Culture

विलुप्त होती रफूगरी की कला और शाहिद हुसैन की संघर्ष भरी कहानी

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

कभी हर गली-मुहल्ले में रफूगरों की धागों से गूंथी हुई कहानियाँ बिखरी रहती थीं। पुराने वक्त में जब कपड़े फटते थे, तो उन्हें फेंका नहीं जाता था, बल्कि रफू के जादू से उन्हें नया जीवन मिलता था। रफू की इतनी बारीक कला हुआ करती थी कि कपड़े पर सिलाई तक नजर नहीं आती थी। लेकिन आज यह पारंपरिक शिल्प लगभग विलुप्त होने की कगार पर है।

कहाँ खो गई रफूगरी की कला?

शहरों से लेकर गांवों तक, हर कोने में कभी न कभी एक ऐसा कुशल रफूगर जरूर होता था, जिसकी कला पर लोग दांतों तले उंगली दबा लेते थे। वह कपड़े के ही धागे निकालकर इतनी सफाई से सिलाई करता था कि किसी को अंदाजा भी नहीं होता कि कपड़ा कभी फटा भी था। लेकिन जैसे-जैसे फैशन उद्योग और उपभोक्तावाद हावी हुआ, इस कला की मांग घटती गई। अब लोग पुराने कपड़ों को सीधे कचरे में डाल देते हैं या किसी बड़े टेलर से सिलवा लेते हैं, जिससे कपड़े की मरम्मत के बजाय उसकी सुंदरता ही खत्म हो जाती है।

रफूगरों की आखिरी पीढ़ी: शाहिद हुसैन की कहानी

शाहिद हुसैन जैसे कारीगर आज इस कला की आखिरी पीढ़ी के रूप में बचे हैं। वह कहते हैं, “हमारा पूरा दिन मेहनत में चला जाता है, लेकिन बदले में जो मिलता है, वह नाममात्र ही होता है। नयी पीढ़ी अब इस पेशे को अपनाने में रुचि नहीं रखती, क्योंकि इसमें मेहनत अधिक और कमाई कम है।”

शाहिद हुसैन, जिन्हें लोग ‘जननभाई’ के नाम से भी जानते हैं, अब गिने-चुने बड़े आयोजनों में ही अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं, जैसे कि महिंद्रा सनतकदा महोत्सव का शिल्प बाजार। यहां उनके पास कुछ ग्राहक आते हैं, जो इस विलुप्त होती कला के प्रति संवेदनशील हैं, लेकिन यह संख्या इतनी नहीं कि इस पेशे को फिर से जीवित किया जा सके।

रफूगरों के हुनर की अनदेखी

आज के दौर में, जब ‘सस्टेनेबिलिटी’ (टिकाऊ फैशन) और ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ जैसे शब्द ट्रेंड कर रहे हैं, तब रफूगरों की यह पारंपरिक कला सबसे ज्यादा प्रासंगिक हो सकती थी। लेकिन विडंबना यह है कि उन्हें न तो समाज से कोई मान्यता मिलती है, न ही कोई सरकारी सहयोग।

जल्दबाजी में बदलते फैशन और रेडीमेड कपड़ों के बाजार ने रफूगरों के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है। पहले जिन लोगों के पास यह कला थी, वे अब मजबूर होकर दूसरे कामों में लग गए हैं। युवा पीढ़ी इस पेशे को अपनाने से कतराती है, क्योंकि उन्हें इसमें भविष्य नजर नहीं आता।

कहानियाँ बदल सकती हैं नज़रिया

मैं लंबे समय से लुप्त होती पारंपरिक कलाओं और कारीगरों का दस्तावेजीकरण कर रहा हूँ। मेरा मानना है कि जब हम इन कहानियों को साझा करते हैं, तो हम इस ओर ध्यान आकर्षित कर सकते हैं।

अगर आप कभी किसी रफूगर से मिलें, तो उनसे ज़रूर बात करें, उनके हुनर की सराहना करें और उन्हें बताएं कि उनकी कला अब भी मूल्यवान है।

यह सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा और धैर्य की कहानी है। अगर यह कहानी आपको छूती है, तो इसे साझा करें, ताकि अधिक से अधिक लोग इस अनमोल धरोहर की अहमियत को समझें। क्योंकि कहानियाँ सच में नज़रिया बदल सकती हैं।