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जम्मू-कश्मीर राज्यसभा चुनाव: नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जीती तीन सीट, भाजपा को मिली एक

मुस्लिम नाउ ब्यूरो,श्रीनगर

जम्मू-कश्मीर की राजनीति में आज एक ऐतिहासिक दिन दर्ज हुआ, जब अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद पहली बार राज्यसभा चुनाव संपन्न हुए। इस चुनाव में जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) ने शानदार प्रदर्शन करते हुए चार में से तीन सीटों पर जीत हासिल की, जबकि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एक सीट जीतने में सफल रही।

आधिकारिक परिणामों के अनुसार, एनसी के वरिष्ठ नेता चौधरी मोहम्मद रमज़ान, सज्जाद अहमद किचलू और गुरविंदर सिंह ओबेरॉय विजेता बने हैं। वहीं भाजपा के सती शर्मा ने चौथी सीट पर कब्ज़ा जमाया।

कुल 86 विधायकों ने इस चुनाव में मतदान किया। चौधरी मोहम्मद रमज़ान ने 58 वोट पाकर निर्णायक जीत दर्ज की, जबकि सज्जाद किचलू और गुरविंदर ओबेरॉय ने भी पर्याप्त बहुमत से जीत हासिल की।

तीव्र सियासी मुकाबला, अंतिम दौर तक रोमांच बरकरार

यह मुकाबला अंतिम गणना तक बेहद रोमांचक बना रहा। एनसी और भाजपा दोनों ही अपने-अपने संख्याबल को लेकर आत्मविश्वास जताती रही थीं। हालांकि, कांग्रेस, पीडीपी, सीपीआई(एम) और कई निर्दलीय विधायकों के समर्थन ने एनसी के पक्ष में संतुलन झुका दिया।

तीन सीटों पर एनसी को स्पष्ट बहुमत मिला, जबकि भाजपा ने अपने गठबंधन सहयोगियों और निर्दलीयों के अनुशासित मतदान के बल पर एक सीट बरकरार रखी।

राजनीतिक संतुलन और नई शुरुआत

इन नतीजों ने जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक तस्वीर में एक बार फिर एनसी की मज़बूत उपस्थिति दर्ज कराई है। पार्टी के नेताओं ने इस जीत को “जनता के भरोसे और लोकतांत्रिक पुनर्स्थापन की दिशा में एक बड़ा कदम” बताया है।

वहीं भाजपा नेताओं ने कहा कि राज्यसभा में पार्टी की मौजूदगी यह दर्शाती है कि “जम्मू-कश्मीर के लोग विकास और स्थिरता के एजेंडे पर भरोसा रखते हैं।”

अनुच्छेद 370 के बाद पहली राज्यसभा चुनावी परीक्षा

यह राज्यसभा चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक रहा। अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटने और राज्य के पुनर्गठन के बाद यह पहली बार था जब केंद्र शासित प्रदेश से ऊपरी सदन के सदस्य चुने गए।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये नतीजे आने वाले विधानसभा चुनावों की दिशा और रणनीति पर भी असर डाल सकते हैं।

सियासी संदेश साफ़: एनसी का प्रभाव बरकरार, भाजपा की पकड़ कायम

तीन-एक के इस नतीजे ने स्पष्ट कर दिया है कि कश्मीर घाटी में एनसी का प्रभाव अभी भी मज़बूत है, जबकि जम्मू क्षेत्र में भाजपा की पकड़ बनी हुई है।
दोनों दल अब संसद के ऊपरी सदन में जम्मू-कश्मीर की आवाज़ बनने का दावा कर रहे हैं।


सारांश:
यह परिणाम न केवल जम्मू-कश्मीर की सियासी नब्ज़ को दर्शाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि क्षेत्र की राजनीति धीरे-धीरे लोकतांत्रिक संस्थाओं की ओर लौट रही है। एनसी की तीन सीटों पर जीत उसके पारंपरिक जनाधार की पुनर्पुष्टि है, जबकि भाजपा की सफलता बताती है कि उसकी राजनीतिक उपस्थिति को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।