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ईरान-भारत अटूट दोस्ती: खामेनई के चालीसवें पर उमड़ा जनसैलाब, विरोधियों के एजेंडे हुए फेल

मुख्य झलकियां:

  • आयोजन: आयतुल्लाह खामेनई की शहादत का चालीसवां।
  • स्थान: ईरान कल्चर हाउस, नई दिल्ली।
  • प्रमुख अतिथि: मोख्तार अब्बास नकवी, सलमान खुर्शीद, अयातुल्ला अकील अल-घरवी।
  • संदेश: भारत-ईरान की दोस्ती अटूट है और यह किसी भी दुष्प्रचार से प्रभावित नहीं होगी।

नई दिल्ली/दुबई | मुस्लिम नाउ ब्यूरो

पश्चिम एशिया के धधकते हालातों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बदलते समीकरणों के बीच भारत की राजधानी नई दिल्ली से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने दुनिया को स्पष्ट संदेश दे दिया है। नई दिल्ली स्थित ‘ईरान कल्चर हाउस’ में ईरान के सर्वोच्च नेता और महान आध्यात्मिक शख्सियत आयतुल्लाह अली खामेनई की शहादत के चालीसवें (चेहलुम) के अवसर पर आयोजित सभा ने भारत-ईरान के गहरे और ऐतिहासिक रिश्तों की नई इबारत लिख दी है।

यह आयोजन सिर्फ एक शोक सभा नहीं थी, बल्कि उन तमाम ताकतों को करारा जवाब था जो भारत और ईरान के बीच शिया समुदाय के नाम पर दरार पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। विशेष रूप से गुजरात के मौलाना हसन अली रजानी जैसे चेहरों द्वारा फैलाई जा रही नकारात्मक बयानबाजी के बीच, भारतीय नेताओं और आवाम की भारी मौजूदगी ने साबित कर दिया कि भारत के लिए ईरान महज एक पड़ोसी नहीं, बल्कि एक रूहानी और रणनीतिक साझेदार है।


नकवी की श्रद्धांजलि और अटूट भारतीय संवेदना

भारत के पूर्व केंद्रीय मंत्री मोख्तार अब्बास नकवी ने इस शोक सभा में शिरकत कर अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। नकवी ने इस मौके की तस्वीरें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) पर साझा करते हुए लिखा:

“नई दिल्ली में ईरान कल्चर हाउस में ईरान के सुप्रीम लीडर एवं महान आध्यात्मिक शख्सियत आयतुल्लाह अली खामेनई जी की शहादत के चालीसवां में शामिल होकर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर श्रद्धासुमन अर्पित करने हेतु बड़ी संख्या में समाज के सभी वर्गों के लोग मौजूद रहे।”

नकवी की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि भारत सरकार और यहां का राजनीतिक नेतृत्व ईरान के साथ अपने संबंधों को कितनी अहमियत देता है। फरवरी 2026 में अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों में आयतुल्लाह खामेनई की शहादत के बाद से ही भारत ने निरंतर सहानुभूति और एकजुटता व्यक्त की है।


विवादित बयानबाजी और मौलाना रजानी का ‘खास एजेंडा’

एक तरफ जहां पूरा देश एकजुट नजर आया, वहीं गुजरात के शिया मौलाना हसन अली रजानी ने इस मौके पर भी आलोचनात्मक रुख अपनाकर विवाद खड़ा कर दिया। मौलाना रजानी ने एक बयान जारी कर कहा कि सभा में यमन और लेबनान के उन शियाओं का जिक्र नहीं किया गया जिन्होंने “ईरान के कहने पर अपनी जान दी।”

जानकारों का मानना है कि मौलाना रजानी की यह बयानबाजी एक खास एजेंडे का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य भारत और ईरान के शिया समुदाय के बीच मतभेद पैदा करना और ईरान की अंतरराष्ट्रीय छवि को धूमिल करना है। उन्होंने आरोप लगाया कि किसी भी ‘ईरानी तेल जानकार’ या विद्वान ने दबे-कुचले लोगों की बात नहीं की। हालांकि, जमीनी हकीकत मौलाना के दावों से कोसों दूर दिखी, क्योंकि सभा में मौजूद वक्ताओं ने मानवता, न्याय और मजलूमों की आवाज बुलंद करने की बात कही।


