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भाग-2 : कलम, क्रांति और कुर्बानी से लड़ी मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों ने जंग

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नौशाद अख्तर

भारत की आजादी की कहानी केवल कुछ बड़े नेताओं, आंदोलनों और ऐतिहासिक घटनाओं की कहानी नहीं है। इसके पीछे उन हजारों लोगों का संघर्ष भी है, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अलग-अलग मोर्चों पर आवाज उठाई। किसी ने हथियार उठाए, किसी ने अखबार को अपना हथियार बनाया, किसी ने जेल की यातनाएं सहीं और किसी ने शिक्षा तथा सामाजिक सुधार के जरिए देश में बदलाव की नींव रखी।

मुस्लिम समाज से आने वाले ऐसे अनेक स्वतंत्रता सेनानी भी इस संघर्ष का अहम हिस्सा रहे। 1857 के विद्रोह से लेकर असहयोग आंदोलन, खिलाफत आंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियों और आजादी की अंतिम लड़ाई तक उनका योगदान अलग-अलग रूपों में सामने आता है।

आजादी के 80वें वर्ष के मौके पर इस इतिहास को याद करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि भारत की स्वतंत्रता किसी एक समुदाय की उपलब्धि नहीं थी। यह उन तमाम भारतीयों के सामूहिक संघर्ष का परिणाम थी, जिन्होंने विदेशी शासन से मुक्ति के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी।

हसरत मोहानी और ‘इंकलाब जिंदाबाद’

हसरत मोहानी का नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और उर्दू साहित्य दोनों में महत्वपूर्ण है। वह शायर, पत्रकार और राजनीतिक कार्यकर्ता थे।

उन्होंने अपनी लेखनी के जरिए ब्रिटिश शासन की नीतियों का विरोध किया। उनके विचारों में राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक न्याय की भावना भी दिखाई देती थी।

‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा भी उनके नाम से जोड़ा जाता है। उनकी राजनीतिक सक्रियता के कारण उन्हें ब्रिटिश सरकार की कार्रवाई और जेल का सामना करना पड़ा।

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1857 से आजादी तक मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों की गौरवगाथा

हसरत मोहानी इस बात की मिसाल हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन में बंदूक और तलवार के साथ-साथ कलम की भी अपनी ताकत थी।

अशफाक उल्ला खान और काकोरी कांड

क्रांतिकारी आंदोलन में अशफाक उल्ला खान का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। वह हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े थे और राम प्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों के साथी थे।

1925 के काकोरी कांड ने ब्रिटिश सरकार को हिला दिया। क्रांतिकारियों ने सरकारी खजाना ले जा रही ट्रेन को निशाना बनाया। इसके बाद बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं।

अशफाक उल्ला खान भी गिरफ्तार किए गए। मुकदमे के बाद उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई और उन्होंने देश की आजादी के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया।

राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खान की दोस्ती आज भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सांप्रदायिक एकता की शक्तिशाली मिसाल मानी जाती है।

मौलाना आजाद ने पत्रकारिता को बनाया हथियार

मौलाना अबुल कलाम आजाद स्वतंत्रता आंदोलन के उन नेताओं में थे, जिन्होंने विचार और पत्रकारिता को संघर्ष का माध्यम बनाया।

उन्होंने ‘अल हिलाल’ अखबार निकाला। इसके जरिए उन्होंने ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना की और भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना जगाने का प्रयास किया। अंग्रेजी सरकार ने उनके प्रकाशन पर कार्रवाई की और उन्हें जेल भी जाना पड़ा।

आजाद हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे। वह भारत के विभाजन के विरोधी थे और एक साझा भारतीय राष्ट्रवाद की वकालत करते रहे।

आजादी के बाद उन्होंने देश के पहले शिक्षा मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली। शिक्षा, उच्च शिक्षा और संस्थागत निर्माण के क्षेत्र में उनकी भूमिका भारतीय राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण अध्याय बनी।

डॉ. जाकिर हुसैन ने शिक्षा को चुना रास्ता

डॉ. जाकिर हुसैन ने स्वतंत्रता संघर्ष में अलग तरह से योगदान दिया। उनका मानना था कि मजबूत राष्ट्र का निर्माण मजबूत शिक्षा व्यवस्था के बिना संभव नहीं है।

असहयोग आंदोलन के दौर में उन्होंने ब्रिटिश प्रभाव वाली शिक्षा व्यवस्था से अलग रास्ता अपनाया और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के विकास से जुड़े। उन्होंने शिक्षा को आत्मनिर्भरता, चरित्र निर्माण और राष्ट्रीय चेतना का माध्यम माना।

आजादी के बाद वह भारत के राष्ट्रपति बने। उनका जीवन बताता है कि स्वतंत्रता की लड़ाई केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं थी। देश के सामाजिक और शैक्षणिक भविष्य को मजबूत करना भी उस संघर्ष का हिस्सा था।

खान अब्दुल गफ्फार खान और अहिंसक संघर्ष

खान अब्दुल गफ्फार खान, जिन्हें सीमांत गांधी के नाम से भी जाना जाता है, ब्रिटिश शासन के खिलाफ अहिंसक आंदोलन के बड़े नेता थे।

उन्होंने खुदाई खिदमतगार आंदोलन के जरिए लोगों को संगठित किया। उनका संघर्ष इस बात का उदाहरण था कि अंग्रेजी शासन का विरोध केवल सशस्त्र क्रांति से नहीं, बल्कि अहिंसक जन आंदोलन के जरिए भी किया जा सकता है।

गफ्फार खान हिंदू-मुस्लिम एकता के समर्थक थे और भारत के विभाजन का विरोध करते रहे। उनका राजनीतिक जीवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की उस धारा को सामने लाता है जिसमें धर्म से ऊपर साझा राष्ट्रवाद को महत्व दिया गया।

पत्रकारिता भी बनी प्रतिरोध का माध्यम

स्वतंत्रता आंदोलन में मुस्लिम पत्रकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1857 के दौर में मौलवी मुहम्मद बाकिर ने अपने अखबार के माध्यम से अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाई।

उनकी पत्रकारिता ने ब्रिटिश सरकार की नाराजगी मोल ली। अंततः उन्हें गिरफ्तार कर फांसी दे दी गई।

यह घटना बताती है कि उस दौर में पत्रकारिता केवल खबर पहुंचाने का माध्यम नहीं थी। अखबार विचारों, प्रतिरोध और जनजागरण के महत्वपूर्ण साधन बन चुके थे।

इतिहास में दर्ज हैं कई और नाम

मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों की सूची कुछ प्रसिद्ध नामों तक सीमित नहीं है। मौलाना महमूद अल हसन, मौलाना मजहरुल हक, मगफूर अहमद अजाजी, आसफ अली, अब्बास अली, मुजफ्फर अहमद, वक्कम मजीद और मोहम्मद अब्दुर रहमान जैसे कई लोगों ने अलग-अलग क्षेत्रों में स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूती दी।

मौलाना मजहरुल हक ने असहयोग आंदोलन, खिलाफत आंदोलन और चंपारण सत्याग्रह में भाग लिया। उन्होंने सामाजिक और शैक्षणिक कार्यों को भी अपने सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनाया।

इन नामों की खासियत यही है कि उन्होंने आजादी की लड़ाई को केवल राजनीतिक सत्ता हासिल करने का अभियान नहीं माना। उनके लिए यह सामाजिक बदलाव, शिक्षा, एकता और सम्मान की लड़ाई भी थी।

विभाजन के विरोध में भी उठी आवाज

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि कई मुस्लिम नेताओं ने धर्म के आधार पर देश के विभाजन का विरोध किया।

खान अब्दुल गफ्फार खान सहित कई नेताओं और संगठनों ने दो राष्ट्र सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया। ऑल इंडिया आजाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस भी विभाजन के विरोध की राजनीति से जुड़ी रही।

देवबंद के उलेमा के एक वर्ग ने भी संयुक्त भारत की अवधारणा का समर्थन किया। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक विचार एक जैसे नहीं थे। उनके बीच भी राष्ट्र, धर्म, राजनीति और भविष्य के भारत को लेकर अलग-अलग विचार मौजूद थे।

आजादी की कहानी को पूरा पढ़ने की जरूरत

भारत की स्वतंत्रता की कहानी को समझने के लिए केवल प्रसिद्ध नेताओं के नाम याद करना पर्याप्त नहीं है। इस कहानी में वे लोग भी शामिल हैं जिनकी भूमिका स्थानीय स्तर पर रही, जिन्होंने जेल यात्राएं कीं, जिनकी संपत्ति आंदोलन में लगी और जिन्होंने अपने परिवार तथा व्यक्तिगत जीवन की कीमत पर देश की आजादी को प्राथमिकता दी।

मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान इसी व्यापक भारतीय इतिहास का हिस्सा है।

किसी ने 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ बंदूक उठाई। किसी ने लखनऊ में प्रतिरोध का नेतृत्व किया। किसी ने अखबार के जरिए ब्रिटिश शासन को चुनौती दी। किसी ने काकोरी के बाद फांसी का फंदा स्वीकार किया। किसी ने महिलाओं को आंदोलन से जोड़ा और किसी ने शिक्षा के जरिए स्वतंत्र भारत की नींव मजबूत करने का प्रयास किया।

यही विविधता भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की असली ताकत थी।

आजादी की 80वीं वर्षगांठ पर इन नामों को याद करना केवल अतीत को दोहराना नहीं है। यह उस साझा संघर्ष को समझना है, जिसमें भारत की आजादी के लिए हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और अलग-अलग क्षेत्रों तथा समुदायों के लोगों ने अपनी-अपनी भूमिका निभाई।

भारत की आजादी की कहानी जितनी व्यापकता से कही जाएगी, आने वाली पीढ़ियां उतनी ही बेहतर तरीके से समझ पाएंगी कि यह स्वतंत्रता किसी एक व्यक्ति, संगठन या समुदाय की देन नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के संघर्ष, त्याग और सपनों का परिणाम थी।

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