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‘पद्मावत’ केवल रोमांस नहीं, 16वीं शताब्दी का सूफी प्रेम दर्शन है: प्रो. अग्रवाल

मुस्लिम नाउ, हैदराबाद

हैदराबाद स्थित मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (MANUU) में हाल ही में आयोजित “उर्दू, हिंदी, अरबी और फारसी – भाषाई, साहित्यिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक आदान-प्रदान से सभ्यतागत सामंजस्य” विषयक दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय शैक्षणिक सम्मेलन ने विद्वानों और शोधकर्ताओं को एक साझा मंच पर लाकर ज्ञान और अनुभवों के आदान-प्रदान का अवसर प्रदान किया। यह आयोजन विश्वविद्यालय के इतिहास में विशेष महत्व रखता है क्योंकि इस सम्मेलन में चार प्रमुख भाषाओं के विद्वान और विशेषज्ञ पहली बार एकत्रित हुए।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता MANUU के कुलपति प्रो. सैयद ऐनुल हसन ने की, जबकि प्रमुख भाषण जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया, लॉस एंजिल्स (UCLA) के प्रो. नाइल ग्रीन ने दिया। रजिस्ट्रार प्रो. इश्तिआक अहमद ने स्वागत भाषण में सम्मेलन के उद्देश्य और महत्व पर प्रकाश डाला। इसके बाद कार्यक्रम के संयोजक प्रो. सैयद इम्तियाज हसनैन और निदेशक प्रो. अलीम अशरफ जायसी ने सम्मेलन की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की।

‘पद्मावत’ में सूफी और आध्यात्मिक प्रेम का दर्शन

प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपने मुख्य भाषण का शीर्षक रखा, “पद्मावत: प्रारंभिक आधुनिक भारत के अस्तित्वगत ब्रह्मांड की एक झलक”। उन्होंने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा 1540 में अवधी में लिखा गया महाकाव्य ‘पद्मावत’ केवल एक ऐतिहासिक प्रेम कहानी या रोमांस नहीं है। यह 16वीं शताब्दी का एक गहरा सूफी और आध्यात्मिक प्रेम दर्शन प्रस्तुत करता है।

प्रो. अग्रवाल ने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी के लिए राम और अल्लाह के नाम केवल युद्ध और वैमनस्य के प्रतीक बन गए हैं, जबकि ‘पद्मावत’ जैसी कृतियाँ हिंदू और इस्लामी रहस्यवाद को मिलाकर प्रेम और आध्यात्मिक एकता का संदेश देती हैं। उनका मानना है कि ‘पद्मावत’ काल्पनिक प्रेम से वास्तविक, ईश्वरीय प्रेम तक की आत्मा की यात्रा का प्रतीकात्मक चित्रण है। यह ग्रंथ वहदत-उल-वजूद के सिद्धांत में विश्वास रखता है, अर्थात् यह मानता है कि ईश्वर की उपस्थिति हर चीज़ में विद्यमान है और प्रेम ही मानव आत्मा के मोक्ष का मार्ग है।

प्रो. अग्रवाल ने यह भी बताया कि ‘पद्मावत’ में प्रेम का स्वरूप केवल व्यक्तिगत आकर्षण नहीं, बल्कि आध्यात्मिक गहराई और ईश्वर से आत्मिक जुड़ाव का प्रतीक है। इस दृष्टिकोण से महाकाव्य आधुनिक समय में भी लोगों के लिए एक जीवन-दर्शन प्रस्तुत करता है, जो सांप्रदायिक सीमाओं से परे प्रेम और मानवता की सार्वभौमिकता को रेखांकित करता है।

प्रो. नाइल ग्रीन का दृष्टिकोण: संस्कृति और धर्म का अंतर

UCLA के प्रो. नाइल ग्रीन ने अपने ऑनलाइन भाषण में “एक अनुष्ठान का प्रवासन: अनातोलिया और दक्कन के बीच संतों का विवाह” विषय पर रोचक और ज्ञानवर्धक विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘विश्वास’ और ‘इस्लामी संस्कृति’ में मूलभूत अंतर है। जबकि विश्वास सीधे धर्म और रीति-रिवाज से जुड़ा है, संस्कृति वह विस्तृत परिप्रेक्ष्य है जिसमें मुस्लिम शासकों, व्यापारियों, सूफियों और बुद्धिजीवियों का योगदान शामिल होता है।

प्रो. ग्रीन ने सूफी मठों (खानकाह) को केवल आध्यात्मिक केंद्र नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक केंद्र के रूप में भी प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि सूफी संत जमीन से जुड़े विवादों का समाधान करते थे और कई बड़े शहर दरगाहों के आसपास विकसित हुए। उनके अनुसार, सूफीवाद भारतीय सभ्यता में गंगा-जमुनी सांस्कृतिक मिश्रण का प्रमुख वाहक रहा है।

निष्कर्ष और समापन

कुलपति प्रो. सैयद ऐनुल हसन ने उद्घाटन सत्र में दोनों प्रमुख वक्ताओं की सराहना करते हुए कहा कि सूफीवाद ने हमेशा दिल की भाषा और मानवता के मूल्य को प्राथमिकता दी है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह सम्मेलन प्रतिभागियों और शोधकर्ताओं के लिए एक प्रभावी मंच साबित होगा, जो ज्ञान और सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देगा। डीन प्रो. गुलफिशाँ हबीब ने धन्यवाद ज्ञापन किया और प्रो. मोहम्मद अब्दुल समी सिद्दीकी ने उद्घाटन सत्र का सफल संचालन किया।

यह ज्ञानवर्धक दो दिवसीय सम्मेलन 14 नवंबर को जौनकोपिंग यूनिवर्सिटी, स्वीडन की प्रो. संगीता बग्गा-गुप्ता के समापन भाषण के साथ संपन्न होगा, जिसका विषय है: “भाषा विज्ञान में मानवतावाद को वापस लाने की आवश्यकता: सभ्यतागत सामंजस्य पर विचार”। इस सम्मेलन ने न केवल भाषाई और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया, बल्कि 16वीं शताब्दी के सूफी दर्शन और प्रेम के बहुआयामी अर्थों पर भी नई रोशनी डाली।