रहस्यमय रूहों की राही: राणा सफ़वी की बुख़ारा तक की सूफ़ी यात्रा
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो | नई दिल्ली
इतिहास की गहराइयों से जब कोई रूह संवाद करती है, तो वह सिर्फ़ क़लम नहीं चलाती — वह ज़माने को जीती है। राणा सफ़वी ऐसी ही एक लेखिका हैं, जो सूफ़ी रहस्यवाद की खुशबू को सूंघती नहीं, उसमें साँस लेती हैं।
जब वे अपनी चर्चित पुस्तक “In Search of the Divine: Living Histories of Sufism in India” लिख रही थीं, तब उन्होंने भारत की दरगाहों की खाक छानी। अजमेर, अमरोहा, दिल्ली, देवबंद — न जाने कितने शहर, न जाने कितनी मजारें। लेकिन उस समय उन्होंने यह कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन वे भारत की सीमाओं को पार कर बुख़ारा की पवित्र ज़मीन पर क़दम रखेंगी — उस दरगाह पर, जहां नक्शबंदी सूफ़ी सिलसिले की रूह बसती है।
“बुलावा आया था…”
शेख़ बहाउद्दीन नक्शबंदी की दरगाह पर हाज़िरी देने के बाद उन्होंने लिखा:
“ऐसी जगहें बुलाती हैं — वहाँ पाँव खुद नहीं जाते। बुलावे के बग़ैर कोई वहाँ तक नहीं पहुँचता।”
यह पंक्ति सिर्फ़ एक ट्वीट नहीं थी, यह एक सूफ़ी अनुभव की जीवंत झलक थी।

श्रद्धा, शोध और संतुलन की त्रयी
राणा सफ़वी की सबसे बड़ी ताक़त यह है कि उन्होंने कभी सूफ़ी परंपराओं को केवल एक पर्यटक की नज़र से नहीं देखा। उन्होंने न तो उसे अंधभक्ति से ढका, न ही आलोचनात्मक दुराग्रह से। सैकड़ों दरगाहों की यात्राओं के बावजूद, उनका दृष्टिकोण एक शोधकर्ता की जिज्ञासा, एक इतिहासकार की वस्तुनिष्ठता और एक साधिका की श्रद्धा से बना रहा।
गंगा-जमुनी तहज़ीब की क़लमकार
राणा सफ़वी इतिहास की छात्रा ही नहीं, उसकी दूत भी हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर एडवांस्ड स्टडीज़ से मध्यकालीन इतिहास में स्नातकोत्तर करने के बाद, उन्होंने शिक्षा में हाथ आज़माया। पर असली पहचान मिली उन्हें तब, जब उन्होंने 58 वर्ष की उम्र में अपनी पहली पुस्तक “Where Stones Speak: Historical Trails in Mehrauli” प्रकाशित की।
उसके बाद तो जैसे उनकी लेखनी को इतिहास की गलियों में रास्ता मिल गया:
- दिल्ली के भूले-बिसरे शहर
- क़ुरआन और हदीस की कहानियाँ
- ज़हीर देहलवी की दास्तान-ए-ग़दर और असर-उस-सनादीद का अनुवाद
- और हालिया उपन्यास: “स्वर्ग में आग का तूफ़ान”
डिजिटल दौर में विरासत की रक्षक
राणा सफ़वी मानती हैं कि ज्ञान बाँटना, ज्ञान पाना ही असली इबादत है। सोशल मीडिया उनके लिए केवल एक मंच नहीं, बल्कि एक विरासत-संवाद है।
- उनका ब्लॉग ‘हज़रत-ए-दिल्ली’, दिल्ली की विरासत, संस्कृति और खानपान का एक जीवंत संग्रह है।
- वे #शायर नामक पहल की संस्थापक हैं — जो उर्दू शायरी को लोकप्रिय बनाने का मिशन है।
- उनका वायरल वीडियो “उर्दू सिर्फ़ मुसलमानों की नहीं थी”, जिसने इंटरनेट पर 6.3 लाख से अधिक लोगों को भावुक किया, इस बात का प्रमाण है कि विरासत और भाषा की बातें दिलों को छूती हैं।
स्तंभकार से संस्कृति-संरक्षक तक
राणा सफ़वी द हिंदू और डेली ओ जैसी प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में नियमित लेखिका हैं, और उनकी कलम से निकले लेख देश की सामूहिक चेतना को संवेदना देते हैं।
When i was writing In Search of The Divine: Living Histories of Sufism in India, I described the history and rise of Sufism and its spread to India. .
— Rana Safvi رعنا राना (@iamrana) May 23, 2023
I visited hundreds of shrines in India.
At that time I never thought I would be able to visit shrines outside India.… pic.twitter.com/n1gycFII8A
राणा सफ़वी: वह हीरा जो इतिहास की राख़ में चमकता है
“हीरा है सदा के लिए” श्रृंखला में राणा सफ़वी केवल एक लेखक नहीं — वे उस नर्म लेकिन मज़बूत रौशनी की तरह हैं जो अंधेरों को चीरती है।
उनकी ज़ुबान में तहज़ीब है, उनकी सोच में समावेश और उनकी यात्रा में रूहानियत।
जुड़े रहिए मुस्लिम नाउ के साथ — क्योंकि यह सिलसिला सिर्फ़ इतिहास का नहीं, हस्ती का भी है।

