इजरायली सेना का कच्चा-चिट्ठा : फिलिस्तीनी जिन्होंने हाइडी लेविन को बचाया
अबू फलाह पर 16 अक्टूबर 2026 को हुए हमले का मेरा आंखों देखा हाल
jasper nathaniel
शुक्रवार, 16 अक्टूबर की तड़के जब मैं खिरबेट अबू फलाह स्थित उस घर से बाहर निकला जहाँ मैं ठहरा हुआ था, तो मुझे पड़ोसी गांव तुरमुसअया के जैतून के खेतों से काले धुएं के तीन गुबार उठते दिखाई दिए। यह ठीक उसी जगह का मंजर था जहाँ 362 दिन पहले मैंने एक हिंसक हमले को अपने कैमरों और शब्दों में दर्ज किया था, जब नकाबपोश उपद्रवियों की भीड़ ने जैतून के किसानों और मेरा पीछा किया था और एक बुजुर्ग महिला को लाठियों से पीट-पीटकर अधमरा कर दिया था। मैंने तुरमुसअया में अपने एक दोस्त को फोन किया, जिसने बताया कि उपद्रवी बस्तियों के लोगों (सेट्लर्स) ने फसल काट रहे किसानों पर हमला कर दिया है, तीन गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया है और कई किसानों की बेरहमी से पिटाई की है। अबू फलाह के लिए, जहाँ मैं जाने ही वाला था, यह एक बहुत ही मनहूस संकेत था।

फिलिस्तीनियों के लिए जैतून की वार्षिक कटाई का समय शांति, जश्न और पारिवारिक जुड़ाव का अवसर माना जाता है। यह न केवल उनकी आजीविका का जरिया है, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने का जरिया भी है। पूरे वेस्ट बैंक में पीढ़ियों से परिवार इन्हीं पेड़ों की देखभाल और कटाई करते आ रहे हैं। लेकिन जब हम अबू फलाह के बागों में पहुंचे, तो वहाँ का मंजर बिल्कुल अलग था। वहाँ न औरतें थीं, न बच्चे, न ही कोई हंसी-खुशी का माहौल। सिर्फ पुरुष थे जो जितनी जल्दी हो सके जैतून तोड़ने में लगे थे। खेतों से ठीक ऊपर पहाड़ी पर, हमने दर्जनों उपद्रवियों को हमले की तैयारी करते देखा: वे नकाब पहन रहे थे, लाठियां उठा रहे थे और दूरबीन से नीचे हमारी तरफ देख रहे थे।
जैसा कि मैंने कई बार लिखा है, इस तरह की बस्तियों की हिंसा या अवैध चौकियों का निर्माण कोई अचानक या इत्तेफाक से नहीं होता। यह एक सोची-समझी योजना का हिस्सा है, जिसे इजरायली सेना (IDF) और सरकार की शह पर अंजाम दिया जाता है, ताकि फिलिस्तीनी गांवों का एक-दूसरे से संपर्क काट दिया जाए, अवैध चौकियों को मुख्य बस्तियों से जोड़ा जा सके और अंततः इस जमीन से यहाँ के मूल निवासियों को बेदखल कर दिया जाए। उस सुबह पहाड़ी के ऊपर नेत्जाख शमुएल नाम की चौकी से जो लोग हमें देख रहे थे, वे सैन्य-स्तरीय हथियारों से लैस थे और वे आए दिन गांव पर हमले करते रहते हैं। इसलिए उन्हें हमले की तैयारी करते देख किसी को अचरज नहीं हुआ। मैं और कई अन्य पत्रकार वहाँ मुख्य रूप से इसीलिए मौजूद थे।
खेतों में उतरने से पहले, गांव वालों ने अपनी ही जमीन पर फसल काटने की इजाजत के लिए IDF से तालमेल बिठाया था। दूसरे शब्दों में, सेना इस बात पर सहमत हुई थी कि कुछ घंटों के लिए वह फिलिस्तीनी जमीन पर कब्जा जमाए उपद्रवियों को असली मालिकों पर हमला करने से रोकेगी। लेकिन सेना दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही थी, और कटाई शुरू होने के करीब एक घंटे बाद ही दर्जनों नकाबपोश उपद्रवी पहाड़ी से नीचे उतरने लगे।

किसान घबराकर अपना सामान समेटने लगे, जैतून की बोरियां बांधीं और गांव की तरफ पीछे हटने लगे। लेकिन हर कोई नहीं भागा। जैसे ही नकाबपोश हमलावर भारी-भरकम पत्थर उछालने वाले गोफन (गोफन से फेंके गए पत्थर शरीर को बुरी तरह अपाहिज कर देते हैं) लेकर आगे बढ़े, दर्जनों फिलिस्तीनी युवा (शबाब) सामने आ गए। वे इस खतरनाक माहौल में किसानों की सुरक्षा के लिए बाहर आए थे। उन्होंने अपने चेहरों पर नकाब ढके, हाथ में पत्थर उठाए और हमलावरों से अपनी बस्ती की रक्षा के लिए मुस्तैद हो गए।
वेस्ट बैंक में पत्थर फेंकने के आरोप में पकड़े जाने वाले फिलिस्तीनियों को बेन-ग्विर के क्रूर यातना शिविरों में 3 से 20 साल तक की जेल की सजा भुगतनी पड़ती है। ऐसे हमलों के बाद अक्सर सैनिक गांवों पर छापे मारते हैं और स्थानीय लोगों को झूठे आरोपों में गिरफ्तार कर लेते हैं। या फिर वे सीधे गोली का शिकार बनते हैं, क्योंकि सैनिक और हमलावर अक्सर पत्थर फेंकने वाले फिलिस्तीनियों को मौके पर ही गोली मार देते हैं।
I wrote a full, detailed account of the October 16 settler and soldier attack on the olive harvest in Abu Falah. I think it may be the most important thing I’ve ever written. “The Palestinians Who Rescued Heidi Levine” Link in next tweet. https://t.co/1zh2IzVuZC
— jasper nathaniel (@infinite_jaz) October 18, 2026
लेकिन यह लड़ाई सिर्फ जैतून की फसल बचाने की नहीं थी। अबू फलाह की तरह ही कई फिलिस्तीनी बस्तियों में जैतून के खेत हिंसक चौकियों और रिहाइशी इलाकों के बीच सुरक्षा दीवार का काम करते हैं। अगर वे उपद्रवी इन खेतों को पार कर जाते, तो इसमें कोई शक नहीं कि वे गांव के भीतर घुसकर घरों को फूंक देते, लोगों पर कहर ढाते और गांव के अंदर तक अपना कब्जा फैलाने की कोशिश करते। 7 अक्टूबर के बाद से वे इसी तरह 60 से ज्यादा फिलिस्तीनी बस्तियों को खाली करा चुके हैं। इसलिए मुकाबला करने उतरे इन युवाओं के लिए यह अस्तित्व की लड़ाई थी।

इन नौजवानों ने हमलावर भीड़ की तरफ रुख किया। करीब 10 मिनट तक जैतून के उन खेतों में भीषण भिड़ंत हुई। और फिलिस्तीनी युवा भारी पड़ रहे थे। जैसे-जैसे ‘शबाब’ नारे लगाते हुए आगे बढ़े, हमलावर पीछे हटने लगे। मैंने अपनी जिंदगी में ऐसा मंजर पहले कभी नहीं देखा था। मैं अग्रिम पंक्ति में मौजूद था, पत्थरों से बचते हुए हर घटना को रिकॉर्ड कर रहा था।
तभी हमलावरों ने जैतून के पेड़ों में आग लगानी शुरू कर दी और चारों तरफ धुआं भर गया।
उसी वक्त, कम से कम एक सैन्य जीप हमलावरों के पास आकर रुकी और हम पर आंसू गैस के गोले दागने शुरू कर दिए। धुएं और गैस के गुबार के बीच मैंने देखा कि एक सफेद पिकअप ट्रक पहाड़ी से नीचे उतरा, जिसके पीछे दो-तीन नकाबपोश हाथ में M16 राइफलें लिए खड़े थे—यह दृश्य ISIS के खौफनाक दिनों की याद दिला रहा था। फिर उन्होंने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। मैं और मेरे साथ मौजूद तमाम फिलिस्तीनी, धुएं, गैस और गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच गांव की ओर भागे।
जब हम धुएं के गुबार से बाहर निकले, तो मैंने पीछे मुड़कर देखा कि हमलावरों की भीड़ ने किसी को घेर रखा था और वे उसे घूंसे, लातों और लाठियों से बेरहमी से पीट रहे थे। मुझे बाद में पता चला कि वह 63 वर्षीय प्रसिद्ध यहूदी-अमेरिकी फोटो पत्रकार हाइडी लेविन थीं, जो वाशिंगटन पोस्ट के लिए काम कर रही थीं। एक मौके पर, एक हमलावर ने उनकी नीली जैकेट (जिस पर साफ अक्षरों में PRESS लिखा था) से उन्हें पकड़कर घुटनों के बल खींच लिया। मुझे लगा शायद वह उनकी मदद कर रहा है, लेकिन उसने उन्हें इसलिए पकड़ रखा था ताकि दूसरा हमलावर उनके पेट में लात मार सके। जैसे ही वे उन्हें पीट रहे थे, बाकी हमलावरों ने उनका सारा सामान—कैमरा, फोन, बटुआ, पासपोर्ट—छीन लिया।

मुझे जरा भी शक नहीं था कि उस पत्रकार की जान जा सकती है। हममें से कुछ लोगों ने उन तक पहुंचने का रास्ता तलाशा: जिनमें पत्रकार एडेल शोको, आंद्रे एक्स, कुछ फिलिस्तीनी (जिनका नाम सुरक्षा कारणों से नहीं लिया जा सकता) और मैं खुद शामिल था। लेकिन हवा में धुआं और आंसू गैस भरी हुई थी, और हमलावर पूरे खेत में फैलकर लगातार बड़े-बड़े पत्थर बरसा रहे थे। उनसे बचने का कोई दूसरा रास्ता नहीं था, सिर्फ उनके बीच से होकर ही जाया जा सकता था। इसलिए हम सावधानी से आगे बढ़ने लगे।
घटना के एक वीडियो में आप एक फिलिस्तीनी को चिल्लाते हुए सुन सकते हैं, “शबाब, आगे बढ़ो, उन्होंने एक पत्रकार को पकड़ लिया है!”
कुछ ही पलों में हमारे पीछे से पत्थरों की बौछार होने लगी—शबाब हमें सुरक्षा कवर दे रहे थे। हमलावर पीछे हटने लगे, जिससे मुझे दौड़कर उन तक पहुंचने का मौका मिल गया। जब मैं उनके पास पहुंचा, तो मुझे एक ऐसी महिला दिखी जो किसी युद्ध क्षेत्र के बजाय मेरी मां की उम्र की ज्यादा लग रही थी—यकीनन उन्हें पीटकर अधमरा करने वाले हमलावरों को भी इस बात का अहसास हुआ होगा।

मैंने हाइडी को उठने में मदद की और एडेल व आंद्रे के साथ उन्हें गांव के पास मौजूद फिलिस्तीनियों के बड़े समूह की तरफ खींचने लगा। वह बेहद घबराई हुई थीं, असह्य दर्द में थीं और चलने में असमर्थ थीं। तभी हमलावरों ने फिर से धावा बोल दिया। पहली बार मुझे लगा कि हम घिर जाएंगे। जब मैं हाइडी से भागने की मिन्नत कर रहा था, तो वे बार-बार कह रही थीं, “मुझे यहीं मरने दो।” तभी मैंने देखा कि शबाब ने हमारे चारों तरफ एक सुरक्षा घेरा बना लिया था और हमलावरों को रोकने के लिए पत्थर फेंक रहे थे।
तब तक आंसू गैस के कारण मेरा दम घुटने लगा था और आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा था। तभी फिलिस्तीनी राहतकर्मी दौड़कर आए, उन्होंने हाइडी को संभाला और एम्बुलेंस में ले गए। रेड क्रेसेंट के एक मेडिकल कर्मी ने मेरा और दूसरों का इलाज किया। मैं अभी ठीक होना शुरू ही हुआ था कि पास में एक और आंसू गैस का गोला आ गिरा।
इसके बाद कुछ देर के लिए राहत मिली, जब हाथ में लाठियां लिए कई हमलावर एक IDF जीप के पीछे जाकर खड़े हो गए।
फिर सैनिक उन नकाबपोश हमलावरों के पास से गुजरते हुए गांव में दाखिल हो गए, जिन्हें वे सुरक्षा दे रहे थे। कुछ ही मिनटों बाद हमें गोलियों की आवाज सुनाई दी। हम आवाज की दिशा में भागे और देखा कि एक व्यक्ति, आबिद अलजाबेर उबैद, जमीन पर दर्द से तड़प रहा था। सैनिकों ने उसे घेर रखा था, और वे उन पैरामेडिक्स पर बंदूकें ताने हुए थे जो उस तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने पत्रकारों को धक्के मारकर दूर भगा दिया और आंद्रे को जमीन पर पटक दिया। द न्यूयॉर्क टाइम्स, जिसके पत्रकारों ने इस पूरी घटना को देखा था, ने बाद में रिपोर्ट दी कि स्थानीय परिषद के 53 वर्षीय सदस्य उबैद सैनिकों से दूर भाग रहे थे, तभी सैनिकों ने उनके पैर में गोली मार दी। इजरायली सेना ने दावा किया कि उबैद एक धारदार चीज लेकर उनकी तरफ भागा था। लेकिन टाइम्स के एक फोटोग्राफर के कैमरे में साफ कैद हुआ कि उबैद भाग रहे थे और उनकी पिछली जेब में सिर्फ पौधों की छंटाई करने वाला एक छोटा लाल प्लास्टिक का औजार (रैक) था। गोली मारने के बाद भी सैनिकों ने उसका पहचान पत्र मांगा और धमकी दी कि जब तक वह आईडी नहीं दिखाएगा, उसे एम्बुलेंस तक नहीं जाने दिया जाएगा।
जब हमलावर और सैनिक आखिरकार अबू फलाह से चले गए, तो कई फिलिस्तीनी वापस जैतून के खेतों में लौट आए और फिर से फसल तोड़ने लगे। इस हमले में दो लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। कम से कम दो अन्य फिलिस्तीनियों की बेरहमी से पिटाई की गई थी, और मेरे सहित अनगिनत लोग पत्थरों और आंसू गैस का शिकार हुए थे। फिर भी, वहाँ का माहौल एक जीत जैसा था। हमलावरों ने धावा बोला था, लेकिन फिलिस्तीनियों ने उन्हें खदेड़ दिया था और अपनी जमीन वापस बचा ली थी।
बाद में, मैं अस्पताल में हाइडी से मिलने गया। मेरी शर्ट पर उनके खून के धब्बे लगे हुए थे। उनकी रीढ़ की हड्डी में चार फ्रैक्चर थे, एक पसली टूट गई थी, एक उंगली लगभग कट चुकी थी, और शरीर पर गंभीर चोटों के निशान थे। डॉक्टरों का मानना था कि एक घाव चाकू से गोदे जाने का भी था। उन्हें सब कुछ याद था। वह बेहद तकलीफ में थीं, फिर भी उन्होंने मेरा हाथ थामा और मुझे अपना “नया दोस्त” कहा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मैं अस्पताल से वापसी के टैक्स भाड़े की रसीद उन्हें भेजूं ताकि वे उसका खर्च दे सकें।

हमने घटना पर बात की। उन्होंने मुझे बताया कि वह भाग रही थीं, तभी अचानक किसी ने उन्हें जमीन पर पटक दिया और उन पर घूंसे व लाठियां बरसने लगीं। उन्होंने हिब्रू भाषा में हमलावरों से रहम की भीख मांगी, उनसे कहा कि उनके बच्चे भी उन्हीं की उम्र के हैं। लेकिन यह दरिंदगी कई मिनटों तक चलती रही। उन्हें लगा कि वे उन्हें मार डालेंगे।
हम इस बात पर सहमत थे कि अगर उनके पास हेलमेट और बुलेटप्रूफ जैकेट न होती, तो उनकी जान जा सकती थी। और सबसे बढ़कर, अगर उन फिलिस्तीनी युवाओं (शबाब) ने आगे आकर अपनी जान पर खेलकर उनकी रक्षा न की होती, तो शायद वे आज जिंदा न होतीं। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सिर्फ पत्थरों से लैस फिलिस्तीनी नौजवानों ने हाइडी लेविन की जान बचाने के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी।
कई लोगों ने सही सवाल उठाया है कि वेस्ट बैंक में इस तरह के हमले रोज होते हैं, लेकिन इस घटना को तवज्जो सिर्फ इसलिए मिल रही है क्योंकि पीड़िता एक अमेरिकी नागरिक हैं। उस दिन गोली का शिकार हुए फिलिस्तीनी शख्स को इस मीडिया कवरेज का एक छोटा सा हिस्सा भी नहीं मिला। न ही उन दर्जनों किसानों को कवरेज मिली जो उसी दिन 6 अलग-अलग जिलों में हुए 34 बस्तियों के हमलों में घायल हुए थे। और न ही हैथम तैसीर को, जिन्हें एक दिन पहले बुरका में पीट-पीटकर अधमरा कर दिया गया था (ऐसे मामलों में, पीड़ित का ‘फिलिस्तीनी’ होना उसके ‘अमेरिकी’ होने की पहचान पर भारी पड़ जाता है)।
लेकिन यहाँ एक और दोहरा रवैया काम कर रहा है। किसी भी अन्य परिस्थिति में, जो लोग किसी को खूंखार भीड़ से बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं, उन्हें उनकी बहादुरी के लिए नायक माना जाता। लेकिन यहाँ, नकाबपोश फिलिस्तीनियों को पत्थर फेंकते देखने भर से ही इजरायल के प्रधानमंत्री समेत अनगिनत लोगों ने साफ वीडियो सबूतों को खारिज कर दिया। उन जांबाज बचाने वालों को ही हमले का उकसाने वाला और ‘आतंकवादी’ साबित करने की कोशिश की जा रही है।

एक दिन बाद, जब झूठे दावों और खोखली निंदाओं का दौर चल रहा था, जालूद गांव में भी ठीक ऐसा ही मंजर दोहराया गया। नकाबपोश हमलावरों ने पहाड़ी की चौकी से नीचे उतरकर स्थानीय किसानों पर हमला करने की कोशिश की, जबकि सैनिक खड़े होकर तमाशा देखते रहे। एक मौके पर, भीड़ ने घाटी में आंद्रे और एडेल का पीछा किया। मैंने घाटी के दूसरी तरफ से यह सब देखा। मैं सैनिकों की तरफ भागा और उनसे हमला रोकने की गुहार लगाई—लेकिन बदले में उन्होंने मुझ पर ही आंसू गैस छोड़ दी। आंद्रे और एडेल की जान तब बची जब शबाब वहाँ पहुंचे और पत्थरों से हमलावरों को पीछे खदेड़ दिया।
मुझे शब्दों को घुमा-फिराकर कहने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती। ये युवा फिलिस्तीनी जो हथियारों से लैस और सेना समर्थित हमलावरों के खिलाफ केवल पत्थरों से अपनी बस्तियों की रक्षा कर रहे हैं, वे किसी हीरो से कम नहीं हैं।
स्रोतःhttps://www.infinitejaz.com/p/the-palestinians-who-rescued-heidi

