मुस्लिम देशों से भारत के रिश्ते: नफरत और कूटनीति की कसौटी
मुस्लिम नाउ विशेष
हाल के दिनों में भारत में कट्टरपंथियों द्वारा मुसलमानों के प्रति बढ़ती नफरत और कुछ विवादास्पद घटनाओं ने देश के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों, विशेष रूप से सऊदी अरब सहित मित्रवत इस्लामी देशों के साथ रिश्तों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। क्या यह बढ़ता अलगाव हाल ही में सऊदी अरब द्वारा भारत के धुर विरोधी मुल्क पाकिस्तान से हथियारों सहित कई महत्वपूर्ण सौदों के पीछे एक कारण हो सकता है?
बरेली विवाद और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया
बरेली प्रकरण (मौलाना तौकीर रज़ा की गिरफ्तारी और ‘आई लव मुहम्मद’ नारे को लेकर उठा विवाद) के बाद जिस तरह की राजनीतिक बयानबाजी हुई, जिसमें एक बड़े राजनेता के बयान भी शामिल थे, उसने मुस्लिम देशों से भारत के रिश्ते में दरार आने के खतरे को उजागर कर दिया है। इसी पृष्ठभूमि में, देश का एक वर्ग ‘मक्का चार्टर’ के बहाने सऊदी अरब को इस्लाम की मूलभूत सहिष्णुता और सह-अस्तित्व की विरासत को याद दिलाना चाहता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से भारत की मौजूदा अंदरूनी स्थिति पर चिंता व्यक्त करने का तरीका है।
बरेली में मुसलमानों पर कथित एकतरफा कार्रवाई को लगभग डेढ़ सौ मुल्कों में देखा जाने वाले अरबी न्यूज़ चैनल अल-जज़ीरा से जिस तरह महत्व मिला और कुछ अरब देशों के लोगों के भारत विरोधी बयान सामने आए, उससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उन प्रयासों को गहरा धक्का पहुँचने की आशंका है, जिनके कारण कई इस्लामिक देश भारत के बेहद करीब आए थे। प्रधानमंत्री मोदी को कई इस्लामिक मुल्कों द्वारा सर्वोच्च नागरिक सम्मान से भी नवाज़ा गया है।
हालांकि, पहलगाम प्रकरण में भारत के रुख के प्रति एक इस्लामिक देश के नरम रुख ने एक बड़े हिंदूवादी नेता को अपने संगठन के सौ साल पूरे होने पर यह कहने को मजबूर कर दिया कि पहलगाम के आतंकवादी हमले ने यह पहचान करा दी कि कौन भारत का दोस्त मुल्क है और कौन दिखावा करता है।
घरेलू ध्रुवीकरण और वैश्विक संदेश
पिछले एक दशक में जिस तरह से देश के मुसलमानों में पसमांदा, शिया और सुन्नी, वहाबी तथा सूफीवादी के नाम पर फूट डालने की कोशिश की गई है और कई मुस्लिम विरोधी फैसले लिए गए हैं, उससे भले ही देश के मुसलमान हाशियाए पर धकेले जाते दिख रहे हों, पर इसका संदेश मुस्लिम देशों में निश्चित ही गलत गया है। विदेशों में समय-समय पर इसका असर दिखता भी रहता है।
बरेली विवाद के बाद यह चिंता बढ़ गई है कि पीएम मोदी के कूटनीतिक प्रयासों पर पानी न फिर जाए। शायद यही कारण है कि एक पार्टी के नेताओं को हिदायत दी गई कि वे भविष्य में सोच समझकर बोलें, ताकि देश की छवि और अंतर्राष्ट्रीय संबंध और ख़राब न हों।
अस्थिरता का खतरा और पूंजीनिवेश पर असर
क्या इन हंगामी सूरतों में भारत में निवेश बढ़ सकता है? इसमें दो राय नहीं कि भारत में मुसलमानों की आबादी दुनिया में दूसरे नंबर पर है, और वैश्विक पटल पर मुसलमानों का रुतबा कई मामलों में किसी अन्य कौम से कमतर नहीं है। ऐसे में भारत में पूंजी निवेश करने वाले मौजूदा हालात को कैसे देखते हैं, यह एक बड़ा सवाल है।
मीडिया में एक आंकड़ा आया है कि भारत वर्ल्ड बैंक का सबसे बड़ा कर्जदार मुल्क है। यदि देश में स्थिरता नहीं होगी, शांति का माहौल नहीं होगा, एक कौम के खिलाफ कार्रवाई होंगी, ऐसे में कौन यहाँ पैसे लगाना चाहेगा?
चिंताजनक बात यह है कि जिस राजनेता ने मुसलमानों की ओर इशारा करते हुए “मिट्टी में मिला देंगे, डेंटिंग पेंटिंग कर देंगे, उनकी सात पुश्तें याद रखेंगी” जैसे भड़काऊ बयान दिए, वही सबसे ज्यादा इस प्रयास में है कि उसके सूबे में पूंजीनिवेश हो। मगर मौजूदा हालात में, तमाम डैमेज कंट्रोल के बावजूद, यदि यही हाल रहा तो पूंजीनिवेश की बात को भूल ही जाना चाहिए।
इसे अयोध्या के उदाहरण से समझा जा सकता है। अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण के बाद कयास लगाया जा रहा था कि मुल्क का यह इलाका विश्व मानचित्र पर एक बड़े पर्यटक केंद्र के रूप में उभरेगा। मगर मीडिया रिपोर्ट बताती हैं कि अयोध्या में पर्यटक उतनी संख्या में नहीं आ रहे हैं जैसी कि उम्मीद की गई थी। ज़ाहिर है, बिना शांति के यह सब कतई संभव नहीं है, चाहे आप लाख एक्सप्रेस-वे, हाईवे और एयरपोर्ट बनवा लें। देश की आंतरिक शांति और सामाजिक सद्भाव ही उसकी अर्थव्यवस्था और वैश्विक प्रतिष्ठा की असली नींव है।

