News

मस्जिदें, खानकाहें और इमामबारगाहें समाज सुधार और मार्गदर्शन का केंद्र बनें: मीरवाइज

श्रीनगर।

मीरवाइज उमर फारूक ने कहा है कि मस्जिदों, खानकाहों और इमामबारों को केवल इबादत की जगह तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें समाज सुधार, शिक्षा और मार्गदर्शन के मजबूत केंद्र के रूप में भी काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज समाज जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है, उनमें धार्मिक संस्थानों की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

श्रीनगर में आयोजित एक धार्मिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए मीरवाइज उमर फारूक ने कहा कि इस्लामी इतिहास में मस्जिदें और धार्मिक संस्थान हमेशा समाज को दिशा देने का माध्यम रहे हैं। इन स्थानों ने केवल धार्मिक भूमिका नहीं निभाई बल्कि लोगों को शिक्षा, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश भी दिया।

उन्होंने कहा कि समाज में तेजी से बढ़ती भौतिकता, पारिवारिक तनाव और नैतिक गिरावट चिंता का विषय है। ऐसे माहौल में धार्मिक संस्थानों को आगे आकर युवाओं का मार्गदर्शन करना होगा। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को सही दिशा देना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

मीरवाइज ने कहा कि मस्जिदों और खानकाहों को ऐसे मंच के रूप में विकसित किया जाना चाहिए जहां लोगों को केवल धार्मिक शिक्षा ही नहीं बल्कि सामाजिक जागरूकता भी मिले। उन्होंने कहा कि युवाओं को नशे, हिंसा और सामाजिक बुराइयों से बचाने में धार्मिक संस्थान अहम भूमिका निभा सकते हैं।

उन्होंने कहा कि समाज में फैल रही निराशा और असुरक्षा को दूर करने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। धार्मिक संस्थान लोगों के बीच आपसी विश्वास और नैतिक मूल्यों को मजबूत कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि समाज को जोड़ने और सकारात्मक सोच को बढ़ावा देने में इन संस्थानों की बड़ी भूमिका है।

अपने संबोधन में मीरवाइज ने पैगंबर मोहम्मद की शिक्षाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पैगंबर की जिंदगी इंसानियत, न्याय, करुणा और नैतिकता का सबसे बड़ा उदाहरण है। उनकी शिक्षाओं को केवल भाषणों और आयोजनों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए बल्कि उन्हें रोजमर्रा की जिंदगी में अपनाना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि इस्लाम हमेशा संतुलन, भाईचारे और इंसाफ का संदेश देता है। समाज में बढ़ती सामाजिक और नैतिक चुनौतियों का समाधान भी इन्हीं मूल्यों में मौजूद है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अपने परिवार और समाज में अच्छे व्यवहार और नैतिकता को बढ़ावा दें।

मीरवाइज उमर फारूक ने कहा कि धार्मिक स्थलों को समाज की समस्याओं पर चर्चा और समाधान का माध्यम भी बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि बेरोजगारी, शिक्षा, परिवारों में बढ़ती दूरी और युवाओं की परेशानियों जैसे मुद्दों पर सामूहिक सोच की जरूरत है। मस्जिदें और धार्मिक संस्थान इस दिशा में जागरूकता फैलाने का काम कर सकते हैं।

सम्मेलन में मौजूद लोगों ने भी इस बात पर जोर दिया कि धार्मिक संस्थानों की सामाजिक भूमिका को और मजबूत किया जाना चाहिए। वक्ताओं ने कहा कि कश्मीर की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा हमेशा सामाजिक एकता और इंसानियत के मूल्यों पर आधारित रही है।

मीरवाइज ने अपने संदेश के अंत में कहा कि समाज में सकारात्मक बदलाव केवल सरकारों या संस्थाओं के भरोसे नहीं लाया जा सकता। इसके लिए हर व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। उन्होंने कहा कि जब धार्मिक संस्थान और समाज मिलकर काम करेंगे तभी स्वस्थ और मजबूत सामाजिक माहौल तैयार हो सकेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *