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मुस्लिम वोटों की सफाई की तैयारी? ओवैसी ने कहा– यह सिर्फ वोटर लिस्ट नहीं, साजिश की स्क्रिप्ट है

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, पटना/हैदराबाद

बिहार की राजनीति गरमाई हुई है। बिगड़ती कानून व्यवस्था, नीतीश कुमार की कमजोर होती स्थिति और हिंदुत्व एजेंडे की असफलता के बीच राजद नेता तेजस्वी यादव के पक्ष में युवाओं का बढ़ता जनसैलाब भाजपा को बेचैन कर रहा है। सत्ता में वापसी की संभावनाओं को सुरक्षित करने के लिए भाजपा अब नए-नए प्रयोगों में जुट गई है।

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जहां एक ओर केंद्र सरकार पीएम मोदी और अमित शाह के ज़रिए लगातार बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स की घोषणा कर रही है, वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग की आड़ में एक नया पैंतरा सामने आ रहा है — मतदाता सूची के नाम पर गुपचुप एनआरसी लागू करने का आरोप।

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सीधे तौर पर चुनाव आयोग पर आरोप लगाया है कि वह बिहार में “पिछले दरवाज़े से एनआरसी” लागू कर रहा है। ओवैसी के अनुसार, यह कवायद खासतौर पर सीमांचल जैसे बाढ़-पीड़ित इलाकों के गरीब मुसलमानों को मतदाता सूची से बाहर करने के इरादे से की जा रही है।

ओवैसी ने ‘एक्स’ (पूर्व ट्विटर) पर लिखा,

“अब वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए केवल अपनी जन्मतिथि और स्थान का प्रमाण ही नहीं, बल्कि माता-पिता के जन्म प्रमाण भी देना होगा। सवाल है कि सीमांचल के गरीब, जिनके पास खुद का राशन कार्ड भी मुश्किल से होता है, वे अपने माता-पिता के जन्म प्रमाण कहां से लाएं?”

उन्होंने याद दिलाया कि 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि मतदाता सूची में पहले से नामित किसी व्यक्ति को बिना नोटिस और उचित प्रक्रिया के हटाया नहीं जा सकता। साथ ही, नागरिकता का निर्धारण केवल सीमित दस्तावेजों के आधार पर नहीं किया जा सकता; सभी प्रकार के वैध प्रमाणों को स्वीकार किया जाना चाहिए।

नई प्रक्रिया के तहत –

  • 1987 से पहले जन्मे व्यक्ति को 11 स्वीकृत दस्तावेजों में से कोई एक देना होगा।
  • 1987 से 2004 के बीच जन्मे नागरिकों को अपने और किसी एक अभिभावक के जन्मस्थान व तिथि का प्रमाण देना होगा।
  • 2004 के बाद जन्मे नागरिकों को स्वयं के साथ-साथ दोनों माता-पिता की नागरिकता साबित करनी होगी। यदि कोई विदेशी है, तो उसके वीज़ा व पासपोर्ट की प्रतियां भी जरूरी हैं।

ओवैसी ने चेताया कि यह प्रक्रिया गरीबों को मताधिकार से वंचित करने की साजिश है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग बिहार में जून-जुलाई के बीच डोर-टू-डोर मतदाता सत्यापन अभियान चलाने जा रहा है, जो इतने कम समय और संसाधनों में निष्पक्षता से संभव नहीं है।

यह पूरा घटनाक्रम विपक्ष के उस आरोप को बल देता है जिसमें कहा गया है कि चुनाव आयोग अब सत्ता पक्ष के राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहा है, और इसका मुख्य निशाना मुस्लिम एवं गरीब तबका है, जिनका झुकाव परंपरागत रूप से गैर-भाजपा दलों की ओर रहा है।

बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव अक्टूबर-नवंबर 2025 के बीच संभावित हैं। हालांकि, भारत के चुनाव आयोग ने अब तक कोई आधिकारिक तारीख घोषित नहीं की है। मगर उससे पहले जो संकेत दिख रहे हैं, वे न सिर्फ लोकतंत्र के लिए चिंताजनक हैं, बल्कि सामाजिक और संवैधानिक मूल्यों की कसौटी पर भी कई सवाल खड़े कर रहे हैं।

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