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खामेनेई इज बैक: डिजिटल बारूद और दिमागों की जंग

एक आलीशान कमरा है। ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई अपनी पोती के साथ खेल रहे हैं। बच्ची उनका हाथ पकड़ती है। बुजुर्ग खामेनेई मुस्कुराते हुए उसे अपने कंधे पर बिठा लेते हैं। हंसी-ठिठोली का माहौल है। तभी अचानक आसमान चीरती हुई एक भारी-भरकम मिसाइल छत पर गिरती है। पलक झपकते ही सब कुछ धुआं-धुआं हो जाता है। घर के मलबे के बीच सिर्फ एक गहरा गड्ढा बचता है।

अगले ही पल दृश्य बदलता है। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू टीवी पर आते हैं। वे दुनिया को खामेनेई की मौत की खबर देते हैं। जश्न का माहौल है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। मलबे के बीच से एक गुलाबी पत्थर की अंगूठी चमकती है। यह ‘संग-ए-अस्वद’ की वही अंगूठी है जो खामेनेई पहनते थे। एक हाथ बढ़ता है और उस अंगूठी को पहन लेता है। यह मोजतबा खामेनेई हैं, उनके बेटे। उनकी आंखों में प्रतिशोध की आग है। वे फटा हुआ ईरानी झंडा उठाते हैं।

तभी वाशिंगटन के एक बंद कमरे में फोन की घंटी बजती है। डोनाल्ड ट्रंप रिसीवर उठाते हैं। दूसरी तरफ से एक भारी और भर्राई हुई आवाज आती है— “खामेनेई इज बैक।”

इसके बाद शुरू होती है मिसाइलों की बारिश। इजरायल और खाड़ी में अमेरिकी ठिकानों पर कहर टूट पड़ता है।

यह फिल्म नहीं, मनोवैज्ञानिक हथियार है

ऊपर जो आपने पढ़ा, वह किसी हॉलीवुड फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं है। यह दो मिनट 45 सेकंड का एक एआई-जनरेटेड जापानी एनीमेशन है। इसकी भाषा जापानी है, लेकिन इसका संदेश वैश्विक है। सोशल मीडिया पर ऐसी दर्जनों फिल्में तैर रही हैं। ‘ईरान वर्सेज इजरायल: एपोकालिप्स वार’ और ‘द फॉल ऑफ तेहरान’ जैसी लघु फिल्में करोड़ों बार देखी जा रही हैं।

सवाल यह है कि जब असल मैदान में मिसाइलें गरज रही हों, तब ये कार्टून फिल्में क्यों बनाई जा रही हैं? इसका जवाब है— साइकोलॉजिकल वारफेयर यानी मनोवैज्ञानिक युद्ध।

आज के दौर में युद्ध सिर्फ सरहदों पर नहीं लड़ा जाता। वह आपके मोबाइल स्क्रीन और आपके दिमाग के भीतर लड़ा जा रहा है। एआई ने इस खेल को और भी खतरनाक बना दिया है। अब दुश्मन को हराने के लिए उसे मारना जरूरी नहीं, उसे डराना और उसका मनोबल तोड़ना काफी है।

प्रोपेगेंडा की नई प्रयोगशाला

‘द फॉल ऑफ तेहरान’ जैसी फिल्मों में दिखाया जा रहा है कि ईरान के भीतर हुए हालिया विद्रोह के पीछे सीआईए और मोसाद का हाथ था। दावा किया जा रहा है कि विदेशी एजेंटों ने पैसे देकर सड़कों पर कत्लेआम मचाया ताकि सरकार को बदनाम किया जा सके। वहीं ‘एपोकालिप्स वार’ में दिखाया गया है कि कैसे ईरानी नौसेना ने अमेरिका के विशालकाय युद्धपोत अब्राहम लिंकन को डुबो दिया।

ये फिल्में हकीकत नहीं हैं, लेकिन ये हकीकत जैसा अहसास पैदा करती हैं। जब एक आम नागरिक या सैनिक बार-बार अपनी हार या अपने नेता की मौत के एआई वीडियो देखता है, तो उसका विश्वास डगमगाने लगता है।

अभी हाल ही में खबर उड़ी कि नेतन्याहू हमले में मारे गए। खबर इतनी तेजी से फैली कि इजरायल को सबूत के तौर पर उनका वीडियो जारी करना पड़ा। वहीं ब्रिटिश अखबार ‘द सन’ ने दावा किया कि मोजतबा खामेनेई कोमा में हैं और उनका पैर काट दिया गया है। यह सब उसी सूचना युद्ध का हिस्सा है जहां सच और झूठ के बीच की लकीर मिटा दी गई है।

