Education

रेशम फातिमा को चेवनिंग स्कॉलरशिप, एसिड अटैक से LSE तक सफर

नौशाद अख्तर | पटना रांची

रांची की 29 वर्षीय रेशम फातिमा ने जिंदगी की उन मुश्किलों को पीछे छोड़कर एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जो सिर्फ उनके लिए नहीं, बल्कि एसिड अटैक सर्वाइवर्स और शिक्षा के जरिए अपनी पहचान बनाने वाली युवतियों के लिए भी उम्मीद की कहानी है। रेशम फातिमा को ब्रिटेन सरकार की प्रतिष्ठित चेवनिंग स्कॉलरशिप 2026 के लिए चुना गया है। इस स्कॉलरशिप के तहत वह लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस यानी LSE में जेंडर, डेवलपमेंट एंड ग्लोबलाइजेशन में मास्टर डिग्री करेंगी।

रेशम का दावा है कि वह चेवनिंग स्कॉलरशिप हासिल करने वाली भारत की पहली एसिड अटैक सर्वाइवर हैं। उनके लिए यह उपलब्धि केवल विदेश जाकर पढ़ाई करने का अवसर नहीं है। यह उस जिंदगी का जवाब भी है, जिसे एक एसिड अटैक ने कभी अचानक बदल दिया था।

17 साल की उम्र में एसिड अटैक ने बदली जिंदगी

रेशम फातिमा का जन्म 1997 में जमशेदपुर में हुआ। जब वह 11वीं कक्षा में पढ़ रही थीं और लखनऊ में अपने दादा दादी के साथ रहती थीं, तब परिवार के एक रिश्तेदार ने उनसे शादी करने की इच्छा जताई। रेशम ने इसे स्वीकार नहीं किया।

फरवरी 2014 में एक दिन वह कोचिंग क्लास से लौट रही थीं। रिश्तेदार ने उन्हें घर छोड़ने की बात कही। रेशम को भरोसा था कि परिवार का सदस्य होने के कारण वह सुरक्षित हैं। लेकिन रास्ते में वह उन्हें हाईवे की तरफ ले गया और उन पर एसिड डाल दिया।

रेशम ने उस घटना को याद करते हुए बताया है कि शुरुआत में उन्हें लगा कि शायद पेट्रोल डाल दिया गया है। कुछ ही क्षणों में शरीर में तेज जलन शुरू हो गई। इसके बाद हमलावर ने चाकू निकालकर उनकी गर्दन पर रख दिया।

रेशम ने किसी तरह उसे धक्का दिया और वहां से भाग निकलीं। उनके शरीर पर एसिड के गंभीर निशान पड़े। उस समय उनकी मदद के लिए आगे आने वाले लोग बहुत कम थे। एक ऑटो चालक ने उन्हें सहारा दिया। बाद में एक बुजुर्ग व्यक्ति उन्हें अस्पताल ले गए।

यह घटना रेशम के शरीर पर निशान छोड़ गई, लेकिन उनके सपनों को खत्म नहीं कर सकी।

अस्पताल और पढ़ाई के बीच गुजरे कई साल

एसिड अटैक के बाद रेशम की जिंदगी लंबे समय तक अस्पताल और घर के बीच सिमट गई। कई सर्जरी हुईं। इलाज चलता रहा। लोगों से मिलना जुलना कम हो गया। बाहर निकलने पर लोगों की नजरें और सवाल उन्हें परेशान करते थे।

इसके बावजूद उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी।

रेशम ने साइंस स्ट्रीम से 12वीं की परीक्षा 87 प्रतिशत अंकों के साथ पास की। इसके बाद उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया से फिजिक्स ऑनर्स की पढ़ाई पूरी की। बाद में उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी JNU से पॉलिटिक्स और इंटरनेशनल रिलेशंस में मास्टर डिग्री हासिल की।

उनकी शैक्षणिक यात्रा अपने आप में इसलिए खास है क्योंकि यह उस दौर में जारी रही, जब उन्हें लगातार शारीरिक और मानसिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था।

