News

ट्रंप की चुनावी हार से ईरान को उम्मीद, शांति समझौते पर बढ़ाई शर्तें

तेहरान की सख्त नीति के बीच कतर की मध्यस्थता जारी, अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की राह मुश्किल

दुबई/नई दिल्ली:

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को मिली हार के बाद ईरान में सत्ताधारी रूढ़िवादी नेताओं और कट्टरपंथी राजनीतिक समूहों का उत्साह बढ़ गया है। तेहरान में इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान युद्ध नीति के खिलाफ अमेरिकी जनता की नाराजगी के रूप में देखा जा रहा है। ईरानी नेताओं का मानना है कि चुनावी नतीजों ने अमेरिका पर दबाव बढ़ाया है। इससे ईरान को युद्ध समाप्त करने के लिए बातचीत में अपनी शर्तें मजबूत करने का मौका मिल सकता है।

हालांकि, ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौते की राह अभी आसान नहीं है। दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंध, अमेरिकी सैन्य मौजूदगी और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर मतभेद बने हुए हैं। दूसरी ओर, कतर और अन्य क्षेत्रीय देश युद्ध को दोबारा भड़कने से रोकने के लिए कूटनीतिक प्रयास कर रहे हैं।

सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के प्रभावशाली रूढ़िवादी नेता चाहते हैं कि अमेरिका के साथ किसी जल्दबाजी वाले समझौते से बचा जाए। उनका मानना है कि ट्रंप की राजनीतिक स्थिति कमजोर होने के बाद तेहरान को अपनी मांगों पर पीछे नहीं हटना चाहिए।

अमेरिकी चुनाव से ईरान को क्या फायदा दिख रहा है?

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की हार ने ईरान की राजनीति में नई चर्चा शुरू कर दी है। ईरान के रूढ़िवादी नेता और सरकारी मीडिया इसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की युद्ध नीति के खिलाफ जनता की प्रतिक्रिया बता रहे हैं।

ईरानी नेताओं का कहना है कि अमेरिका में युद्ध की आर्थिक लागत बढ़ रही है। तेल की कीमतों में उछाल और सैन्य खर्च को लेकर भी अमेरिकी जनता में नाराजगी है।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सोशल मीडिया पर लिखा कि रिपब्लिकन पार्टी की हार का कारण युद्ध था। ट्रंप ने भी स्वीकार किया कि ईरान के साथ संघर्ष ने चुनावी नतीजों को प्रभावित किया।

ईरान के कट्टरपंथी मीडिया संस्थान राजा न्यूज ने कहा कि अमेरिका को ईरान पर हमले की कीमत चुकानी चाहिए। उसके अनुसार, वाशिंगटन को ऐसा समझौता नहीं मिलना चाहिए, जिससे ट्रंप बिना किसी बड़ी रियायत के युद्ध समाप्त कर सकें।

ईरान के सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई ने भी बुधवार को किसी तरह की झुकने वाली नीति के खिलाफ चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि ईरान को समर्पण की ओर ले जाने वाले किसी भी कदम से बचना चाहिए।

इस बयान को ईरान के कट्टरपंथी नेताओं ने अमेरिका के साथ बातचीत में सख्त रुख बनाए रखने का संकेत माना है।

क्या ट्रंप की चुनावी हार से शांति वार्ता मुश्किल होगी?

ईरान के राजनीतिक नेतृत्व का मानना है कि अमेरिकी चुनाव के नतीजे उसकी रणनीति को सही साबित करते हैं। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, इससे दोनों देशों के बीच समझौते की प्रक्रिया और कठिन हो सकती है।

इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के वरिष्ठ ईरान विश्लेषक हमीदरेजा अजीजी ने सीएनएन से कहा कि ईरानी नेतृत्व अमेरिकी चुनाव परिणामों को अपनी रणनीति की सफलता के रूप में देख रहा है।

उनके अनुसार, तेहरान अब बातचीत में अधिक कठोर रुख अपना सकता है। खासकर परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों पर ईरान अमेरिका से पहले कदम उठाने की मांग कर सकता है।

ईरान चाहता है कि अमेरिका पहले आर्थिक प्रतिबंधों में राहत दे और सैन्य दबाव कम करे। इसके बाद परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत आगे बढ़ सकती है।

दूसरी ओर, डोनाल्ड ट्रंप के लिए भी समझौते को घरेलू राजनीति में सही साबित करना आसान नहीं होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति को ऐसा समझौता चाहिए, जिसे वह अपने समर्थकों के सामने बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर सकें।

यदि ईरान अपनी मांगों पर अड़ा रहता है और अमेरिका भी ठोस रियायतों की उम्मीद करता है, तो दोनों देशों के बीच बातचीत में लंबा समय लग सकता है।

कतर की मध्यस्थता से क्या उम्मीद है?

