेत्र (SAARC) में उन देशों में शामिल है जहाँ कैंसर की दर और उससे होने वाली मौतें बेहद चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुकी हैं

ग्लोबल कैंसर ऑब्ज़र्वेटरी और 2024 की SAARC रिपोर्ट के अनुसार, अफ़ग़ानिस्तान में कैंसर की आयु-मानकीकृत घटनादर (ASIR) पुरुषों में 103.6 और महिलाओं में 110.7 प्रति एक लाख जनसंख्या है। वहीं मृत्यु दर (ASMR) पुरुषों में 81 और महिलाओं में 77.5 प्रति एक लाख है।
ये आंकड़े न केवल क्षेत्रीय औसत से ज़्यादा हैं, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में कैंसर से पीड़ित अधिकतर मरीजों की जान बचाना मुश्किल हो रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इसका प्रमुख कारण है—

  • बीमारी का बहुत देर से पता चलना,
  • इलाज और जांच सुविधाओं की भारी कमी,
  • और एक बिखरी हुई, कमजोर स्वास्थ्य प्रणाली।

कौन-से कैंसर सबसे ज़्यादा जानलेवा?

अफ़ग़ानिस्तान में पाए जाने वाले कैंसरों की प्रकृति भी उसके सामाजिक और आर्थिक हालात को दर्शाती है। यहां वही कैंसर सबसे आम हैं जो आमतौर पर कम संसाधनों वाले देशों में देखे जाते हैं।

  • महिलाओं में स्तन कैंसर सबसे ज़्यादा पाया जाता है, जो कुल महिला कैंसर मामलों का लगभग 46 प्रतिशत है।
  • पुरुषों में ग्रासनली (Esophagus) का कैंसर सबसे आम है।
  • इसके बाद पेट, कोलोरेक्टल, लिम्फोमा और सर्वाइकल कैंसर प्रमुख हैं।

विशेष चिंता का विषय यह है कि सर्वाइकल कैंसर, जो समय पर जांच से रोका जा सकता है, वह भी अफ़ग़ान महिलाओं में मौत की बड़ी वजह बना हुआ है।


इलाज नहीं, जांच ही सबसे बड़ी चुनौती

अफ़ग़ानिस्तान में कैंसर केवल एक मेडिकल समस्या नहीं, बल्कि संरचनात्मक विफलता का प्रतीक बन चुका है।
देश में:

  • कैंसर के लिए राष्ट्रीय स्तर का कोई स्क्रीनिंग प्रोग्राम नहीं है
  • उन्नत जांच मशीनें और लैब सुविधाएं बेहद सीमित हैं
  • रेडियोथेरेपी और कीमोथेरेपी जैसे इलाज केवल कुछ बड़े शहरों तक सिमटे हुए हैं
  • और प्रशिक्षित ऑन्कोलॉजिस्ट व पैथोलॉजिस्ट की भारी कमी है

यही कारण है कि अधिकतर मरीज आख़िरी स्टेज में अस्पताल पहुंचते हैं, जब इलाज की संभावना बहुत कम रह जाती है।


सामाजिक और सांस्कृतिक बाधाएं

स्वास्थ्य ढांचे की कमजोरी के साथ-साथ अफ़ग़ानिस्तान में कैंसर जांच के रास्ते में कई सामाजिक और सांस्कृतिक रुकावटें भी हैं।

  • कैंसर को लेकर जागरूकता बेहद कम है
  • खासतौर पर महिलाओं में स्तन और सर्वाइकल कैंसर को लेकर शर्म और डर हावी रहता है
  • महिला डॉक्टरों की कमी के कारण महिलाएं जांच कराने से कतराती हैं
  • आर्थिक तंगी और लंबी यात्रा भी बड़ी बाधा है

इन हालात में कैंसर की समय पर पहचान लगभग असंभव हो जाती है।


स्क्रीनिंग: महंगी तकनीक नहीं, व्यावहारिक समाधान ज़रूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों में पश्चिमी देशों की तरह महंगे और हाई-टेक स्क्रीनिंग मॉडल अपनाना न तो संभव है, न ही कारगर।

इसकी बजाय ज़रूरत है:

✔️ सर्वाइकल कैंसर के लिए

विजुअल इंस्पेक्शन विद एसेटिक एसिड (VIA) जैसी सस्ती और आसान तकनीक
जिसे कम प्रशिक्षण वाले स्वास्थ्यकर्मी भी कर सकते हैं

✔️ स्तन कैंसर के लिए

मैमोग्राफी की बजाय
लक्षणों की पहचान, जागरूकता और जल्दी रेफरल

✔️ अन्य कैंसरों के लिए

जनता और प्राथमिक स्वास्थ्यकर्मियों को
लक्षण पहचानने और समय पर अस्पताल भेजने की ट्रेनिंग


भारत की मदद का महत्व

ऐसे हालात में भारत द्वारा भेजी गई कैंसर-रोधी दवाओं की खेप सिर्फ एक राहत सामग्री नहीं, बल्कि हज़ारों ज़िंदगियों के लिए उम्मीद की किरण है।

यह कदम बताता है कि भारत:

  • संकटग्रस्त देशों के साथ मानवता के आधार पर खड़ा रहता है
  • केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक नेतृत्व भी निभाता है
  • और स्वास्थ्य को वैश्विक ज़िम्मेदारी मानता है

निष्कर्ष: दवा से आगे की ज़रूरत

भारत की यह सहायता बेहद अहम है, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में कैंसर संकट का स्थायी समाधान केवल दवाओं से नहीं होगा।
ज़रूरत है:

  • मजबूत प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की
  • सस्ती और प्रभावी स्क्रीनिंग रणनीतियों की
  • जागरूकता और महिला-केन्द्रित स्वास्थ्य नीतियों की
  • और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की

कैंसर के खिलाफ लड़ाई अफ़ग़ानिस्तान के लिए केवल स्वास्थ्य की नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा की लड़ाई है। भारत की यह पहल उसी दिशा में एक मजबूत कदम मानी जा सकती है।