2015 में मिला राष्ट्रीय बहादुरी पुरस्कार

एसिड अटैक के बाद रेशम ने जिस तरह अपनी जिंदगी को फिर से खड़ा किया, उसकी पहचान देश स्तर पर भी हुई। वर्ष 2015 में उन्हें राष्ट्रीय बहादुरी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके साहस और संघर्ष को मिली बड़ी पहचान थी।

लेकिन सम्मान मिलने के बाद भी सामान्य जिंदगी आसान नहीं हुई।

लोग उन्हें देखकर घूरते थे। कई बार ऐसे सवाल पूछे जाते थे, जो उनके पुराने जख्मों को फिर से कुरेद देते थे। रेशम को सबसे ज्यादा तकलीफ लोगों की दया से होती थी।

उनका कहना रहा है कि वह किसी की दया नहीं चाहती थीं। वह चाहती थीं कि लोग उन्हें एक सक्षम और आत्मनिर्भर इंसान के तौर पर देखें।

पति असगर ने चेवनिंग के लिए किया प्रोत्साहित

रेशम की जिंदगी में एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने सिविल सर्विस में जाने का विचार किया। बाद में उन्होंने राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की पढ़ाई की दिशा चुनी।

वर्ष 2024 में उन्होंने असगर से शादी की। रेशम के मुताबिक, उनके पति ने उन्हें चेवनिंग स्कॉलरशिप के लिए आवेदन करने के लिए प्रोत्साहित किया।

रेशम ने पिछले वर्ष इस प्रतिष्ठित छात्रवृत्ति के लिए आवेदन किया था। चयन प्रक्रिया के कई चरणों के बाद उनका इंटरव्यू हुआ और अंततः उन्हें सफलता मिली।

चेवनिंग स्कॉलरशिप ब्रिटेन सरकार की प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय छात्रवृत्ति है। इसके माध्यम से दुनिया के अलग अलग देशों के प्रतिभाशाली लोगों को ब्रिटेन में उच्च शिक्षा हासिल करने का अवसर मिलता है।

रेशम के लिए यह अवसर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह अब अपनी व्यक्तिगत कहानी को व्यापक सामाजिक मुद्दों से जोड़कर देख रही हैं।

एब्राह फाउंडेशन से लड़कियों की मदद

रेशम केवल अपनी पढ़ाई तक सीमित नहीं रहीं। वर्ष 2023 में उन्होंने एब्राह फाउंडेशन की शुरुआत की। इसका उद्देश्य युवा मुस्लिम महिलाओं को शिक्षा, करियर और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए मार्गदर्शन देना है।

उनका मानना है कि महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता उनके आत्मविश्वास को मजबूत करती है। खासकर मुस्लिम महिलाओं के सामने कई बार महिला होने और अल्पसंख्यक समुदाय से आने के कारण अलग अलग तरह की सामाजिक चुनौतियां होती हैं।

रेशम का लक्ष्य है कि लड़कियां शिक्षा हासिल करें और अपने फैसले खुद लेने में सक्षम बनें।

लंदन जाने के बाद भी वह एब्राह फाउंडेशन के काम को जारी रखना चाहती हैं। वह लड़कियों के लिए स्पोकन इंग्लिश क्लास शुरू करने की योजना पर भी काम कर रही हैं।

आरोपी की मौत के बाद भी खत्म नहीं हुआ दर्द

रेशम के जीवन का एक कठिन अध्याय हमले के आरोपी की मौत से भी जुड़ा है। वर्ष 2015 में उन्हें पता चला कि आरोपी ने जेल में आत्महत्या कर ली है। उस समय मामले की कानूनी प्रक्रिया चल रही थी।

इस खबर पर रेशम की प्रतिक्रिया उनके अपने लिए भी अप्रत्याशित थी। उन्होंने कहा कि वह नहीं चाहती थीं कि वह व्यक्ति मर जाए। वह चाहती थीं कि वह जिंदा रहे और उनकी सफलता देखे।

रेशम के लिए यह सिर्फ बदला लेने की भावना नहीं थी। वह यह साबित करना चाहती थीं कि एसिड अटैक उनकी जिंदगी का अंत नहीं है।

उनके शब्दों में, वह चाहती थीं कि हमलावर देखे कि वह उनकी जिंदगी बर्बाद नहीं कर सका।

