कश्मीर की मस्जिदों में एक साथ गूंजा ईमान का संदेश, मीरवाइज ने दिया खुतबा
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, श्रीनगर।
जम्मू कश्मीर में धार्मिक नेतृत्व और मस्जिदों की भूमिका को लेकर जारी चर्चाओं के बीच शुक्रवार को मुत्ताहिदा मजलिस ए उलेमा (एमएमयू) की पहल पर घाटी समेत कई क्षेत्रों की मस्जिदों और इमामबाड़ों में एक ही विषय पर जुमे का खुतबा दिया गया। इस पहल का पहला विषय ईमान यानी आस्था की हिफाजत रखा गया। मीरवाइज ए कश्मीर डॉ. मौलवी मोहम्मद उमर फारूक ने चरार ए शरीफ स्थित हजरत शेख नूरुद्दीन नूरानी की ऐतिहासिक खानकाह में नमाज से पहले खुतबा दिया। इसमें उन्होंने मुसलमानों से अपने विश्वास, नैतिक मूल्यों और उसूलों पर कायम रहने की अपील की।
एमएमयू के अनुसार, इस साझा खुतबे का उद्देश्य धार्मिक जागरूकता बढ़ाना, समुदाय के सामने मौजूद सामाजिक और नैतिक चुनौतियों पर चर्चा करना तथा विभिन्न धार्मिक विचारधाराओं के बीच साझा मुद्दों पर संवाद को मजबूत करना है। संगठन की इस पहल में कश्मीर घाटी के साथ जम्मू, चिनाब घाटी, करगिल और लेह की मस्जिदों तथा इमामबाड़ों को भी शामिल किया गया।
हालांकि, एक जैसे खुतबे को लेकर जम्मू कश्मीर वक्फ बोर्ड की ओर से भी पहल किए जाने की चर्चा रही है। उपलब्ध विवरणों के मुताबिक, वक्फ बोर्ड की ओर से प्रस्तावित विषय और एमएमयू की ओर से चुने गए विषय अलग थे। इस कारण धार्मिक संस्थानों के बीच खुतबे की विषयवस्तु को लेकर अंतर भी चर्चा में आया। इस घटनाक्रम को समझने के लिए दोनों पहलों के आधिकारिक निर्देशों और उनके उद्देश्यों की अलग अलग पुष्टि करना जरूरी है।
15 सितंबर की उलेमा कॉन्फ्रेंस में बनी थी योजना
एमएमयू की यह पहल 15 सितंबर को आयोजित उलेमा कॉन्फ्रेंस में लिए गए फैसलों का हिस्सा बताई गई है। इस सम्मेलन में विभिन्न धार्मिक विचारधाराओं से जुड़े विद्वानों और प्रतिनिधियों ने धार्मिक तथा सामाजिक मुद्दों पर मिलकर काम करने की जरूरत पर जोर दिया था।
सम्मेलन में यह सहमति बनी कि जुमे के खुतबों, जिला स्तर के कार्यक्रमों और लगातार चलने वाले सामुदायिक जागरूकता अभियानों के माध्यम से लोगों तक जरूरी संदेश पहुंचाए जाएंगे। इसके तहत ऐसे विषय चुने जाएंगे जो मुस्लिम समाज के धार्मिक जीवन, नैतिक जिम्मेदारियों और सामाजिक व्यवहार से जुड़े हों।
ईमान को पहले साझा विषय के रूप में चुनने के पीछे भी यही सोच बताई गई। इस्लामी मान्यता में ईमान व्यक्ति के धार्मिक जीवन की बुनियाद है। एमएमयू का मानना है कि इस विषय पर सामूहिक चर्चा से लोगों को अपने विश्वास के अर्थ और उससे जुड़ी जिम्मेदारियों को समझने का अवसर मिलेगा।
इस पहल का एक दूसरा पहलू विभिन्न मसलकों के बीच साझा आधार तलाशना भी है। मुस्लिम समाज में धार्मिक व्याख्याओं और फिक्ही मतों को लेकर अंतर मौजूद हैं। ऐसे में ईमान जैसे बुनियादी विषय पर एक साथ बात करना समुदाय के भीतर संवाद और सहयोग की संभावना को सामने लाता है।
चरार ए शरीफ की ऐतिहासिक खानकाह से मीरवाइज का संदेश
मीरवाइज ए कश्मीर डॉ. मौलवी मोहम्मद उमर फारूक ने चरार ए शरीफ में हजरत शेख नूरुद्दीन नूरानी रहमतुल्लाह अलैह की ऐतिहासिक खानकाह में जुमे का खुतबा दिया। कश्मीर में शेख नूरुद्दीन नूरानी को अलमदार ए कश्मीर के नाम से भी जाना जाता है। उनकी आध्यात्मिक विरासत का क्षेत्र के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में विशेष स्थान है।
अपने खुतबे में मीरवाइज ने कहा कि ईमान केवल जुबान से किसी बात को स्वीकार कर लेने का नाम नहीं है। इसका प्रभाव इंसान के पूरे जीवन में दिखाई देना चाहिए। उसके चरित्र, व्यवहार, फैसलों और दूसरे लोगों के साथ उसके संबंधों में आस्था की झलक मिलनी चाहिए।
उन्होंने कुरान की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि अल्लाह पर विश्वास, पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शिक्षाओं का अनुसरण और कुरान से मार्गदर्शन प्राप्त करना ईमान की बुनियादी शर्तों में शामिल हैं।
मीरवाइज के अनुसार, अल्लाह पर विश्वास इंसान के भीतर जवाबदेही की भावना पैदा करता है। पैगंबर की शिक्षाएं नैतिक आचरण और जीवन के फैसलों में मार्गदर्शन देती हैं। वहीं, कुरान सत्य, न्याय और नेकी के रास्ते को समझने में मदद करता है।
उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि धार्मिक आस्था को केवल व्यक्तिगत पहचान तक सीमित न रखें। इसे अपने दैनिक जीवन और सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बनाएं।
धन, पद और निजी लाभ के लिए ईमान से समझौता नहीं
खुतबे में मीरवाइज ने दुनियावी प्रलोभनों और दबावों के बीच अपने उसूलों पर कायम रहने की जरूरत पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि ईमान इंसान के पास मौजूद सबसे कीमती अमानतों में से एक है। इसे धन, पद, प्रभाव या निजी लाभ के बदले नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
उन्होंने कुरान की उन शिक्षाओं का संदर्भ दिया जिनमें ईश्वरीय मार्गदर्शन को मामूली सांसारिक लाभ के लिए छोड़ने से सावधान किया गया है। उनके अनुसार, किसी भी व्यक्ति के सामने ऐसी परिस्थितियां आ सकती हैं जब सत्य और निजी हित के बीच चुनाव करना पड़े। उस समय उसके विश्वास और नैतिकता की असली परीक्षा होती है।
मीरवाइज ने कहा कि दुनिया में रहना, जायज अवसरों का लाभ उठाना और आर्थिक तरक्की करना गलत नहीं है। लेकिन इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अपने जमीर और सिद्धांतों से समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
यह संदेश केवल धार्मिक कर्मकांडों तक सीमित नहीं है। इसका संबंध कारोबार, नौकरी, सामाजिक संबंधों और सार्वजनिक जीवन में लिए जाने वाले फैसलों से भी है। किसी व्यक्ति की आस्था का आकलन उसके दावों के साथ साथ उसके आचरण से भी होता है।
इस्तिकामत का अर्थ कट्टरता नहीं, सिद्धांतों पर दृढ़ता है
मीरवाइज ने अपने खुतबे में इस्तिकामत यानी दृढ़ता की अवधारणा को भी समझाया। उन्होंने कहा कि ईमान का दावा करना शुरुआत है। कठिन परिस्थितियों, सामाजिक दबावों और बदलते हालात के बीच अपने सिद्धांतों पर कायम रहना अधिक महत्वपूर्ण है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि दृढ़ता का अर्थ कट्टरता या टकराव नहीं है। इसके बजाय, इसमें समझदारी, धैर्य, गरिमा और नैतिक साहस की जरूरत होती है। किसी व्यक्ति को अपने विश्वास पर कायम रहते हुए दूसरों के साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।
यह अंतर आज के सामाजिक माहौल में खास महत्व रखता है। धार्मिक प्रतिबद्धता और दूसरे विचारों के प्रति असहिष्णुता को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता। अपने उसूलों पर कायम रहने के साथ दूसरों की बात सुनना और शांतिपूर्ण संवाद बनाए रखना भी सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
मीरवाइज के संदेश का एक प्रमुख पहलू यही था कि ईमान को इंसान के व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। धार्मिक मंच से दी जाने वाली शिक्षा तभी सार्थक होगी जब उसका असर व्यक्तिगत जीवन और समाज के भीतर संबंधों पर भी पड़े।
युवाओं के सामने नई चुनौतियां
खुतबे में मीरवाइज ने युवा पीढ़ी के सामने मौजूद चुनौतियों पर भी चिंता जताई। उन्होंने भौतिकवाद, सोशल मीडिया के गलत इस्तेमाल, नैतिक उलझनों और धार्मिक जागरूकता में कमी जैसे मुद्दों का उल्लेख किया।
आज इंटरनेट और सोशल मीडिया ने युवाओं के लिए जानकारी हासिल करने के कई रास्ते खोले हैं। लेकिन इसी माध्यम से भ्रामक सूचनाएं, सतही विचार और गलत जानकारी भी तेजी से फैलती हैं। ऐसे माहौल में धार्मिक विषयों को समझने के लिए विश्वसनीय स्रोतों, अध्ययन और विवेकपूर्ण सोच की जरूरत होती है।
मीरवाइज ने माता पिता, शिक्षकों, उलेमा और धार्मिक संस्थानों से अपील की कि वे युवाओं की धार्मिक शिक्षा और नैतिक विकास को साझा प्राथमिकता बनाएं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि युवाओं को सवाल पूछने से रोका नहीं जाना चाहिए। उन्हें ज्ञान, समझ और करुणा के माध्यम से अपने सवालों के जवाब तलाशने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
युवाओं के साथ संवाद का यह तरीका धार्मिक शिक्षा को अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर सकता है। केवल उपदेश देने के बजाय उनकी चिंताओं को सुनना, उनके सवालों को समझना और उन्हें उचित मार्गदर्शन उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
मिंबर की जिम्मेदारी पर भी दिया जोर
एमएमयू की साझा खुतबा पहल का उल्लेख करते हुए मीरवाइज ने कहा कि ईमान को पहला विषय इसलिए चुना गया क्योंकि यह मुस्लिम उम्मत को जोड़ने वाला बुनियादी तत्व है। उनके अनुसार, विभिन्न मसलकों और धार्मिक व्याख्याओं के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन ईमान जैसे बुनियादी विषय पर साझा समझ विकसित करने की गुंजाइश मौजूद है।
उन्होंने मस्जिद के मिंबर यानी उपदेश देने के मंच की जिम्मेदारी पर भी जोर दिया। मीरवाइज के अनुसार, मिंबर एक अमानत है। उस पर बैठने वाले उलेमा और इमामों को अपने आचरण में ईमानदारी और दृढ़ता की मिसाल पेश करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि धार्मिक मंच का इस्तेमाल ईमान को मजबूत करने, समाज का मार्गदर्शन करने और लोगों को करीब लाने के लिए होना चाहिए। इसे लोगों के बीच फूट या विभाजन बढ़ाने का माध्यम नहीं बनना चाहिए।
यह विचार धार्मिक नेतृत्व की सामाजिक भूमिका की ओर भी ध्यान दिलाता है। मस्जिदें केवल इबादत की जगह नहीं हैं। वे शिक्षा, नैतिक मार्गदर्शन और सामुदायिक संवाद के महत्वपूर्ण केंद्र भी हैं। ऐसे में खुतबे की विषयवस्तु और उसे प्रस्तुत करने का तरीका लोगों की सोच तथा सामाजिक व्यवहार को प्रभावित कर सकता है।
साझा खुतबे की पहल का आगे क्या होगा?
एमएमयू की ओर से शुरू की गई इस पहल का अगला प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि साझा विषयों पर चर्चा कितनी नियमित रहती है और उनका संदेश समुदाय तक किस तरह पहुंचता है। यदि जिला स्तर के कार्यक्रमों, मस्जिदों और शैक्षिक संस्थानों में इन मुद्दों पर निरंतर संवाद होता है, तो धार्मिक जागरूकता के साथ सामाजिक जिम्मेदारियों पर भी चर्चा आगे बढ़ सकती है।
इस पहल के सामने एक चुनौती विभिन्न धार्मिक विचारधाराओं के बीच संतुलन बनाए रखने की भी होगी। साझा खुतबे तभी व्यापक स्वीकार्यता हासिल कर सकते हैं जब उनकी विषयवस्तु स्पष्ट हो और अलग अलग क्षेत्रों की धार्मिक तथा सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाए।
शुक्रवार को ईमान पर दिया गया साझा खुतबा इसी व्यापक प्रयास का पहला कदम बताया गया है। मीरवाइज का संदेश आस्था की रक्षा, नैतिक मूल्यों, युवाओं के मार्गदर्शन और धार्मिक मंच की जिम्मेदारी पर केंद्रित रहा। अब इस पहल की निरंतरता और समुदाय की भागीदारी यह तय करेगी कि इसका असर कश्मीर घाटी और जम्मू कश्मीर के दूसरे क्षेत्रों में कितना व्यापक होता है।
MMU Launches First Coordinated Friday Khutbah Across Kashmir Valley, Jammu, Chenab Valley, Kargil and Leh Imaan chosen as first common theme across participating mosques and Imambargahs; @MirwaizKashmir at Charar-e-Sharief calls for safeguarding faith and steadfastness Srinagar, October 16, 2026: Initiating the drive aimed at strengthening religious awareness and addressing pressing concerns among the community, Mutahida Majlis-e-Ulema Jammu & Kashmir (MMU) today delivered first coordinated Friday sermon across participating mosques and Imambargahs in Kashmir Valley, Jammu, Chenab Valley, Kargil and Leh, with Imaan (Faith) chosen as the first common theme. The initiative follows the decisions taken at the September 15 MMU Ulema Conference, where prominent religious scholars and representatives of various various schools of thought agreed to collectively address important religious and social issues through designated Friday sermons, district-level engagements and sustained community awareness and action plans. As part of this initiative, Mirwaiz-e-Kashmir Dr Moulvi Mohammad Umar Farooq, delivered the Friday sermon at the historic Khanqah of Hazrat Sheikh Noor-ud-Din Noorani (RA), Alamdar-e-Kashmir, at Charar-e-Sharief, emphasising the importance