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए कतर लगातार कूटनीतिक प्रयास कर रहा है। क्षेत्रीय मध्यस्थों की कोशिश है कि दोनों देशों के बीच बातचीत जारी रहे और युद्ध दोबारा शुरू होने की स्थिति पैदा न हो।

कतर ने शुक्रवार को बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी से बातचीत की। इस दौरान क्षेत्रीय तनाव कम करने और शांति प्रयासों पर चर्चा हुई।

इससे पहले ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, पाकिस्तान, कुवैत, जॉर्डन, तुर्की, साइप्रस और कतर के प्रतिनिधियों से बातचीत की थी।

इन संपर्कों का उद्देश्य अमेरिका और ईरान के बीच मतभेद कम करना है। क्षेत्रीय देशों को चिंता है कि युद्ध दोबारा शुरू होने से पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

कतर के मध्यस्थ ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु वार्ता फिर शुरू करने की संभावनाओं पर भी काम कर रहे हैं।

एक क्षेत्रीय अधिकारी के अनुसार, अमेरिकी चुनाव के बाद युद्ध का खतरा कुछ कम हुआ है। हालांकि, सैन्य तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

ट्रंप ने गुरुवार को कहा कि अमेरिका ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान को बढ़ाने या आगे की कार्रवाई करने पर विचार कर रहा है। इससे क्षेत्र में तनाव बना हुआ है।

होर्मुज जलडमरूमध्य और ईरान की सात शर्तें

ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और युद्ध समाप्त करने के लिए पहले ही सात शर्तें सामने रखी हैं।

इनमें युद्ध रोकना, आर्थिक नुकसान का मुआवजा, अमेरिकी सैनिकों की वापसी और आर्थिक प्रतिबंधों में राहत जैसे मुद्दे शामिल हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। यहां से बड़ी मात्रा में तेल और ऊर्जा उत्पादों का परिवहन होता है।

इस मार्ग पर तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और वैश्विक व्यापार प्रभावित हो सकता है।

ईरान के कट्टरपंथी नेताओं का मानना है कि अमेरिका की चुनावी हार के बाद इन मांगों को और मजबूती से उठाया जाना चाहिए।

हालांकि, ईरान ने अभी तक औपचारिक रूप से कोई नई शर्त घोषित नहीं की है। उसकी मौजूदा मांगों को लेकर बातचीत जारी है।

सेंटर फॉर इंटरनेशनल पॉलिसी के वरिष्ठ गैर-निवासी फेलो सीना तौसी ने सीएनएन से कहा कि ईरान ऐसा समझौता चाहता है, जिससे उसकी सुरक्षा मजबूत हो और भविष्य में अमेरिका तथा इजराइल के हमलों का खतरा कम हो।

ईरान की कोशिश है कि युद्ध समाप्त होने के बाद भी उसके पास क्षेत्रीय प्रभाव और बातचीत की ताकत बनी रहे।

युद्ध से ईरान को भी भारी नुकसान

ईरान के कट्टरपंथी नेता अमेरिकी चुनाव परिणामों को अपनी जीत बता रहे हैं, लेकिन युद्ध ने ईरान को भी गंभीर नुकसान पहुंचाया है।

अमेरिका और इजराइल के सैन्य हमलों से ईरान की सैन्य और आर्थिक व्यवस्था प्रभावित हुई है। देश पर आर्थिक प्रतिबंध पहले से लागू हैं। इसके अलावा अमेरिकी समुद्री नाकेबंदी ने ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है।

तेल व्यापार और समुद्री परिवहन पर असर पड़ने से ईरान के लिए आर्थिक स्थिति संभालना मुश्किल हो रहा है।

ऐसे में तेहरान के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ उसे अमेरिका के साथ बातचीत में अपनी मांगें मजबूत रखनी हैं। दूसरी तरफ युद्ध के आर्थिक नुकसान को कम करना भी जरूरी है।

सीना तौसी के अनुसार, ईरान अपने बचे हुए रणनीतिक प्रभाव को बिना किसी ठोस समझौते के छोड़ना नहीं चाहता। यही वजह है कि तेहरान युद्ध समाप्त करने के लिए जल्दबाजी में कोई फैसला लेने से बच रहा है।

अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की राह

अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते को लेकर फिलहाल स्थिति स्पष्ट नहीं है।

अमेरिका चाहता है कि ईरान परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत करे और क्षेत्र में अपनी सैन्य गतिविधियों को सीमित करे। ईरान इसके बदले आर्थिक प्रतिबंधों में राहत, अमेरिकी सैन्य दबाव समाप्त करने और सुरक्षा संबंधी गारंटी की मांग कर रहा है।

दोनों देशों के बीच मतभेद केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य, तेल व्यापार, क्षेत्रीय सुरक्षा और अमेरिकी सैन्य मौजूदगी भी बातचीत के महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

कतर और अन्य क्षेत्रीय मध्यस्थों के सामने चुनौती है कि वे दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर बनाए रखें।

अमेरिका को ऐसा समझौता चाहिए, जिसे ट्रंप घरेलू राजनीति में अपनी सफलता बता सकें। वहीं, ईरान के कट्टरपंथी नेता मानते हैं कि अमेरिकी चुनावी हार का इस्तेमाल अपनी शर्तें मजबूत करने के लिए किया जाना चाहिए।

इस स्थिति में सवाल यह है कि क्या ईरान की बढ़ती राजनीतिक उम्मीदें उसे बातचीत में फायदा दिलाएंगी या उसकी कठोर मांगें शांति समझौते को और दूर कर देंगी?

फिलहाल, अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक प्रयास जारी हैं। लेकिन दोनों देशों की अलग-अलग प्राथमिकताओं और क्षेत्रीय तनाव के कारण युद्ध समाप्त करने का रास्ता अभी भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

मुख्य बात: अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की हार के बाद ईरान के कट्टरपंथी नेता अधिक कठोर बातचीत की मांग कर रहे हैं। कतर की मध्यस्थता जारी है, लेकिन परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और होर्मुज जलडमरूमध्य पर मतभेद अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की राह में बड़ी बाधा बने हुए हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *