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मज़दूर दिवस विशेष : इस्लाम में श्रम अधिकार क्या है?

-फ़िरदौस ख़ान

हर साल एक मई को मज़दूर दिवस मनाया जाता है, लेकिन आज भी ज़्यादातर मज़दूर ये नहीं जानते कि मज़दूर दिवस क्या है और क्यों मनाया जाता है. उनके लिए तो बस ये एक छुट्टी का दिन है. इस दिन वे नहा-धोकर घूमने निकलते हैं. कभी-कभार मज़दूरों के जलसों में भी शरीक हो जाते हैं, जहां मज़दूर नेता बड़ी-बड़ी बातें करते हैं. मज़दूरों के हक़ में की जाने वाली बातें सुनकर उनके मन में उम्मीद की एक किरन उग जाती है और वे सोचते हैं-
वो सुबह कभी तो आएगी
इन काली सदियों के सर से, जब रात का आंचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर झलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा, जब धरती नगमे गाएगी
वो सुबह कभी तो आएगी…

ये हक़ीक़त है कि किसी भी देश के विकास में मज़दूरों की सबसे बड़ी भूमिका है. ये मज़दूर ही हैं, जिनके ख़ून-पसीने से विकास की प्रतीक गगनचुंबी इमारतों की तामीर होती है. ये मज़दूर ही हैं, जो खेतों में काम करने से लेकर किसी आलीशान इमारत को चमकाने तक में अपना ख़ून-पसीना बहाते हैं. इस सबके बावजूद सरकार और प्रशासन से लेकर समाज तक इनके बारे में नहीं सोचता. बजट में भी सबसे ज़्यादा इन्हीं की अनदेखी की जाती है. सियासी दल भी चुनाव के वक़्त तो बड़े-बड़े वादे कर लेते हैं, लेकिन सत्ता में आते ही सब भूल जाते हैं. रोज़गार की कमी के कारण लोगों को अपने पुश्तैनी गांव छोड़कर दूर दराज़ के इलाक़ों में जाना पड़ता है. अपने परिजनों से दूर ये मज़दूर बेहद दयनीय हालत में जीने को मजबूर हैं, शायद इसीलिए कहा जाता है कि मजबूरी का दूसरा नाम ही मज़दूरी है.

इस्लाम में मज़दूरों का हक़

मज़दूरों से काम करवाकर उन्हें पूरे पैसे न देने के मामले भी सामने आते रहते हैं. इस्लाम में ज़ुल्म को हराम क़रार दिया गया है. किसी को उसका मेहनताना न देना भी ज़ुल्म ही है. इस्लाम में मज़दूरों के हक़ को लेकर कई हदीसें हैं.
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “आदमी के गुनाहगार होने के लिए यही काफ़ी है कि वह अपने मातहतों की रोज़ी रोक कर रखे.” (मुस्लिम)

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “मज़दूर की मज़दूरी उसका पसीना सूखने से पहले दे दो.” (इब्ने माजा)

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “मैं क़यामत के दिन उस शख़्स के मुक़ाबिल रहूंगा, जो मज़दूर से पूरा काम ले और उसकी मज़दूरी न दे.” (सही बुख़ारी)

प्रवासी मज़दूरों की हालत

उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड आदि राज्यों के लाखों लोग मध्य भारत के हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रों में रोज़गार की तलाश में आते हैं. इनमें से कुछ लोग यहां के छोटे-बड़े कारख़ानों में नौकरी कर लेते हैं, तो कुछ अपना कोई छोटा-मोटा धंधा शुरू कर देते हैं. कोई रिक्शा चलाता है, कोई फल-सब्ज़ी बेचता है, तो कोई मज़दूरी करने लगता है. इन सभी का बस एक ही मक़सद होता है कि कुछ पैसे कमाकर अपने घर को भेज दिए जाएं. पुरानी दिल्ली के सदर बाज़ार और फ़राशख़ाना में काम करने वाले बाहरी मज़दूरों की भी कमोबेश यही हालत है.

बाबू नाम के एक रिक्शेवाला ने बताया कि उनके पास रिक्शे के अलावा बस दो जोड़ी कपड़े हैं, एक वह पहने हुए हैं और दूसरे को रिक्शे की सीट के नीचे रख देते हैं. वह रिक्शे पर ही सोते हैं. वे नहाने के लिए सार्वजनिक स्नानघर का इस्तेमाल करते हैं. वे बताते हैं कि दिल्ली में ऐसे हज़ारों मज़दूर हैं, जो सड़कों पर ही रहते हैं, जहां भी जगह मिल जाती है, बस वहीं सो जाते हैं. वे बताते हैं कि कार या किसी अन्य वाहन से दुर्घटना होने की हालत में उन्हें ही क़ुसूरवार ठहराया जाता है, क्योंकि गाड़ी वाले बाबू के ख़िलाफ़ बोलने की किसी की हिम्मत नहीं होती. सर्दियों में रैन बसेरों का आसरा होता है. मगर कई बार वहां भी इतनी भीड़ हो जाती है कि जगह ही नहीं मिल पाती. ऐसे में वे किसी पुल के नीचे ही आश्रय तलाशते हैं. गर्मियों की दोपहरी किसी पेड़ की छाया में कट जाती है. इसी तरह वे बरसात में भी कहीं न कहीं सर छुपाने की जगह तलाश ही लेते हैं.

हरियाणा के हिसार शहर की एक फ़ैक्ट्री में काम कर रहे उत्तर प्रदेश के बरेली के निवासी तस्लीमुद्‌दीन कहते हैं कि फ़ैक्ट्री में दिनभर मेहनत करने के बावजूद उन्हें छह हज़ार रुपये ही मिल पाते हैं. इसलिए वे ओवर टाइम करते हैं. वे अपने तीन साथियों के साथ एक छोटे से कमरे में रहते हैं. दूसरे मज़दूरों की भी यही हालत हैं. गर्मियों के दिनों में उन्हें सड़क पर सोना पड़ता है. फ़ैक्ट्रियों में नियुक्तियां ठेकेदारों के ज़रिये होती हैं, इसलिए उन्हें कोई सुविधा नहीं दी जाती. इतना ही नहीं, उनकी नौकरी भी ठेकेदार की मर्ज़ी पर ही निर्भर करती है, वह जब चाहे उन्हें निकाल सकता है. अकसर फ़ैक्ट्रियों में छंटनी भी होती रहती है. जब काम कम होता है, तो मज़दूरों को नौकरी से निकाल दिया जाता है. ऐसी हालत में उनके सामने एक बार फिर से रोज़ी-रोटी का संकट पैदा हो जाता है.

इसी तरह बिहार के छपरा के निवासी हरिया पिछले 25 सालों से हिसार में सब्ज़ी बेच रहे हैं. वे कहते हैं कि वे छठ पूजा और फ़सल के कटने के दिनों में अपने गांव जाते हैं. वे कहते हैं कि कोई भी ख़ुशी से अपना गांव नहीं छोड़ना चाहता. रोज़गार की कमी ही उन्हें पलायन के लिए मजबूर करती है. वे भी अपने तीन साथियों के साथ एक छोटे से कमरे में रहते हैं. इसी कमरे में उन्हें सब्ज़ियां भी रखनी होती हैं. इसलिए कई बार उन्हें बाहर गली में ही सोना पड़ता है.

बिजनौर निवासी महमूद का कहना है कि वे पिछले 30 सालों से हिसार में मज़दूरी कर रहे हैं. सर्दी के मौसम में वे रजाई-गद्दों में धागे डालने का काम करते हैं. जब सीज़न चला जाता है, तो वे मज़दूरी करते हैं. वे बताते हैं कि बाहरी लोगों की बहुत बुरी हालत है. कुछ साल पहले एक हादसे में बिहार के एक मज़दूर की मौत हो गई थी. बहुत मुश्किल से उसके घरवालों का पता लगाकर उन्हें इसकी सूचना भेजी गई. इस दौरान स्थानीय लोगों की मदद से उसे दफ़नाया गया. आख़िरी वक़्त में उसके परिवार का एक भी सदस्य उसके पास मौजूद नहीं था. ये सब सोचकर मन करता है कि वापस अपने गांव लौट जाएं, लेकिन जब रोज़गार की बात आती है, तो यहीं रहना ही बेहतर लगता है. आख़िर बच्चों की भी तो परवरिश करनी है.

क़ाबिले-गौर है कि देश में हर साल काम के दौरान हज़ारों मज़दूरों की मौत हो जाती है. सरकारी, अर्ध सरकारी या इसी तरह के अन्य संस्थानों में काम करते समय दुर्घटनाग्रस्त हुए लोगों या उनके आश्रितों को देर सवेर कुछ न कुछ मुआवज़ा तो मिल ही जाता है, लेकिन सबसे दयनीय हालत है दिहाड़ी मज़दूरों की. पहले तो इन्हें काम ही मुश्किल से मिलता है और अगर मिलता भी है तो काफ़ी कम दिन. अगर काम के दौरान मज़दूर दुर्घटनाग्रस्त हो जाएं, तो उन्हें मुआवज़ा भी नहीं मिल पाता. देश में कितने ही ऐसे परिवार हैं, जिनके कमाऊ सदस्य दुर्घटनाग्रस्त होकर विकलांग हो गए हैं या फिर मौत का शिकार हो चुके हैं, लेकिन अब कोई भी उनकी सुध लेने वाला नहीं है.

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनियाभर में कार्य संबंधी हादसों और बीमारियों से हर साल तक़रीबन 22 लाख मज़दूर मारे जाते हैं. इनमें क़रीब 40 हज़ार से ज़्यादा मौतें अकेले भारत में होती हैं, लेकिन भारत की रिपोर्ट में ये आंकड़ा सालाना सिर्फ़ 222 मौतों का ही है. संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दुनिया में हर साल हादसों और बीमारियों से मरने वालों की तादाद 22 लाख से ज़्यादा हो सकती है, क्योंकि बहुत से विकासशील देशें में सतही अध्ययन के कारण इसका सही-सही अंदाज़ा नहीं लग पाता. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के महानिदेशक के मुताबिक़ कार्य स्थलों पर समुचित सुरक्षा प्रबंधों के लक्ष्य से हम काफ़ी दूर हैं. आज भी हर दिन कार्य संबंधी हादसों और बीमारियों से दुनियाभर में पांच हज़ार महिला-पुरुष मारे जाते हैं. औद्योगिक देशों ख़ासकर एशियाई देशों में यह संख्या ज़्यादा है. रिपोर्ट में अच्छे और सुरक्षित काम की सलाह के साथ-साथ यह भी जानकारी दी गई है कि विकासशील देशों में कार्य स्थलों पर संक्रामक बीमारियों के अलावा मलेरिया और कैंसर जैसी बीमारियां जानलेवा साबित हो रही हैं. अमूमन कार्य स्थलों पर प्राथमिक चिकित्सा, पीने के पानी और शौचालय जैसी सुविधाओं का घोर अभाव होता है, जिसका मज़दूरों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है.

हमारे कार्य स्थल कितने सुरक्षित हैं, यह बताने की ज़रूरत नहीं है. ऊंची इमारतों पर चढ़कर काम कर रहे मज़दूरों को सुरक्षा बैल्ट तक मुहैया नहीं कराई जाती. पटाख़ा फ़ैक्ट्रियों, रसायन के कारख़ानों और जहाज़ तोड़ने जैसे कामों में लगे मज़दूर सुरक्षा साधनों की कमी के कारण हुए हादसों में अपनी जान गंवा बैठते हैं. पटाख़ा फ़ैक्ट्रियों और भवन निर्माण के दौरान मज़दूरों के मरने की ख़बरें आए दिन अख़बारों में छपती रहती हैं. इस सबके बावजूद मज़दूरों की सुरक्षा पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता. मामला मीडिया ने उछाल दिया, तो प्रशासन और राजनेताओं की नींद टूट ज़रूर जाती है, लेकिन कुछ वक़्त बाद फिर वही ‘ढाक के तीन पात‘ वाली व्यवस्था बदस्तूर जारी रहती है.

दरअसल, देशी मंडी में भारी मात्रा में उपलब्ध सस्ता श्रम विदेशी निवेशकों को भारतीय बाज़ार में पैसा लगाने के लिए आकर्षित करता है. साथ ही श्रम क़ानूनों के लचीलेपन के कारण भी वे मज़दूरों का शोषण करके ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा बटोरना चाहते हैं. अर्थशास्त्री रिकार्डो के मुताबिक़ मज़दूरी और उनको दी जाने वाली सुविधाएं बढ़ती हैं, तो उद्योगपतियों को मिलने वाले फ़ायदे का हिस्सा कम होगा.

हालांकि सरकार ने मज़दूरों के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएं बनाई हैं, लेकिन उनका फ़ायदा मज़दूरों तक नहीं पहुंच पाता. बहरहाल, मज़दूरों का संघर्ष जारी है. उन्हें उम्मीद है कि कभी तो उनके भी हालात बदलेंगे. आख़िर उम्मीद पर ही तो दुनिया क़ायम है.
(लेखिका शायरा, पत्रकार और कहानीकार हैं)