Sun Tzu से लेकर एआई तक: इतिहास का सबक

युद्ध में दिमाग से खेलने की कला नई नहीं है। प्राचीन चीनी रणनीतिकार सन त्ज़ु ने सदियों पहले अपनी किताब ‘द आर्ट ऑफ वॉर’ में लिखा था कि हर युद्ध धोखे पर आधारित होता है। उन्होंने कहा था कि सबसे बड़ी जीत वह है, जिसमें बिना लड़े ही दुश्मन का प्रतिरोध तोड़ दिया जाए।

इतिहास गवाह है कि महान सेनापतियों ने हथियारों से ज्यादा डर का इस्तेमाल किया:

  • अलेक्जेंडर और हैनिबल: इन्होंने युद्ध में हाथियों का इस्तेमाल किया। दुश्मन की सेना ने जब पहली बार इन विशाल जानवरों को देखा, तो वे बिना लड़े ही भाग खड़े हुए।
  • चंगेज खान: वह क्रूरता की कहानियों को जानबूझकर फैलने देता था। वह कुछ लोगों को जिंदा छोड़ देता था ताकि वे जाकर उसकी दहशत का किस्सा सुनाएं। लोग उसका नाम सुनकर ही सरेंडर कर देते थे।
  • फ्रांसिस्को पिजारो: महज 168 सैनिकों के साथ उसने पूरे इंका साम्राज्य को धूल चटा दी। इंका लोगों ने कभी घोड़े या बारूद नहीं देखा था। उनके लिए यह किसी दैवीय प्रकोप जैसा था।

रेडियो से डिजिटल स्क्रीन तक का सफर

मनोवैज्ञानिक युद्ध ने समय के साथ अपने औजार बदले हैं। प्रथम विश्व युद्ध में विमानों से पर्चे गिराए जाते थे जिनमें गलत जानकारियां होती थीं। द्वितीय विश्व युद्ध में ‘टोक्यो रोज’ नाम की एक जापानी महिला रेडियो पर अमेरिकी सैनिकों को अंग्रेजी में डराती थी। वह उन्हें बताती थी कि उनकी पत्नियां उन्हें धोखा दे रही हैं और उनके देश की हालत खराब है। इसका मकसद सैनिकों का मनोबल तोड़ना था।

शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ ने रेडियो स्टेशनों का एक पूरा जाल बिछा दिया था। सीआईए ने ‘एमके अल्ट्रा’ जैसे प्रोजेक्ट्स पर काम किया, जिनका मकसद इंसानी दिमाग को नियंत्रित करना था। विशेषज्ञों का मानना है कि सोवियत संघ का पतन टैंकों से नहीं, बल्कि पश्चिमी प्रोपेगेंडा और रेडियो फ्री यूरोप के माध्यम से फैली सूचनाओं से हुआ था।

इंटरनेट: झूठ की नई सुपरपावर

आज का दौर एआई का है। अब फेक न्यूज बनाने के लिए किसी बड़ी मशीनरी की जरूरत नहीं है। एक साधारण ऐप से आप किसी भी बड़े नेता का फर्जी वीडियो बना सकते हैं। 2014 में रूस ने क्रीमिया संकट के दौरान इंटरनेट का ऐसा ही इस्तेमाल किया था। आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठनों ने तो एचडी क्वालिटी के वीडियो बनाकर दुनिया भर के युवाओं का ब्रेनवॉश किया।

मनोवैज्ञानिक युद्ध अब ‘सूचना युद्ध’ (Information Warfare) का एक अहम हिस्सा बन चुका है। इसके तीन मुख्य स्तंभ हैं:

  1. साइबर युद्ध: दुश्मन के सिस्टम को हैक करना।
  2. इलेक्ट्रॉनिक युद्ध: संचार के साधनों को ठप करना।
  3. मनोवैज्ञानिक ऑपरेशन: जनता और सेना के दिमाग में शक का बीज बोना।

यह युद्ध कितना खतरनाक है?

एआई जनरेटेड ये जापानी फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं हैं। ये एक सोची-समझी रणनीति हैं। जब आप देखते हैं कि ‘खामेनेई वापस आ गए हैं’ या ‘इजरायल का पतन हो रहा है’, तो यह भावनाओं को भड़काने का काम करता है। युद्ध अब केवल बमों से नहीं जीता जाता, बल्कि इस बात से जीता जाता है कि दुनिया उसे देख किस नजरिए से रही है।

आतंकवाद भी इसी मनोविज्ञान पर टिका है। एक छोटा सा हमला करके उसका वीडियो वायरल करना पूरे देश में डर पैदा कर देता है। दुश्मन यही चाहता है।

आज के इस डिजिटल दौर में हमें यह समझने की जरूरत है कि हमारी स्क्रीन पर जो दिख रहा है, वह हमेशा सच नहीं होता। युद्ध के मैदान में गूंजने वाली मिसाइलों की आवाज से कहीं ज्यादा खतरनाक वह खामोश प्रोपेगेंडा है, जो हमारे फोन के जरिए हमारे दिमाग में घुस रहा है।

सावधान रहिए, क्योंकि अगली मिसाइल शायद आपके भरोसे पर गिरने वाली है।