रेशम के लिए LSE की पढ़ाई नई शुरुआत

अब रेशम फातिमा लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस में जेंडर, डेवलपमेंट एंड ग्लोबलाइजेशन की पढ़ाई करेंगी।

उनके लिए यह डिग्री महज एक अकादमिक उपलब्धि नहीं है। यह उनके व्यक्तिगत अनुभव और भविष्य के सामाजिक काम के बीच एक कड़ी भी है।

रेशम मानती हैं कि एसिड अटैक के बाद की जिंदगी को सिर्फ एक घटना के रूप में पीछे छोड़ना संभव नहीं है। उसके निशान शरीर पर भी रहते हैं और यादों में भी।

फिर भी उन्होंने उस घटना को अपनी पहचान नहीं बनने दिया।

जमशेदपुर में जन्मी और रांची से जुड़ी रेशम फातिमा की कहानी आज एसिड अटैक सर्वाइवर, महिला शिक्षा, मुस्लिम महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता, उच्च शिक्षा, चेवनिंग स्कॉलरशिप और महिला सशक्तीकरण जैसे मुद्दों से जुड़ती है।

उनकी यात्रा यह भी दिखाती है कि शिक्षा कई बार सिर्फ नौकरी या डिग्री हासिल करने का साधन नहीं होती। वह अपने बारे में बनी धारणाओं को बदलने का रास्ता भी बन सकती है।

रेशम के लिए चेवनिंग स्कॉलरशिप मंजिल नहीं है। यह उस बड़े काम की शुरुआत है, जिसे वह लड़कियों की शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए आगे बढ़ाना चाहती हैं।

रेशम फातिमा की उपलब्धियां एक नजर में

नाम: रेशम फातिमा
उम्र: 29 वर्ष
जन्म: जमशेदपुर, झारखंड
वर्तमान जुड़ाव: रांची
एसिड अटैक: 2014
12वीं: साइंस स्ट्रीम, 87 प्रतिशत अंक
स्नातक: जामिया मिल्लिया इस्लामिया, फिजिक्स ऑनर्स
स्नातकोत्तर: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, पॉलिटिक्स और इंटरनेशनल रिलेशंस
राष्ट्रीय सम्मान: 2015 में राष्ट्रीय बहादुरी पुरस्कार
सामाजिक पहल: एब्राह फाउंडेशन
नई उपलब्धि: चेवनिंग स्कॉलरशिप 2026
आगे की पढ़ाई: London School of Economics and Political Science
कोर्स: Gender, Development and Globalisation

सवाल जवाब

रेशम फातिमा कौन हैं?
रेशम फातिमा जमशेदपुर में जन्मी और रांची से जुड़ी एसिड अटैक सर्वाइवर हैं, जिन्होंने उच्च शिक्षा के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई है।

रेशम फातिमा को कौन सी स्कॉलरशिप मिली है?
उन्हें ब्रिटेन सरकार की प्रतिष्ठित चेवनिंग स्कॉलरशिप 2026 मिली है।

रेशम फातिमा LSE में क्या पढ़ेंगी?
वह लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस में Gender, Development and Globalisation में मास्टर डिग्री करेंगी।

रेशम फातिमा पर एसिड अटैक कब हुआ था?
उन पर वर्ष 2014 में, जब वह 17 वर्ष की थीं, एसिड अटैक हुआ था।

रेशम फातिमा ने कहां पढ़ाई की है?
उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया से फिजिक्स ऑनर्स और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पॉलिटिक्स और इंटरनेशनल रिलेशंस में उच्च शिक्षा हासिल की है।

रेशम फातिमा का एब्राह फाउंडेशन क्या करता है?
एब्राह फाउंडेशन युवा मुस्लिम महिलाओं को शिक्षा, करियर और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए मार्गदर्शन देने की दिशा में काम करता है।

रेशम फातिमा की कहानी क्यों महत्वपूर्ण है?
उनकी कहानी एसिड अटैक के बाद पुनर्निर्माण, महिला शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक पूर्वाग्रहों के खिलाफ संघर्ष की मिसाल है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *