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केरल की बेटी निमिषा: क्या शरिया के साए में लिखी जाएगी नई कहानी?

मुस्लिम नाउ विशेष

क्या केरल की नर्स निमिषा प्रिया की जान बच पाएगी? यह सवाल भारत में हर किसी की चिंता का विषय बना हुआ है। यमन की अदालत ने निमिषा को यमनी नागरिक तलाल महदी की हत्या का दोषी ठहराया है और उसे सजा-ए-मौत सुनाई है। आरोप है कि निमिषा ने महदी को नशीला इंजेक्शन देकर उसकी हत्या की और फिर उसके शरीर के टुकड़े कर पानी की टंकी में छुपा दिया। इस घटना के बाद तलाल महदी का परिवार, विशेष रूप से उसका भाई अब्देल फत्ताह महदी, बेहद आक्रोशित है और वह किसी भी तरह की माफी देने को तैयार नहीं दिख रहा। उनका कहना है कि वे केवल शरिया कानून का पालन करेंगे, जो कहता है कि खून का बदला खून है।

भारत में यह सवाल लगातार गूंज रहा है कि क्या भारत के ग्रैंड मुफ्ती शेख अबू बकर अहमद और भारत सरकार के प्रयास निमिषा की सजा को टालने या खत्म करने में सफल होंगे। 16 जुलाई को यह आशंका थी कि निमिषा को फांसी दे दी जाएगी, लेकिन आखिरी वक्त में सजा टल गई। माना जा रहा है कि इस देरी के पीछे भारत सरकार, धार्मिक संगठनों और ग्रैंड मुफ्ती के प्रयासों का हाथ है। हालांकि, यमन की मौजूदा स्थिति काफी जटिल है। वहां स्थायी सरकार नहीं है और भारत-यमन के राजनयिक संबंध भी कमजोर हैं। ऐसे में कूटनीतिक दखल आसान नहीं है।

इस बीच, अब्देल फत्ताह महदी ने भारतीय मीडिया की कुछ रिपोर्टों को खारिज कर दिया है, जिनमें कहा गया था कि वे भारतीय या यमनी धर्मगुरुओं से मिले हैं या किसी मध्यस्थ से बात हुई है। उन्होंने सोशल मीडिया पर स्पष्ट कहा, “हम न किसी भारतीय धर्मगुरु से मिले हैं, न यमनी धर्मगुरु से। न ही हमारी ओर से किसी प्रतिनिधि से बात हुई है। हम अपने रुख पर अड़े हैं और अल्लाह के कानून का पालन करने के हकदार हैं।” उनका यह भी कहना है कि फांसी में देरी से उनके परिवार की प्रतिशोध की भावना और बढ़ गई है।

यमन में शरिया कानून का कड़ा पालन होता है। इसमें हत्या के मामलों में दोषी को सजा-ए-मौत दी जाती है। लेकिन शरिया में ही एक विकल्प है जिसे ‘ब्लड मनी’ (खून बहा) कहा जाता है। इसका मतलब है कि पीड़ित परिवार चाहे तो धन लेकर दोषी को माफ कर सकता है। हालांकि, ब्लड मनी का फैसला पूरी तरह पीड़ित परिवार पर निर्भर करता है और ऐसे मामले बहुत कम देखने को मिलते हैं।

अरब देशों की सामाजिक संरचना को समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार शाहीन नजर बताते हैं कि वहां मौत की सजा की प्रक्रिया बेहद कठोर होती है। सऊदी अरब के जेद्दा में फांसी का दृश्य उन्होंने कई बार देखा है। दोषी को घुटनों के बल बैठाकर तलवार से एक ही झटके में सिर धड़ से अलग कर दिया जाता है। लेकिन कई बार ठीक इसी क्षण पीड़ित परिवार दोषी को माफ कर देता है। यह माफी इस्लाम में सबसे बड़ा सद्गुण माना जाता है। “मैंने कई बार देखा है कि जैसे ही पीड़ित परिवार माफी की घोषणा करता है, वहां जश्न का माहौल बन जाता है। माफ करने वालों को लोग कंधों पर उठा लेते हैं, व्यापारी उन्हें कीमती सामान देते हैं और सरकार भी ऐसे परिवारों का सम्मान करती है,” शाहीन नजर कहते हैं।

यमन में भी निमिषा के मामले में ऐसा संभव हो सकता है। पीड़ित परिवार शायद दोषी को अपने प्रियजन की हत्या का दर्द महसूस कराना चाहता है। लेकिन अंतिम क्षणों में वे माफी का फैसला भी कर सकते हैं। भारत सरकार और धार्मिक संगठनों के प्रयास इसी दिशा में हैं। ग्रैंड मुफ्ती शेख अबू बकर अहमद पहले ही यमन के धार्मिक नेताओं से संपर्क कर चुके हैं। विदेश मंत्रालय भी अरब देशों, खासकर सऊदी अरब और यूएई में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर यमन के समुदायों पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।

ब्लड मनी इस मामले का एक संभावित समाधान हो सकता है। यदि अब्देल फत्ताह का परिवार भारी मुआवजा लेकर माफी देने को तैयार हो जाए, तो सजा टल सकती है। हालांकि, अब तक उनके बयानों से यह नहीं लगता कि वे इस विकल्प को मानने को तैयार हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि समय के साथ भावनाएं बदल सकती हैं। अरब देशों में अक्सर दोषी के परिवार और स्थानीय समुदाय की मध्यस्थता से पीड़ित परिवार को माफ करने के लिए तैयार किया जाता है।

निमिषा प्रिया का मामला केवल एक हत्या का मामला नहीं है, बल्कि यह भारत की कूटनीतिक क्षमता, नागरिकों की सुरक्षा और मानवाधिकारों से भी जुड़ा है। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, निमिषा यमन में शोषण की शिकार हुई थी, उसका पासपोर्ट जब्त कर लिया गया था और उसे बंधक जैसी स्थिति में रखा गया था। हालांकि, यमन की अदालत ने इन दलीलों को खारिज कर दिया और उसे दोषी ठहराया।

तलाल महदी का परिवार उत्तरी यमन के एक प्रभावशाली जनजातीय समूह से आता है। ऐसे जनजातीय समूह वहां की सरकार और प्रशासन पर भी भारी दबाव रखते हैं। यही कारण है कि यदि वे फांसी पर अड़े रहते हैं, तो सरकार भी कुछ नहीं कर पाएगी।

इसके बावजूद 16 जुलाई को फांसी टलने का मतलब है कि कहीं न कहीं बातचीत की संभावनाएं हैं। यदि मामला पूरी तरह बंद होता, तो यमन में किसी तरह की रियायत नहीं दी जाती। अब्देल फत्ताह ने यह भी कहा है कि वे निमिषा के परिवार से सीधे बात कर सकते हैं। यह एक सकारात्मक संकेत है।

यमन की सामाजिक और धार्मिक परंपराओं को देखते हुए कहा जा सकता है कि अंतिम समय में चमत्कार संभव है। अगर अब्देल फत्ताह महदी का परिवार माफी देने का फैसला करता है, तो निमिषा प्रिया की जान बच सकती है। भारत सरकार की सक्रियता, ग्रैंड मुफ्ती का हस्तक्षेप और अरब देशों में भारत के गहरे रिश्ते इस दिशा में मदद कर सकते हैं।

निष्कर्षतः, भले ही यमन की अदालत ने सजा-ए-मौत सुनाई है, लेकिन अरब देशों की माफी की परंपरा को देखते हुए यह कहना जल्दबाजी होगी कि सबकुछ खत्म हो गया है। यदि ब्लड मनी या मानवीय संवेदनाओं के जरिए पीड़ित परिवार का दिल बदला जा सका, तो निमिषा प्रिया की जान बचाई जा सकती है। भारत सरकार को अंतिम समय तक पूरी ताकत के साथ प्रयास करते रहना होगा, क्योंकि यह केवल निमिषा का मामला नहीं है, बल्कि यह भारत की कूटनीति और मानवता की परीक्षा भी है।