खाड़ी देशों में दरार: ओपेक से यूएई का बाहर होना और सऊदी से तनाव
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दुबई/रियाद:
मध्य-पूर्व की रेतीली धरती पर युद्ध के बादलों के बीच एक ऐसी कूटनीतिक दरार पैदा हो गई है, जो आने वाले दशकों तक वैश्विक तेल बाजार और अरब राजनीति की दिशा बदल सकती है। ईरान-अमेरिका संघर्ष की तपिश के बीच, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने दशकों पुराने तेल गठबंधन ‘ओपेक’ (OPEC) को अलविदा कहकर दुनिया को चौंका दिया है। 1967 से इस समूह का हिस्सा रहे यूएई का यह फैसला न केवल आर्थिक है, बल्कि सऊदी अरब के साथ उसके गहराते मनमुटाव का सबसे बड़ा सबूत भी है।
ओपेक से विदाई: मजबूरी या मास्टरस्ट्रोक?
मंगलवार, 28 अप्रैल को यूएई ने आधिकारिक तौर पर ओपेक से अलग होने की घोषणा की। मीडिया आउटलेट ‘सेमाफोर’ के अनुसार, यूएई लंबे समय से ओपेक के तेल उत्पादन कोटा (Production Quota) से नाखुश था। यूएई का तर्क है कि ओपेक के कड़े प्रतिबंध उसे अपनी पूरी क्षमता से तेल उत्पादन करने से रोक रहे हैं, जिससे उसके राजस्व को भारी नुकसान हो रहा है।
अब यूएई केवल ‘सद्भावना’ बनाए रखने के लिए अपनी आर्थिक स्वतंत्रता का बलिदान देने को तैयार नहीं है। यह कदम संकेत देता है कि अमीरात अब वैश्विक मंच पर अपनी अलग पहचान बनाने और स्वतंत्र आर्थिक नीति चलाने की राह पर निकल पड़ा है।
मोहम्मद बिन सलमान बनाम मोहम्मद बिन जायद: दो महाशक्तियों की टकराती महत्वाकांक्षाएं
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पहलू सऊदी अरब और यूएई के बीच का तनाव है। सऊदी अरब को पारंपरिक रूप से ओपेक का निर्विवाद नेता माना जाता रहा है। यूएई का ओपेक छोड़ना सीधे तौर पर सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) के नेतृत्व को चुनौती देने जैसा है।
सऊदी अरब में आयोजित हालिया ‘खाड़ी शिखर सम्मेलन’ ने इन अटकलों को और हवा दे दी। यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की इस सम्मेलन से अनुपस्थिति ने पूरी दुनिया को यह संदेश दिया है कि दोनों देशों के बीच सब कुछ ठीक नहीं है। यमन और सूडान जैसे क्षेत्रीय मुद्दों पर पहले से जारी मतभेद अब एक सार्वजनिक ‘शीत युद्ध’ (Cold War) का रूप ले चुके हैं।
[Image showing a symbolic representation of oil rigs and the flags of Saudi Arabia and UAE moving apart]
ईरान युद्ध और अरब एकता का बिखरता स्वरूप
विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान युद्ध ने अरब देशों की उस एकता की कलई खोल दी है, जो कभी केवल कागजों पर दिखाई देती थी। हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने से उपजे संकट ने हर अरब देश को अपने निजी हितों की रक्षा के लिए मजबूर कर दिया है।
सऊदी और यूएई की यह राहें जुदा होने से सबसे बड़ा खतरा ‘मुस्लिम ब्लॉक’ की कमजोरी के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों की चेतावनी है कि:
- पश्चिमी देशों पर निर्भरता: जब अरब देश आपस में लड़ेंगे, तो उन्हें सुरक्षा के लिए अमेरिका और इजरायल जैसे देशों का पिछलग्गू बनना पड़ेगा।
- क्षेत्रीय कमजोरी: आपसी फूट का सीधा फायदा ईरान और अन्य प्रतिद्वंद्वी ताकतों को मिलेगा।
- आर्थिक अनिश्चितता: तेल बाजार में दो बड़े उत्पादकों की प्रतिद्वंद्विता से कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव आ सकता है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था अस्थिर होगी।
आने वाले दिनों की चुनौती
सेमाफोर की रिपोर्ट के अनुसार, आशंका जताई जा रही है कि आने वाले हफ्तों में यूएई अन्य क्षेत्रीय संगठनों से भी हटने की घोषणा कर सकता है। यह केवल एक आर्थिक अलगाव नहीं है, बल्कि एक नई ‘अरब राजनीति’ का उदय है जहाँ अब ‘भाईचारा’ नहीं बल्कि ‘राष्ट्रीय हित’ सर्वोपरि होंगे।
जहाँ एक तरफ सऊदी अरब खुद को पूरे इस्लामी जगत और अरब प्रायद्वीप का नेता बनाए रखना चाहता है, वहीं यूएई खुद को एक आधुनिक, स्वतंत्र और आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने की होड़ में है। इन दो महत्वाकांक्षाओं की टक्कर में यदि अरब एकता बिखरती है, तो इसका खामियाजा पूरे मध्य-पूर्व को भुगतना पड़ सकता है।
निष्कर्ष
जेद्दा की सड़कों से लेकर दुबई के गगनचुंबी इमारतों तक, चर्चा केवल एक ही है—क्या खाड़ी देश अपनी आपसी प्रतिद्वंद्विता को भुलाकर फिर से एक हो पाएंगे? या फिर ईरान युद्ध की आग में यह पुरानी दोस्ती हमेशा के लिए खाक हो जाएगी? फिलहाल, यूएई की ओपेक से विदाई ने यह साफ कर दिया है कि खाड़ी की बिसात पर अब मोहरे बदल चुके हैं।

