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आबनाये हॉर्मुज पर ईरान का फिर कब्जा: क्या दुनिया महायुद्ध की कगार पर है?

वॉशिंगटन/इस्लामाबाद:

मध्य-पूर्व के समंदर में बारूद की गंध एक बार फिर तेज हो गई है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की ‘धमन’ कहे जाने वाले आबनाये हॉर्मुज (Strait of Hormuz) पर ईरान ने दोबारा पूर्ण नियंत्रण का दावा करते हुए अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही ठप कर दी है। यह घटनाक्रम ऐसे नाजुक वक्त पर आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच जारी दो सप्ताह का अल्पकालिक संघर्षविराम (Ceasefire) आगामी बुधवार को समाप्त होने वाला है।

इस घटना ने न केवल वैश्विक तेल बाजार में हड़कंप मचा दिया है, बल्कि कूटनीति की मेज पर बैठे वार्ताकारों के माथे पर भी बल ला दिए हैं।

हॉर्मुज में सन्नाटा: ठप हुई दुनिया की रफ़्तार

रविवार की सुबह खाड़ी देशों से आने वाली खबरों ने दुनिया को चौंका दिया। मरीन ट्रैफिक डेटा के अनुसार, शनिवार रात के बाद से किसी भी जहाज ने इस संकीर्ण जलमार्ग को पार नहीं किया है। ईरान ने स्पष्ट किया है कि यह कदम अमेरिका द्वारा उसके बंदरगाहों की निरंतर नौसैनिक नाकेबंदी के जवाब में उठाया गया है।

ईरानी समाचार एजेंसी ‘तसनीम’ के अनुसार, रविवार को बोत्सवाना और अंगोला के झंडे वाले दो टैंकरों को चेतावनी देकर वापस भेज दिया गया। ईरान का दावा है कि जब तक अमेरिका समझौते का उल्लंघन कर उसकी आर्थिक घेराबंदी जारी रखेगा, तब तक हॉर्मुज से व्यापारिक आवाजाही ‘अनधिकृत’ मानी जाएगी।


युद्ध का आठवां हफ्ता: विनाश की कहानी

28 फरवरी को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हवाई हमलों की शुरुआत की थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह संघर्ष इतना लंबा खिंच जाएगा। आज युद्ध आठवें हफ्ते में प्रवेश कर चुका है। हजारों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और मध्य-पूर्व की आग अब लेबनान तक फैल चुकी है।

युद्ध की वजह से तेल की कीमतों में आए रिकॉर्ड उछाल ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं की कमर तोड़ दी है। याद रहे कि युद्ध से पहले दुनिया के कुल तेल निर्यात का पांचवां हिस्सा इसी हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता था। आज वहां सिर्फ युद्धपोत और बारूदी सुरंगों का खतरा मंडरा रहा है।

इस्लामाबाद में कूटनीति की बिसात

युद्ध के मैदान से दूर, पाकिस्तान की राजधानी इस्लाबाद इस वक्त वैश्विक राजनीति का अखाड़ा बनी हुई है। पिछले हफ्ते अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी प्रतिनिधियों के बीच सीधी बातचीत हुई। दशकों बाद दोनों देशों के बीच यह पहली सीधी मेजपोशी थी।

ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाकर कलीबाफ ने सरकारी मीडिया से कहा, “बातचीत में कुछ मील के पत्थर तय हुए हैं, लेकिन परमाणु मुद्दों और हॉर्मुज के अधिकार को लेकर अभी भी अमेरिका और हमारे बीच मीलों का फासला है। हमारे लिए कुछ रेड-लाइन्स (अंतिम रेखाएं) हैं जिनसे हम समझौता नहीं करेंगे।”

वहीं, इस्लाबाद के सेरेना होटल में हलचल तेज है। होटल ने सभी बुकिंग्स रद्द कर दी हैं और चारों तरफ सुरक्षा का भारी घेरा है। माना जा रहा है कि बुधवार की समयसीमा से पहले वार्ता का एक और दौर यहीं संपन्न हो सकता है।


ट्रम्प की ‘ब्लैकमेल’ वाली चेतावनी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने चिर-परिचित अंदाज में ईरान को चेतावनी दे रहे हैं। शनिवार को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के साथ बैठक के बाद ट्रम्प ने कहा, “ईरान के साथ बातचीत अच्छी रही, लेकिन हम उनके ब्लैकमेल के आगे नहीं झुकेंगे।” ट्रम्प ने स्पष्ट शब्दों में धमकी दी है कि यदि बुधवार तक कोई स्थायी और व्यापक समझौता नहीं होता, तो अमेरिका अपनी ‘नो-फ्लाई ज़ोन’ नीति को और सख्त करेगा और बमबारी का सिलसिला दोबारा शुरू कर दिया जाएगा। ट्रम्प के लिए यह युद्ध घरेलू मोर्चे पर भी चुनौतीपूर्ण है। नवंबर में होने वाले मिड-टर्म चुनावों से पहले अमेरिका में ईंधन की बढ़ती कीमतें और मुद्रास्फीति उनकी लोकप्रियता के लिए खतरा बनी हुई हैं।

पाकिस्तान का ‘शांति प्रस्ताव’ और फील्ड मार्शल की भूमिका

इस पूरे संकट में पाकिस्तान एक निर्णायक मध्यस्थ बनकर उभरा है। ईरान की ‘सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल’ ने पुष्टि की है कि वे पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर द्वारा पेश किए गए शांति प्रस्तावों का गंभीरता से अध्ययन कर रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार, अमेरिका ने ईरान को 20 साल तक अपनी परमाणु गतिविधियों को पूरी तरह निलंबित करने का प्रस्ताव दिया है, जबकि ईरान इसे केवल 3 से 5 साल तक सीमित रखना चाहता है। पाकिस्तान की कोशिश है कि दोनों पक्षों को एक मध्य मार्ग पर लाया जाए ताकि वैश्विक आर्थिक तबाही को रोका जा सके।


भारत की चिंताएं और जहाजों पर हमला

भारत के लिए यह संकट सीधा और गहरा है। शनिवार को दो भारतीय जहाजों पर हॉर्मुज में हमले की रिपोर्ट आई, जिसके बाद नई दिल्ली ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। विदेश मंत्रालय ने दिल्ली में ईरानी राजदूत को तलब कर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है। भारत के ऊर्जा हितों के लिए हॉर्मुज का खुला रहना अनिवार्य है, और वहां भारतीय जहाजों पर गोलीबारी एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गई है।

तुर्की की उम्मीद: क्या बढ़ेगा संघर्षविराम?

एंटाल्या डिप्लोमेसी फोरम में तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने आशा व्यक्त की है कि बुधवार को खत्म होने वाला संघर्षविराम आगे बढ़ाया जाएगा। उन्होंने कहा, “कोई भी पक्ष युद्ध की विभीषिका दोबारा नहीं झेलना चाहता। हम आशावादी हैं कि कूटनीति की जीत होगी।”

निष्कर्ष: दुनिया के पास सिर्फ 72 घंटे

वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि दुनिया बारूद के ढेर पर बैठी है। अगले 72 घंटे यह तय करेंगे कि दुनिया एक बड़े ऊर्जा संकट और महायुद्ध में धकेली जाएगी या कूटनीति के जरिए शांति का कोई नया रास्ता निकलेगा।

आबनाये हॉर्मुज की बंदी ने स्पष्ट कर दिया है कि ईरान इस बार पीछे हटने के मूड में नहीं है, वहीं ट्रम्प की “बमबारी” की धमकी ने शांति की उम्मीदों को धुंधला कर दिया है। इस्लाबाद की बंद कमरों की बैठकों से ही अब दुनिया के लिए उम्मीद की किरण निकल सकती है।

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