ईरान के खिलाफ कार्रवाई की आहट: अमेरिकी युद्धपोत भारतीय महासागर में, क्षेत्रीय तनाव चरम पर
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो,दुबई / तेहरान / वॉशिंगटन:
पश्चिम एशिया एक बार फिर विस्फोटक मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है। ईरान समर्थित सशस्त्र गुटों की खुली धमकियों, अमेरिकी युद्धपोतों की बढ़ती तैनाती और तेहरान की तीखी बयानबाज़ी ने पूरे क्षेत्र को संभावित टकराव की ओर धकेल दिया है। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि मामूली चिंगारी भी व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकती है।
ईरान समर्थित दो प्रमुख मिलिशिया संगठनों—यमन के हूती विद्रोही और इराक के कातिब हिज़्बुल्लाह—ने हाल के दिनों में नए हमलों के संकेत देकर तनाव को और बढ़ा दिया है। इन समूहों की धमकियां ऐसे समय आई हैं, जब अमेरिका ने भारतीय महासागर में अपने सबसे शक्तिशाली विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन को आगे बढ़ा दिया है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दे चुके हैं।
हूतियों और कातिब हिज़्बुल्लाह की चेतावनी
यमन में सक्रिय ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में जहाज़रानी पर दोबारा हमले शुरू करने के संकेत दिए हैं। हाल ही में जारी एक संक्षिप्त वीडियो में आग की लपटों में घिरे एक जहाज़ की तस्वीर दिखाई गई, जिसके नीचे सिर्फ एक शब्द लिखा था—“जल्द।” यह वीडियो स्पष्ट रूप से चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है।
इसके बाद हूतियों ने जनवरी 2024 में अदन की खाड़ी में मार्शल आइलैंड्स के झंडे वाले तेल टैंकर मार्लिन लुआंडा पर किए गए हमले के फुटेज भी दोबारा प्रसारित किए। यह वही अभियान था, जिसके तहत ग़ज़ा युद्ध से जोड़ते हुए हूतियों ने 100 से अधिक जहाज़ों को निशाना बनाया था। हालांकि युद्धविराम के बाद इन हमलों को रोका गया था, लेकिन संगठन बार-बार यह संकेत देता रहा है कि परिस्थितियां बदलते ही वह फिर सक्रिय हो सकता है।
इसी बीच इराक के कातिब हिज़्बुल्लाह संगठन के प्रमुख अहमद “अबू हुसैन” अल-हमिदावी ने अमेरिका और उसके सहयोगियों को सीधी चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि यदि ईरान पर हमला किया गया, तो यह “पूरे क्षेत्र में पूर्ण युद्ध” को जन्म देगा। उनके शब्दों में, “ईरानी गणराज्य के खिलाफ युद्ध कोई सैर नहीं होगी; आपको हमारे क्षेत्र में मौत के सबसे कड़वे रूप चखने पड़ेंगे।”
‘एक्सिस ऑफ रेज़िस्टेंस’ में दरार?
दिलचस्प बात यह है कि जून में इज़राइल और ईरान के बीच 12 दिनों तक चले टकराव के दौरान, जब अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर बमबारी की थी, तब ये दोनों संगठन अपेक्षाकृत निष्क्रिय रहे थे। यह हिचकिचाहट ईरान के तथाकथित “एक्सिस ऑफ रेज़िस्टेंस” (प्रतिरोध धुरी) में बढ़ते तनाव और आंतरिक असंतुलन को उजागर करती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि ग़ज़ा युद्ध के दौरान इज़राइल द्वारा हिज़्बुल्लाह और अन्य ईरान समर्थित समूहों पर किए गए हमलों ने इस धुरी को कमजोर कर दिया है। इसके बावजूद, मौजूदा संकट में ये संगठन फिर से सक्रिय बयानबाज़ी के ज़रिये ईरान को समर्थन देने की कोशिश कर रहे हैं।
अमेरिकी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन
इन धमकियों के समानांतर अमेरिका ने भी अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है। यूएसएस अब्राहम लिंकन विमानवाहक पोत समूह, जिसमें गाइडेड मिसाइल क्रूज़र, एंटी-एयरक्राफ्ट युद्धपोत और पनडुब्बी रोधी विध्वंसक शामिल हैं, अब भारतीय महासागर में सक्रिय है। सीएनएन के मुताबिक, यह तैनाती अमेरिका को ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य विकल्पों के और करीब ले जाती है।
हालांकि अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह तैनाती अंतिम हमला स्थिति नहीं है। राष्ट्रपति ट्रंप अभी भी विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि जहाज़ों को “एहतियातन” आगे बढ़ाया गया है। ट्रंप ने दो लाल रेखाएं भी तय की हैं—शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की हत्या और बड़े पैमाने पर फांसी—जिन्हें पार करने पर कार्रवाई की जा सकती है।
ब्रिटेन ने भी तनाव को देखते हुए खाड़ी क्षेत्र में अपने रॉयल एयर फोर्स टाइफून फाइटर जेट्स तैनात करने की पुष्टि की है। लंदन का कहना है कि यह तैनाती पूरी तरह रक्षात्मक है।
तेहरान की प्रतीकात्मक और वास्तविक तैयारी
तेहरान में प्रतिक्रिया सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं है। इस्लामिक रिवोल्यूशन स्क्वायर पर एक विशाल भित्तिचित्र लगाया गया है, जिसमें अमेरिकी विमानवाहक पोत को खून से सने समुद्र में दिखाया गया है और चेतावनी लिखी है—
“अगर तुम हवा बोओगे, तो तूफान काटोगे।”
शुक्रवार की नमाज़ के दौरान एक वरिष्ठ ईरानी मौलवी ने चेतावनी दी कि क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकाने ईरानी मिसाइलों की जद में हैं। ईरान के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता जनरल रज़ा तलई-निक ने इज़राइल और अमेरिका दोनों को चेताया कि किसी भी हमले का जवाब “और अधिक दर्दनाक और निर्णायक” होगा।
सुरक्षा चिंताओं के चलते ईरान ने छोटे निजी विमानों के अपने हवाई क्षेत्र में उड़ान भरने पर रोक लगा दी है। कई पश्चिमी एयरलाइंस पहले ही ईरानी हवाई क्षेत्र से बचने लगी हैं।
विरोध प्रदर्शनों की खूनी कीमत
यह पूरा संकट ईरान के भीतर जारी भीषण अशांति की पृष्ठभूमि में सामने आया है। 28 दिसंबर को ईरानी मुद्रा के अचानक ध्वस्त होने के बाद शुरू हुए विरोध प्रदर्शन धीरे-धीरे एक व्यापक सरकार विरोधी आंदोलन में बदल गए।
अमेरिका स्थित ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, अब तक 5,973 लोगों की मौत हो चुकी है और 41,800 से अधिक गिरफ्तारियां हुई हैं। हालांकि एसोसिएटेड प्रेस इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं कर सका है। ईरानी सरकार ने आधिकारिक तौर पर 3,117 मौतों की बात कही है और कई मृतकों को “आतंकवादी” बताया है।
खाड़ी देशों की सतर्क दूरी
इस बीच संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने हवाई क्षेत्र, ज़मीन या जलक्षेत्र का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए नहीं होने देगा। यूएई के विदेश मंत्रालय ने संवाद, तनाव कम करने और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन पर ज़ोर देते हुए कहा कि कूटनीति ही संकट से बाहर निकलने का रास्ता है।
क्या युद्ध टल पाएगा?
मौजूदा हालात यह संकेत दे रहे हैं कि ईरान संकट अब केवल कूटनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहा। ज़मीन पर सैन्य तैयारियां, आसमान में हवाई प्रतिबंध और समुद्र में युद्धपोत—तीनों मोर्चों पर स्थिति तेजी से बदल रही है।
विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और उसके सहयोगी सैन्य कार्रवाई से पहले हर संभव दबाव का इस्तेमाल करेंगे, जबकि ईरान और उसके समर्थक समूह धमकियों और प्रतीकों के ज़रिये ताकत दिखाने की कोशिश करेंगे। सवाल यह है कि क्या यह टकराव सिर्फ शब्दों तक सीमित रहेगा, या फिर पश्चिम एशिया एक बार फिर व्यापक युद्ध की आग में झुलसने वाला है?
फिलहाल, पूरी दुनिया की निगाहें तेहरान, वॉशिंगटन और लाल सागर पर टिकी हैं—जहां से आने वाला अगला कदम इतिहास की दिशा तय कर सकता है।

