News

पर्यावरण संकट पर जमाअत महिला विंग की राष्ट्रीय चर्चा

नई दिल्ली।

विश्व पर्यावरण दिवस 2026 के अवसर पर जमाअत ए इस्लामी हिंद के महिला विंग ने “पर्यावरण संकट: नैतिकता और जिम्मेदारी की परीक्षा” विषय पर एक राष्ट्रीय ऑनलाइन परिचर्चा आयोजित की। कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से पर्यावरण विशेषज्ञों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, जलवायु शोधकर्ताओं और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों ने भाग लिया। चर्चा का केंद्र बिंदु यह था कि बढ़ते जलवायु संकट, पर्यावरण प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के दौर में समाज की नैतिक जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए।

परिचर्चा में वक्ताओं ने स्पष्ट कहा कि जलवायु परिवर्तन केवल वैज्ञानिक या तकनीकी चुनौती नहीं है, बल्कि यह नैतिकता, सामाजिक न्याय और मानव जिम्मेदारी से जुड़ा हुआ प्रश्न भी है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते जीवनशैली और विकास के मौजूदा मॉडल में बदलाव नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर पर्यावरणीय संकट का सामना करना पड़ेगा।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जमाअत ए इस्लामी हिंद की राष्ट्रीय सचिव रहमतुन्निसा ए. ने कहा कि पर्यावरण की सुरक्षा केवल सरकारी नीतियों का विषय नहीं है बल्कि यह हर व्यक्ति की नैतिक और आध्यात्मिक जिम्मेदारी भी है। उन्होंने महात्मा गांधी के प्रसिद्ध कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि धरती प्रत्येक व्यक्ति की जरूरत पूरी कर सकती है, लेकिन किसी के लालच को नहीं।

उन्होंने कहा कि प्रकृति मानवता के पास एक अमानत है। इस अमानत की रक्षा करना हर इंसान का कर्तव्य है। इस्लाम में इंसान को धरती का संरक्षक माना गया है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण केवल सामाजिक कार्य नहीं बल्कि एक धार्मिक और नैतिक दायित्व भी है।

रहमतुन्निसा ने कहा कि पर्यावरणीय क्षति का सबसे बड़ा असर गरीब और वंचित वर्गों पर पड़ता है। जो लोग संसाधनों का सबसे कम उपयोग करते हैं, अक्सर वही जलवायु आपदाओं का सबसे अधिक नुकसान झेलते हैं। उन्होंने जिम्मेदार उपभोग, संसाधनों के न्यायपूर्ण उपयोग और टिकाऊ जीवनशैली अपनाने की जरूरत पर बल दिया।

जमाअत ए इस्लामी हिंद की सहायक सचिव सुमैया मरियम ने अपने उद्घाटन संबोधन में कहा कि पर्यावरण संकट आज समाज के सामने एक नैतिक आईने की तरह खड़ा है। यह हमारे व्यवहार, हमारी प्राथमिकताओं और विकास के मॉडल की वास्तविक तस्वीर दिखाता है।

उन्होंने हाल के वर्षों में दुनिया भर में बढ़ी बाढ़, जंगलों में लगी भीषण आग और मौसम के बदलते स्वरूप का जिक्र किया। उन्होंने विशेष रूप से कनाडा में लगी विनाशकारी जंगल की आग और विभिन्न देशों में आई बाढ़ का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रकृति बार बार चेतावनी दे रही है। इसके बावजूद मानव समाज अभी भी संसाधनों के अंधाधुंध दोहन और असंतुलित उपभोग की राह पर चल रहा है।

सुमैया मरियम ने कहा कि विज्ञान और तकनीक समाधान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन केवल तकनीकी उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। जब तक मानव व्यवहार और नैतिक सोच में बदलाव नहीं आएगा, तब तक स्थायी समाधान संभव नहीं है।

केरल की प्रसिद्ध सोशल एंथ्रोपोलॉजिस्ट डॉ. मंजू जे. मनोज ने जलवायु परिवर्तन के सामाजिक प्रभावों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जलवायु संकट सभी लोगों को समान रूप से प्रभावित नहीं करता। मछुआरा समुदाय, आदिवासी समाज और जंगलों पर आधारित आजीविका वाले लोग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।

उन्होंने कहा कि जब समुद्र का स्तर बढ़ता है या प्राकृतिक आपदाएं आती हैं तो सबसे पहले कमजोर समुदायों की आजीविका प्रभावित होती है। इससे पहले से मौजूद सामाजिक और आर्थिक असमानताएं और गहरी हो जाती हैं। इसलिए जलवायु न्याय को पर्यावरण नीति का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

नई दिल्ली की जलवायु शोधकर्ता चित्रा गंगवानी ने भारत के छोटे शहरों और कस्बों के सामने खड़ी चुनौतियों पर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि टियर टू और टियर थ्री शहरों में जल संकट तेजी से बढ़ रहा है। कई शहरों में जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़, सूखा और अत्यधिक गर्मी जैसी समस्याएं गंभीर रूप ले रही हैं।

उन्होंने कहा कि जलवायु अनुकूल विकास के लिए मजबूत वित्तीय व्यवस्था, स्थानीय स्तर पर योजनाएं और प्रभावी संस्थागत ढांचा विकसित करना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। यदि छोटे शहरों को तैयार नहीं किया गया तो भविष्य में बड़ी आबादी संकट का सामना करेगी।

गोवा की पर्यावरणविद और आर्किटेक्ट तलुला डी सिल्वा ने आधुनिक निर्माण मॉडल पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सीमेंट और कंक्रीट आधारित विकास मॉडल ने प्राकृतिक संतुलन को नुकसान पहुंचाया है। इसके कारण शहरों का तापमान बढ़ रहा है और पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।

उन्होंने पर्यावरण अनुकूल निर्माण तकनीकों को बढ़ावा देने की जरूरत बताई। साथ ही स्थानीय वास्तुकला और प्रकृति आधारित निर्माण पद्धतियों को फिर से अपनाने की वकालत की। उन्होंने अत्यधिक उपभोग को भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों पर अतिक्रमण बताते हुए इसे अंतर पीढ़ीगत उपनिवेशवाद की संज्ञा दी।

अहमदाबाद की समाज सेविका सुमैया हसीब शेख ने पर्यावरण संरक्षण में समुदाय की भूमिका पर जोर दिया। सरीसृप संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय सुमैया ने कहा कि केवल फोटो खिंचवाने के लिए पौधारोपण अभियान चलाना पर्याप्त नहीं है। असली जरूरत लोगों के व्यवहार में स्थायी बदलाव लाने की है।

उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण तभी सफल होगा जब समाज का हर वर्ग अपनी दैनिक आदतों में बदलाव लाए। पानी की बचत, प्लास्टिक का कम उपयोग और जैव विविधता की रक्षा जैसे कदम व्यक्तिगत स्तर पर भी उठाने होंगे।

छत्तीसगढ़ की शिक्षिका फखरा तबस्सुम ने जलवायु शिक्षा को स्कूल स्तर से शुरू करने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि बच्चों को प्रारंभिक अवस्था से ही पर्यावरण संरक्षण के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। कचरे का पृथक्करण, पेड़ लगाना, पानी बचाना और ऊर्जा संरक्षण जैसी आदतें बचपन से विकसित की जानी चाहिए।

परिचर्चा के अंत में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल विकास का मुद्दा नहीं है बल्कि यह मानवता की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने हरित चेतना विकसित करने का आह्वान किया, जिसमें नैतिक मूल्य, जिम्मेदार जीवनशैली और सामूहिक भागीदारी शामिल हो।

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर आयोजित इस राष्ट्रीय परिचर्चा ने यह संदेश दिया कि जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संकट, ग्लोबल वार्मिंग, जल संरक्षण और सतत विकास जैसे मुद्दों का समाधान केवल नीतियों से नहीं बल्कि समाज की सामूहिक जागरूकता और नैतिक प्रतिबद्धता से संभव है। वक्ताओं ने कहा कि पृथ्वी को सुरक्षित रखना वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेदारी ही नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति एक नैतिक वचन भी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *