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विदेश नीति में भ्रम का परिणाम: हर मोर्चे पर असहज स्थिति में भारत !

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा और वहां चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से संभावित मुलाकात को लेकर इस समय सोशल मीडिया पर बहस तेज़ है। यह बहस केवल एक दौरे तक सीमित नहीं है, बल्कि मोदी सरकार की विदेश नीति को लेकर गहरे असंतोष और असमंजस का भी संकेत देती है। गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों की शहादत, चीनी आक्रामकता, और हाल ही में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान चीन-पाकिस्तान गठजोड़ जैसी घटनाएं अब मोदी सरकार के सामने कठोर सवाल बनकर खड़ी हैं।

दरअसल, यह स्थिति इसलिए भी बनी है क्योंकि भारत की विदेश नीति में निरंतरता और स्पष्टता का अभाव रहा है। एक ओर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मित्रता की बातें होती रहीं, वहीं दूसरी ओर जब परिस्थितियाँ बदलीं तो उसी अमेरिका से दूरी बना ली गई। अब उसी कूटनीतिक असमंजस के बीच भारत चीन की ओर झुकाव दिखा रहा है — वह भी तब, जब चीन पाकिस्तान का रणनीतिक सहयोगी रहा है और दोनों मिलकर भारत के खिलाफ कई मोर्चों पर सक्रिय हैं।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के समय पाकिस्तान द्वारा तुर्की ड्रोन के इस्तेमाल पर भारत ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी। यहां तक कि तुर्की के बहिष्कार की आवाज़ें भी सुनाई दी थीं। लेकिन अब उससे भी अधिक खतरनाक विरोधी — चीन — के साथ भारत संबंध सुधारने की पहल कर रहा है। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है। गलवान में शहीद हुए जवानों की तस्वीरें, पुराने भाषण और बयान वायरल हो रहे हैं। लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह सब भुला दिया गया?

यह सिर्फ एक राजनीतिक असहमति नहीं, बल्कि एक गंभीर कूटनीतिक अस्थिरता का प्रतीक है। पिछले 10-12 वर्षों में भारत की विदेश नीति में ऐसा कोई स्पष्ट मार्गदर्शन नहीं दिखा है जिससे यह पता चले कि देश का दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टिकोण क्या है? एक समय रूस के साथ तेल खरीदने के लिए गठजोड़ किया गया, जिससे अमेरिका नाराज हो गया और भारत को 50% से अधिक आयात शुल्क झेलना पड़ा। परंतु भारत की जनता को इस सस्ते तेल का कोई लाभ नहीं मिल पाया।

इसी प्रकार, इज़रायल से मित्रता निभाने की चाह में भारत ने ईरान और फिलिस्तीन जैसे पुराने मित्र देशों के साथ अपने संबंधों में ठंडापन ला दिया। जबकि इज़रायल से मिली सैन्य और तकनीकी सहायता का लाभ अपेक्षा से काफी कम रहा। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या भारत अपनी विदेश नीति में स्थायित्व और स्पष्ट दिशा विकसित करने में असफल रहा है?

बात केवल इज़रायल, ईरान या रूस तक ही सीमित नहीं है। हाल के वर्षों में भारत ने खाड़ी देशों से भी नज़दीकियाँ बढ़ाई हैं, परंतु जब ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारत को समर्थन की ज़रूरत थी, तब अधिकांश अरब देश तटस्थ ही रहे। ऐसी दोस्ती का क्या मूल्य, जो संकट के समय साथ न दे सके?

अब एक नया संकट सिर उठा रहा है — चीन के साथ संबंधों में सुधार की संभावनाएं अगर सच होती हैं, तो इसका सीधा असर भारत-अमेरिका संबंधों पर पड़ेगा। अमेरिका पहले से ही रूस से भारत के ऊर्जा और सैन्य व्यापार को लेकर असंतुष्ट है। ट्रंप प्रशासन के तेवर लगातार सख्त होते जा रहे हैं और यह आशंका है कि भविष्य में और प्रतिबंधात्मक कदम उठाए जा सकते हैं।

इन परिस्थितियों में भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि उसे अब क्या करना चाहिए? सबसे पहला कदम यह होना चाहिए कि वह अपने पुराने, भरोसेमंद मित्रों — जैसे ईरान, रूस, फिलिस्तीन और अन्य पड़ोसी देशों — के साथ रिश्तों को मज़बूती से पुनः स्थापित करे। साथ ही नेपाल, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों के साथ बिगड़ते संबंधों को सुधारने की आवश्यकता है। इन देशों के साथ संवाद और सहयोग से ही क्षेत्रीय स्थिरता कायम हो सकती है।

दूसरा, भारत को अमेरिका या चीन जैसी वैश्विक महाशक्तियों की ओर झुकने के बजाय संतुलन की नीति अपनानी चाहिए। एक स्वतंत्र और तटस्थ विदेश नीति ही भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को कायम रख सकती है। हमें यह समझना होगा कि अभी भारत की आर्थिक, सैन्य और राजनीतिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह सभी वैश्विक शक्तियों से टकराव मोल ले सके।

कुल मिलाकर, भारत को अब अपनी विदेश नीति की मूल अवधारणाओं पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। शॉर्ट टर्म रणनीति के बजाय दीर्घकालिक कूटनीतिक सोच विकसित करनी होगी — ऐसी सोच जो दोस्त और दुश्मन की पहचान स्पष्ट करे, जो राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखे और जो संकट के समय देश की गरिमा की रक्षा कर सके। विदेश नीति कोई प्रयोगशाला नहीं है, जहां हर दिन प्रयोग किए जाएं — यह एक ठोस, दूरदर्शी और स्थिर दृष्टिकोण की मांग करती है। यही नीति आज के भारत की सबसे बड़ी ज़रूरत है।