ईरान का आभार: “भारत का अहसानमंद है तेहरान”

भारत में ईरान के सुप्रीम लीडर के प्रतिनिधि, अब्दुल माजिद हकीम इलाही ने भारतीय सरकार और जनता के प्रति आभार व्यक्त करते हुए इस एकजुटता की सराहना की। न्यूज एजेंसी एएनआई (ANI) से बात करते हुए उन्होंने कहा:

“मैं भारत सरकार का शुक्रगुजार हूं। उन्होंने हमारा समर्थन किया, हमारे साथ एकजुटता दिखाई और गहरी संवेदना व्यक्त की। आज यहां विभिन्न दलों के नेताओं और अधिकारियों की भागीदारी ने साबित कर दिया है कि मानवता और न्याय की कोई सीमा नहीं होती।”

इलाही ने आगे कहा कि आयतुल्लाह खामेनई ने अपना पूरा जीवन न्याय और इंसानियत के लिए समर्पित कर दिया। भारत के लोगों ने पिछले कुछ हफ्तों में जो वफादारी और बुद्धिमानी दिखाई है, वह दुनिया के लिए एक उदाहरण है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जागृत हृदय हमेशा न्याय के साथ खड़े होते हैं।


ऐतिहासिक संदर्भ: फरवरी 2026 की वह काली रात

गौरतलब है कि 86 वर्षीय आयतुल्लाह अली खामेनई की शहादत 28 फरवरी, 2026 को अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए भीषण सैन्य हमलों में हुई थी। इस घटना ने पूरे पश्चिम एशिया में तनाव को चरम पर पहुंचा दिया था। उनके निधन के बाद मोजतबा खामेनई को ईरान का नया सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) नियुक्त किया गया है। मोजतबा खामेनई के नेतृत्व में ईरान अब नई चुनौतियों का सामना कर रहा है, और ऐसे में भारत जैसे मित्र राष्ट्र का समर्थन तेहरान के लिए संजीवनी की तरह है।


क्यों अहम है यह एकजुटता?

एक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में, इस घटनाक्रम का विश्लेषण करें तो तीन बड़ी बातें निकलकर सामने आती हैं:

  1. रणनीतिक संतुलन: भारत ने अमेरिका और इजरायल के साथ अपने रिश्तों को बनाए रखते हुए ईरान के प्रति जो संवेदना दिखाई है, वह भारत की स्वायत्त विदेश नीति (Independent Foreign Policy) की ताकत को दर्शाती है।
  2. सांप्रदायिक सौहार्द: मौलाना रजानी जैसे लोगों के विरोध के बावजूद, भारत के शिया और सुन्नी दोनों समुदायों के विद्वानों का एक मंच पर आना यह बताता है कि मजहबी नेतृत्व राजनीति से ऊपर उठकर सोच रहा है।
  3. न्याय के प्रति प्रतिबद्धता: सभा को संबोधित करने वाले विद्वानों, जिनमें लंदन से आए अयातुल्ला अकील अल-घरवी भी शामिल थे, ने जोर दिया कि खामेनई का रास्ता दबे-कुचले लोगों की आवाज बनने का रास्ता था।

सत्य की जीत और दुष्प्रचार की हार

नई दिल्ली में उमड़ी यह भीड़ इस बात की तस्दीक करती है कि दुष्प्रचार चाहे कितना भी किया जाए, सच और आपसी रिश्तों की गर्माहट उसे मात दे ही देती है। ईरान कल्चर हाउस में हुए इस कार्यक्रम ने यह साफ कर दिया है कि भारत और ईरान की दोस्ती केवल तेल या व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह साझा मूल्यों, संस्कृति और एक-दूसरे के दुख में साथ खड़े होने की रवायत पर टिकी है।

खामेनई की शहादत ने भले ही ईरान को एक बड़ा जख्म दिया हो, लेकिन भारत की सहानुभूति ने उस पर मरहम लगाने का काम किया है। आने वाले समय में मोजतबा खामेनई के नेतृत्व में भारत-ईरान संबंध और भी प्रगाढ़ होने की उम्मीद है, जो पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता के लिए अनिवार्य है।

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