दलित चीफ जस्टिस पर जूता फेंकने से सियासी तूफ़ान: बिहार में बीजेपी की चुनावी नैया डगमगाई
“आ बैल मुझे मार” — सुप्रीम कोर्ट में दलित चीफ जस्टिस पर जूता फेंकने की घटना से बीजेपी को बिहार चुनाव में भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
बिहार विधानसभा चुनाव की सरगर्मी के बीच सुप्रीम कोर्ट में जो हुआ, उसका राजनीतिक असर बेहद गहरा और दूरगामी हो सकता है। देश के प्रधान न्यायाधीश, जो स्वयं दलित समुदाय से आते हैं, पर खुले कोर्ट में एक वरिष्ठ वकील द्वारा जूता फेंकना—यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि सामाजिक-सियासी विमर्श को झकझोर देने वाला मामला बन गया है।
इस शर्मनाक घटना पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की चुप्पी, प्रधानमंत्री की देर से आई प्रतिक्रिया और एनडीए में शामिल दलित नेताओं का मौन रहना—यह सब दर्शाता है कि दलित समाज को लेकर सरकार की संवेदनशीलता केवल चुनावी जुमला बनकर रह गई है। वहीं, एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इसे “दलित बनाम सवर्ण” का रंग देकर मुद्दे को और धार दे दी है, जिससे बिहार में बीजेपी की चुनावी जमीन खिसकती दिख रही है।
बिहार के दलित समुदाय की बात करें तो वे हमेशा से सामाजिक न्याय के प्रति सजग रहे हैं। लालू प्रसाद यादव के शासनकाल में उन्हें जो सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक अवसर मिले, उसने उन्हें मुखर और जागरूक बनाया। यही वजह है कि यहां का दलित समाज अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा संगठित और आत्मसम्मानी है। नक्सल आंदोलन से लेकर सामाजिक संघर्षों तक, बिहार के दलितों ने हमेशा अन्याय का विरोध किया है।
ऐसे में जब देश के सर्वोच्च न्यायालय के दलित चीफ जस्टिस पर एक सवर्ण वकील द्वारा जूता फेंका जाता है और सरकार व सत्ताधारी दल इससे आंख मूंदे रहते हैं, तो यह न केवल दलित अस्मिता पर हमला है, बल्कि राजनीतिक रूप से बीजेपी के लिए आत्मघाती कदम भी साबित हो सकता है।
ओवैसी ने इस मुद्दे को अपनी जनसभाओं में जमकर उठाया। उन्होंने जनता को यह समझाने की कोशिश की कि यह हमला महज एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरे दलित समाज पर है। उन्होंने उदाहरण देकर कहा कि कैसे आज भी कई जगह दलितों को घोड़े पर चढ़ने या मूंछें रखने पर अपमानित किया जाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मुस्लिम समाज कोर्ट के कई फ़ैसलों से असहमत होने के बावजूद संविधान का सम्मान करता रहा है, तो फिर एक दलित जज की एक टिप्पणी पर इतना गुस्सा क्यों?
चीफ जस्टिस ने भले ही इस घटना पर कोई शिकायत दर्ज नहीं करवाई हो, लेकिन उनकी मां ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है और दोषी पर सख्त कार्रवाई की मांग की है। इसके बावजूद, सरकार की ओर से कोई ठोस कदम न उठाना यह दर्शाता है कि न्यायपालिका की गरिमा से ज्यादा चिंता उन्हें अपने वोट बैंक की है। सोशल मीडिया पर उस वकील को हीरो बनाकर पेश किया जा रहा है और नफरत फैलाने वाले यूट्यूबर्स खुलेआम इस घटना का महिमामंडन कर रहे हैं।
नोएडा पुलिस द्वारा ऐसे एक यूट्यूबर से केवल पूछताछ कर छोड़ देना, और फिर उसका खुद को सही साबित करने पर अड़ा रहना, यह सवाल उठाता है कि क्या कानून सबके लिए बराबर है?
राजनीतिक विश्लेषक और समाजशास्त्री इस घटना को बीजेपी के लिए एक बड़े संकट की घड़ी मान रहे हैं। पिछली बार बड़ी मुश्किल से बीजेपी-जेडीयू गठबंधन की सरकार बनी थी। मगर इस बार माहौल बहुत बदल चुका है। उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को बीजेपी ने दलित चेहरे के तौर पर प्रस्तुत किया, मगर उनकी शैक्षणिक योग्यता और आपराधिक छवि ने उन्हें कमजोर बना दिया है। वहीं, जीतनराम मांझी और चिराग पासवान जैसे वरिष्ठ दलित नेता, जो एनडीए का हिस्सा हैं, उनका इस मुद्दे पर चुप रहना भी दलित समाज को अखर रहा है।
निष्कर्षतः, सुप्रीम कोर्ट के दलित चीफ जस्टिस पर खुलेआम अपमानजनक हमला और उस पर सरकार की निष्क्रियता—यह भाजपा को बिहार जैसे राजनीतिक रूप से जागरूक राज्य में भारी नुकसान पहुंचा सकता है। जिस दलित समाज को साथ लेकर बीजेपी सत्ता तक पहुंची, वही समाज अब उसे सबक सिखाने के मूड में दिख रहा है।
बिहार का जनमत अब इंतजार नहीं कर रहा—वह जवाब देने को तैयार बैठा है।

