अमेरिका ईरान शांति समझौते के बीच इजरायल का बेरूत पर भीषण हमला
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, वॉशिंगटन/यरुशलम/बेरूत
वाशिंगटन और यरुशलम से आ रही खबरें परेशान करने वाली हैं। मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच एक बड़ी हलचल देखने को मिली है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए बातचीत आखिरी दौर में है। इसी बीच इजरायली सेना ने लेबनान की राजधानी बेरूत पर भीषण हवाई हमले कर दिए हैं। यह हमला ऐसे समय में हुआ है जब दोनों देश एक समझौते के बेहद करीब पहुंच चुके हैं। वाशिंगटन में इस शांति समझौते की रूपरेखा लगभग तैयार हो चुकी है। लेकिन इजरायल के इस कदम ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इजरायल इस समझौते को किसी भी कीमत पर रोकना चाहता है।
दुनिया भर के कूटनीतिक हलकों में इस हमले की टाइमिंग को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ईरान से सीधे टकराव के बाद इजरायल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग थलग पड़ता दिख रहा है। जब भी अमेरिका और ईरान के रिश्ते सुधरने की दिशा में बढ़ते हैं, तब इजरायल की तरफ से कोई न कोई बड़ी सैन्य कार्रवाई सामने आती है। इस बार भी जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने समझौते का दावा किया, तब बेरूत के दक्षिणी उपनगरों को बमबारी से दहला दिया गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार बेरूत के आसमान में चारों तरफ धुएं का गुबार देखा जा रहा है।
ट्रंप का दावा और जमीनी हकीकत
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध रोकने के लिए रविवार तक समझौता हो सकता है। ट्रंप के मुताबिक इस समझौते के तुरंत बाद रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण जलमार्ग स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को सभी के लिए खोल दिया जाएगा। वाशिंगटन का यह भी दावा है कि इस समझौते के जरिए अमेरिका अंततः ईरान की परमाणु सामग्री पर नियंत्रण हासिल कर लेगा। हालांकि तेहरान इस समयसीमा से पूरी तरह सहमत नहीं है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि समझौते पर हस्ताक्षर अगले कुछ दिनों के भीतर हो सकते हैं।
ईरान की सरकारी मीडिया के अनुसार तेहरान ने अभी तक इस समझौते के ढांचे पर अंतिम फैसला नहीं लिया है। कतर के मध्यस्थ इस समय ईरान के दौरे पर हैं ताकि बातचीत को अंतिम रूप दिया जा सके। पाकिस्तान भी इस पूरी शांति प्रक्रिया में एक मुख्य सूत्रधार की भूमिका निभा रहा है। पाकिस्तान की अगुवाई में ही यह बातचीत इस स्तर तक पहुंच पाई है। लेकिन इजरायल को इस पूरी वार्ता से बाहर रखा गया है। यही वजह है कि बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार इस डील से बेहद नाराज है।
युद्ध के मैदान से राजनीतिक दांवपेच
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने बेरूत पर हुए हमलों का बचाव किया है। इजरायली सेना का कहना है कि यह कार्रवाई उत्तरी इजरायल में हिजबुल्लाह के हमलों के जवाब में की गई है। इजरायल के मुताबिक हिजबुल्लाह ने उत्तरी इजरायल की सीमा में तीन मिसाइलें दागी थीं। इसके बाद इजरायली वायुसेना ने बेरूत में हिजबुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाया। लेबनान में जारी इस जंग की जड़ें काफी गहरी हैं। मार्च के महीने में जब अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर हमला किया था, उसके दो दिन बाद हिजबुल्लाह ने इजरायल पर मिसाइलें दागना शुरू कर दिया था। इसके बाद से ही इजरायली सेना लेबनान के काफी अंदर तक घुस चुकी है। पिछले 25 साल में यह इजरायल का लेबनान में सबसे बड़ा जमीनी दखल है।