of safeguarding Imaan and remaining steadfast in one’s faith and principles, particularly in the face of worldly temptations, pressures and challenges. Addressing the congregation, Mirwaiz said that faith is not merely a verbal declaration but the foundation of a believer’s entire life, reflected in one’s character, conduct, decisions and dealings with others. Referring to the Quranic injunction to believe in Allah, His Messenger ﷺ and the divine light revealed through the Holy Quran, Mirwaiz said these constitute the essential foundations of faith. Belief in Allah creates a sense of accountability, following the Prophet ﷺ provides moral and practical guidance, while the Quran illuminates the path of truth and righteousness. Mirwaiz particularly stressed that faith is the most precious trust bestowed upon a believer and must never be compromised for worldly interests. Pointing to the Quranic warning against exchanging divine guidance for a paltry price, he said that no amount of wealth, position, influence, personal gain or worldly favour can justify compromising one’s faith, conscience or principles. “A believer may live in this world and pursue its legitimate opportunities, but must never make worldly interests the price of his faith,” Mirwaiz said, adding that the real test of Imaan comes when truth and personal interest, principle and expediency, or conscience and pressure come into conflict. Emphasising Istiqamat (steadfastness), Mirwaiz said that professing faith is only the beginning; remaining firm upon it through changing circumstances and difficulties is its real test. Steadfastness, he said, does not mean rigidity or confrontation, but upholding truth and principles with wisdom, patience, dignity and moral courage. Expressing concern over the challenges confronting younger generations, including materialism, misuse of social media, moral confusion and weakening religious awareness, Mirwaiz urged parents, teachers, Ulema and religious institutions to make protection and nurturing of faith a collective priority. He said young people must be encouraged to ask questions and seek guidance through knowledge, understanding and compassion. Referring to the wider MMU initiative, Mirwaiz said Imaan was deliberately chosen as the first common theme because faith is the fundamental bond that unites the Muslim Ummah, transcending differences of Maslak and religious interpretation. He said that as the Mimbar is an Amanah, Ulema and Imams must themselves exemplify the integrity and steadfastness they preach and use the pulpit to strengthen faith, guide society and bring people closer , rather than make it a source to promote division among them
— Mirwaiz Manzil-Office of Mirwaiz-e-Kashmir (@mirwaizmanzil) October 16, 2026
प्रश्न और उत्तर
प्रश्न: कश्मीर में साझा जुमे का खुतबा किसने आयोजित किया?
उत्तर: उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मुत्ताहिदा मजलिस ए उलेमा (एमएमयू) ने कश्मीर घाटी, जम्मू, चिनाब घाटी, करगिल और लेह की मस्जिदों तथा इमामबाड़ों में साझा विषय पर खुतबा देने की पहल की।
प्रश्न: मीरवाइज उमर फारूक ने खुतबे में किस विषय पर बात की?
उत्तर: मीरवाइज ने ईमान की हिफाजत, नैतिक मूल्यों, दुनियावी प्रलोभनों के बीच सिद्धांतों पर कायम रहने और युवाओं के धार्मिक मार्गदर्शन पर जोर दिया।
प्रश्न: साझा खुतबे के लिए ईमान को पहला विषय क्यों चुना गया?
उत्तर: एमएमयू के अनुसार, ईमान मुस्लिम समुदाय की बुनियादी धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा है और विभिन्न मसलकों के बीच साझा आधार प्रदान करता है।

