अली खामेनेई के जनाजे पर मौलाना रजानी का विवादित बयान, तीखी आलोचना
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
इस्लाम धर्म का मूल सिद्धांत हमेशा से इंसानियत और सम्मान की बात करता है। इसमें किसी भी मृतक की बुराई करना या किसी भी मजहब के मानने वालों की आस्था को ठेस पहुंचाना पूरी तरह मना है। मगर खुद को शिया स्कॉलर बताने वाले मौलाना हसन अली रजानी इन बुनियादी बातों को पूरी तरह भुला बैठे हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर रहे आयतल्लाह अली खामेनेई के जनाजे और उनकी मौत पर शोक मनाने वाले करोड़ों लोगों की भावनाओं का मौलाना ने खुलकर मजाक उड़ाया है। उनका यह रवैया ठीक वैसा ही है जैसा कुछ समय पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दिखाया था। ट्रंप ने भी खामेनेई के शोक समारोह में उमड़ी भारी भीड़ को फेक और दिखावा कहा था।
ईरान में लगभग एक सप्ताह तक चले आयतल्लाह अली खामेनेई के इस अंतिम विदाई समारोह में अभूतपूर्व जनसैलाब उमड़ा था। आंकड़ों के मुताबिक इस ऐतिहासिक शोक सभा में ईरान और दुनिया भर से तकरीबन ढाई करोड़ लोग जमा हुए थे। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने भी इसे दुनिया के सबसे बड़े ऐतिहासिक शोक समारोह के रूप में दर्ज किया है। इस भावुक विदाई में भारत समेत दुनिया के 70 से ज्यादा देशों के आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल शामिल हुए थे। इतने बड़े वैश्विक स्तर के जुड़ाव और ऐतिहासिक तथ्यों के बावजूद मौलाना हसन अली रजानी का यह दावा कि यह सब महज एक सरकारी ड्रामा था, उनकी अपनी सोच और मंशा पर बड़े सवाल खड़े करता है।
मौलाना हसन अली रजानी ने एक बेतुका बयान जारी कर कहा कि ईरान के बाहर दुनिया के किसी भी शिया समुदाय में इस जनाजे को लेकर कोई भावना या उत्साह नहीं था। उन्होंने कहा कि यह पूरी औपचारिकता केवल ईरान के सरकारी तंत्र के दबाव में निभाई जा रही है। रजानी ने अपनी बात को तर्कहीन बनाते हुए यह भी कह दिया कि ईरान के लोगों का मानना है कि सिर्फ रोज रोने धोने से वे जन्नत में चले जाएंगे। उन्होंने मुसलमानों की पांच वक्त की पवित्र नमाज की तुलना ईरानियों के रोने धोने से कर दी। मौलाना का यह बयान न केवल करोड़ों शिया और मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आहत करता है बल्कि उनके भीतर की गहरी राजनीतिक और वैचारिक नफरत को भी सरेआम उजागर करता है।
अपने इस अजीबोगरीब बयान में मौलाना रजानी ने ईरान के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को भी निशाने पर लिया। उन्होंने दावा किया कि ईरान में बनने वाले गानों और वहां के सिनेमाघरों में हमेशा से एक बनावटी रोना धोना ही दिखाया जाता रहा है। उन्होंने अपने बचपन का एक किस्सा सुनाते हुए कहा कि जब वे ईरान में हिंदी फिल्में देखने जाते थे तो अमिताभ बच्चन और श्रीदेवी की फिल्मों में ईरानी दर्शक खूब रोया करते थे। उन्होंने यह भी कहा कि जब फिल्म कुली की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन घायल हुए थे तब ईरान में जमकर दुख मनाया गया था। रजानी ने इन बातों का सहारा लेकर ईरानियों के आंसुओं को मगरमच्छ के आंसू करार दिया। मौलाना की यह दलील बेहद बचकानी और तर्कों से परे नजर आती है क्योंकि किसी देश के सिनेमाई लगाव को उसके राष्ट्रीय और धार्मिक शोक से जोड़ना पूरी तरह अनुचित है।
धार्मिक जानकारों और बुद्धिजीवियों ने मौलाना हसन अली रजानी के इस बयान की बेहद तीखी आलोचना की है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब भारत सहित 70 देशों का नेतृत्व इस दुख की घड़ी में शामिल हुआ तो इसे सिर्फ एक देश का आंतरिक मामला बताना तथ्यों को तोड़ना मरोड़ना है। रजानी का यह कहना कि ईरान के बाहर कोई भी शिया सज्जन इस घटना से इमोशनल नहीं है, पूरी तरह गलत और भ्रामक है। उनका यह बयान इस्लाम के उसूलों के खिलाफ तो है ही, साथ ही यह एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय शोक पर बेहद घटिया और गैर जिम्मेदार राजनीतिक टिप्पणी भी है। मौलाना के इस विवादित बयान के बाद सोशल मीडिया और इस्लामिक हलकों में उनके खिलाफ लगातार नाराजगी देखी जा रही है।