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक पुरानी कूटनीतिक खींचतान भी काम कर रही है। इससे पहले जब पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान एक समझौते के करीब पहुंचे थे, तब ईरान ने एक सनसनीखेज दावा किया था। ईरान का कहना था कि जब वह इजरायल पर जवाबी हमले कर रहा था, तब इजरायली प्रधानमंत्री खुद को बचाने के लिए संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई भाग गए थे। वहां उन्होंने यूएई के राजा से सीक्रेट मुलाकात की थी। इसके बाद इजरायल ने भी जवाबी दांव चलते हुए दावा किया था कि ईरान पर हुए हमलों में सऊदी अरब ने भी पर्दे के पीछे से इजरायल का साथ दिया था और बमबारी में शामिल था। इस तरह की बयानबाजी का मकसद सिर्फ दोनों देशों के बीच अविश्वास पैदा करना था।
समझौते के रास्ते में रोड़े
ईरान और अमेरिका के बीच जो समझौता तैयार हो रहा है, वह मौजूदा रूप में इजरायल के लिए एक बड़ा झटका है। इजरायल को लगता है कि इस डील से ईरान को दोबारा मजबूत होने का मौका मिलेगा। ईरान की मुख्य मांग है कि इस सीजफायर समझौते में लेबनान के मोर्चे को भी शामिल किया जाए। इसके अलावा ईरान अमेरिका द्वारा फ्रीज की गई अपनी अरबों डॉलर की संपत्ति को भी वापस पाना चाहता है।
बेरूत पर हुआ यह हमला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि 7 अप्रैल को लागू हुआ युद्धविराम अब पूरी तरह खतरे में पड़ गया है। पिछले हफ्ते भी इजरायल ने बेरूत पर बमबारी की थी, जिसके जवाब में ईरान ने सीधे इजरायल पर मिसाइलें दागी थीं। इसके अगले ही दिन इजरायल ने फिर ईरान को निशाना बनाया। इस सीधे टकराव के बाद ही अमेरिका और ईरान ने महसूस किया कि स्थिति को संभालना जरूरी है। यही वजह है कि दोनों देश बातचीत की मेज पर आए।
वैश्विक तेल बाजार और सुरक्षा पर असर
इस पूरे विवाद का असर सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के बंद होने या वहां तनाव बढ़ने से वैश्विक तेल आपूर्ति ठप होने का खतरा रहता है। ट्रंप इसीलिए इस रास्ते को तुरंत खुलवाना चाहते हैं। अगर यह समझौता हो जाता है तो दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें स्थिर हो सकती हैं। लेकिन इजरायल का मानना है कि अमेरिका इस समझौते के चक्कर में उसकी सुरक्षा की अनदेखी कर रहा है।
कतर और पाकिस्तान जैसे देश इस समय पूरी कोशिश कर रहे हैं कि इजरायल के उकसावे के बावजूद यह बातचीत न टूटे। कतर के राजनयिक लगातार तेहरान और वाशिंगटन के बीच संदेशों का आदान-प्रदान कर रहे हैं। अब देखना यह होगा कि क्या आने वाले दो दिनों में ट्रंप अपने वादे के मुताबिक समझौते पर हस्ताक्षर करवा पाते हैं या इजरायल की यह बमबारी एक बार फिर पूरी शांति प्रक्रिया को पटरी से उतार देती है। बेरूत से उठता धुआं इस बात का गवाह है कि मध्य पूर्व में शांति की राह अभी भी बेहद कठिन है।
मुख्य बिंदु: यह रिपोर्ट वर्तमान में चल रहे कूटनीतिक घटनाक्रमों पर आधारित है। अमेरिका और ईरान के बीच का यह युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित कर रहा है। लेबनान में इजरायल की सैन्य कार्रवाई इस पूरी शांति प्रक्रिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।
FAQ Section
इजरायल ने बेरूत पर हमला क्यों किया?
इजरायल का कहना है कि यह कार्रवाई उत्तरी इजरायल पर हुए कथित रॉकेट हमलों के जवाब में की गई।
क्या अमेरिका और ईरान के बीच समझौता होने वाला है?
दोनों देशों के बीच वार्ता जारी है। अमेरिका ने प्रगति का दावा किया है, जबकि ईरान ने कहा है कि अंतिम निर्णय अभी बाकी है।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों महत्वपूर्ण है?
यह वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है।
लेबनान संकट का क्षेत्रीय असर क्या हो सकता है?
इसका प्रभाव इजरायल, ईरान, खाड़ी देशों, ऊर्जा बाजार और पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति पर पड़ सकता है।

