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बाराबंकी में अदबी महफिल: ‘बज़्म-ए-अज़ीज़’ की ईद मिलन गोष्ठी में गूँजे संजीदा अशआर

अबू शाहमा अंसारी,बाराबंकी (उत्तर प्रदेश):

गंगा-जमुनी तहजीब के केंद्र बाराबंकी में अदब और मोहब्बत की रवायत को बरकरार रखते हुए ‘बज़्म-ए-अज़ीज़’ की वार्षिक गैर-तरही ‘ईद मिलन’ काव्य गोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। उस्ताद शायर अलहाज नसीर अंसारी के नबीगंज स्थित आवास पर आयोजित इस महफिल में जनपद और आसपास के दिग्गज रचनाकारों ने अपनी शायरी से समां बांध दिया।

वरिष्ठ रचनाकारों की मौजूदगी

इस विशेष काव्य संध्या की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार एस.एम. हैद़र ने की, जबकि मंच का सफल संचालन हुज़ैल लालपुरी ने अपनी चिर-परिचित अंदाज़ में किया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में अख्तर जमाल उस्मानी और मुख्तार फारूकी ने शिरकत कर महफिल की रौनक बढ़ाई।

चुनिंदा कलाम: हकीकत और जज्बात का संगम

नसीर अंसारी ने जब अपना यह शेर पढ़ा, तो महफिल वाह-वाह से गूँज उठी:

“बस इक चिराग-ए-हक है जो अब तक बुझा नहीं, बातिल के जाने कितने जले और बुझे चिराग।”

वहीं मुख्तार फारूकी ने दुनिया के हालात पर तंज कसते हुए कहा:

“अब अकलमंद कोई न फरजाना चाहिए, दुनिया को ठीक करने को दीवाना चाहिए।”

सामाजिक सरोकारों और मानवीय संवेदनाओं को स्वर देते हुए कैफी रदौलवी ने आगाह किया:

“सदा मजलूम की आहों से बचिए, वो कुछ कहते नहीं अपनी जुबां से।”

न्याय व्यवस्था की विडंबना पर उबैद आज़मी का शेर काफी सराहा गया:

“अब तो होते हैं अदालत में वही लोग बरी, जो सजा पाने के हकदार हुआ करते हैं।”

महफिल में ज़मीर फैजी, हुज़ैल अहमद, सगीर नूरी, बशर मौलवी, अज़ीम मशाइखी, मास्टर इरफान बाराबंकवी, तुफैल जैदपुरी, नफीस बाराबंकवी, हैद़र मसौली, सहर अय्यूबी, तालिब आलापुरी और मुजीब रदौलवी ने भी अपने बेहतरीन कलाम पेश किए।

अगली नशिस्त का ऐलान

कार्यक्रम के अंत में बज़्म-ए-अज़ीज़ के जनरल सेक्रेटरी हुज़ैल अहमद हुज़ैल ने आए हुए सभी शायरों और श्रोताओं का आभार व्यक्त किया। उन्होंने घोषणा की कि बज़्म की अगली मासिक गोष्ठी आगामी 12 अप्रैल 2026 को आयोजित की जाएगी।

अगली गोष्ठी के लिए ‘मिसरा-ए-तरह’ (विषय): “हमसे पूछिए कैसे जिंदगी गुजारी है” (काफिया: गुजारी, रदीफ: है)

इस सफल आयोजन में अमीर हमजा आज़मी, लतीफ बाराबंकवी, सबा जहांगीर आबादी और हाफिज मोहम्मद यूसुफ सहित कई गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।