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तुर्की और इजरायल में जंग का खतरा कितना बढ़ा?

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, रियाद।

तुर्की और इजरायल के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। गाजा युद्ध के बाद दोनों देशों के रिश्ते पहले ही बेहद खराब हो चुके थे। अब तुर्की की ओर से इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ कार्रवाई की घोषणा ने विवाद को और गहरा कर दिया है।

ऐसे में पश्चिम एशिया में एक सवाल तेजी से उठ रहा है। क्या ईरान के बाद तुर्की और इजरायल के बीच भी सीधा सैन्य टकराव हो सकता है? अगर ऐसा हुआ तो क्या पाकिस्तान और सऊदी अरब तुर्की के साथ खड़े होंगे?

इन सवालों का जवाब अभी साफ नहीं है। दोनों देशों के बीच बयानबाजी काफी तीखी है। लेकिन बयानबाजी और सीधे युद्ध के बीच लंबा अंतर होता है। तुर्की नाटो का सदस्य है। इजरायल को अमेरिका का मजबूत समर्थन हासिल है। इसलिए दोनों के बीच किसी सीधे युद्ध के परिणाम केवल इन दो देशों तक सीमित नहीं रहेंगे।

नेतन्याहू के खिलाफ तुर्की की कार्रवाई

तुर्की ने गाजा युद्ध को लेकर इजरायल के खिलाफ अपना रुख लगातार कड़ा रखा है। तुर्की के न्याय मंत्री अकिन गुरलेक ने नेतन्याहू और एक अन्य इजराइली नागरिक के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही है।

तुर्की सरकार का आरोप है कि गाजा में इजरायली सैन्य कार्रवाई के दौरान गंभीर अंतरराष्ट्रीय अपराध हुए हैं। इनमें मानवता के खिलाफ अपराध, नरसंहार, यातना, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और लोगों को गंभीर रूप से स्वतंत्रता से वंचित करने जैसे आरोप शामिल हैं।

तुर्की का कहना है कि वह गाजा में कथित अपराधों के लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह बनाने की कोशिश जारी रखेगा।

यह कदम केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं है। इसके पीछे स्पष्ट राजनीतिक संदेश भी है। अंकारा यह दिखाना चाहता है कि वह गाजा के मुद्दे पर इजरायल के खिलाफ अपनी नीति से पीछे हटने वाला नहीं है।

इजरायल ने एर्दोगन को बताया ‘यहूदी विरोधी तानाशाह’

तुर्की की कार्रवाई पर इजरायल की प्रतिक्रिया भी बेहद तीखी रही। इजरायल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन पर गंभीर आरोप लगाए।

इजरायल ने एर्दोगन को ‘यहूदी विरोधी तानाशाह’ बताया। साथ ही कहा कि तुर्की की ओर से क्षेत्र को अस्थिर करने की कोशिशों के खिलाफ इजरायल कार्रवाई जारी रखेगा।

इस बयान ने दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा दिया है।

एर्दोगन लंबे समय से गाजा में इजरायली सैन्य अभियान की आलोचना करते रहे हैं। उन्होंने कई मौकों पर नेतन्याहू सरकार के खिलाफ कठोर भाषा का इस्तेमाल किया है। तुर्की ने इजरायल के साथ अपने संबंधों को भी काफी हद तक सीमित किया है।

अब दोनों देशों के बीच राजनीतिक बयान सीधे टकराव की भाषा तक पहुंचते दिखाई दे रहे हैं।

‘तुर्की को ईरान समझने की भूल न करें’

तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन की ओर से भी इजरायल को कड़ा संदेश दिया गया है। एर्दोगन ने इजरायल को चेतावनी देते हुए कहा कि तुर्की को ईरान समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।

यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि हाल के वर्षों में इजरायल और ईरान के बीच सीधे सैन्य हमले हुए हैं। ईरान के खिलाफ इजरायल की सैन्य कार्रवाई और उसके जवाब में ईरानी हमलों ने पश्चिम एशिया की स्थिति को बेहद संवेदनशील बना दिया है।

एर्दोगन का संदेश साफ तौर पर इजरायल को यह बताने की कोशिश था कि तुर्की की सैन्य और रणनीतिक स्थिति ईरान से अलग है।

हालांकि, इससे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि तुर्की और इजरायल युद्ध की तैयारी कर रहे हैं।

क्या तुर्की को पाकिस्तान और सऊदी अरब का समर्थन मिलेगा?

तुर्की और इजरायल के तनाव के बीच पाकिस्तान और सऊदी अरब का नाम भी चर्चा में है। तीनों देशों के बीच सुरक्षा और रक्षा सहयोग बढ़ने की खबरों ने इस बहस को और हवा दी है।

हाल में तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सैन्य सहयोग को लेकर चर्चाएं तेज हुई हैं। इसी वजह से कुछ विश्लेषक इसे पश्चिम एशिया और मुस्लिम दुनिया में एक नए सुरक्षा ढांचे के रूप में देख रहे हैं।

सोशल मीडिया और कुछ राजनीतिक चर्चाओं में इसे ‘इस्लामिक नाटो’ तक कहा जा रहा है। हालांकि इस तरह की तुलना को लेकर सावधानी जरूरी है। तीन देशों के बीच सुरक्षा सहयोग को सीधे नाटो जैसे औपचारिक सैन्य गठबंधन के बराबर मानना अभी उचित नहीं होगा।

बांग्लादेश की संभावित दिलचस्पी की खबरों ने भी इस चर्चा को बढ़ाया है। लेकिन किसी भी नए सैन्य गठबंधन का वास्तविक स्वरूप तभी स्पष्ट होगा जब उसकी औपचारिक शर्तें और सदस्यता सामने आएगी।

क्या पाकिस्तान तुर्की के साथ युद्ध में उतरेगा?

यह सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है। पाकिस्तान और तुर्की के बीच लंबे समय से करीबी रक्षा संबंध हैं। दोनों देशों ने सैन्य प्रशिक्षण, रक्षा उद्योग और सुरक्षा सहयोग के क्षेत्र में संबंध मजबूत किए हैं।

लेकिन किसी समझौते का अर्थ यह नहीं होता कि किसी तीसरे देश के साथ युद्ध शुरू होते ही दूसरा देश स्वतः युद्ध में शामिल हो जाएगा।

युद्ध की स्थिति में पाकिस्तान का फैसला उसकी अपनी सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर निर्भर करेगा। भारत, अमेरिका, चीन, ईरान और खाड़ी देशों के साथ पाकिस्तान के संबंध भी इस फैसले को प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए अभी यह कहना कि तुर्की और इजरायल के बीच युद्ध होने पर पाकिस्तान सीधे सैन्य कार्रवाई करेगा, एक अनुमान ही होगा।

सऊदी अरब की स्थिति भी अहम

सऊदी अरब भी इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। रियाद ने गाजा और फिलिस्तीन के मुद्दे पर लगातार फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना और दो राष्ट्र समाधान का समर्थन किया है।

सऊदी अरब और इजरायल के बीच संभावित सामान्य संबंधों को लेकर पहले भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा होती रही है। लेकिन गाजा युद्ध ने इस प्रक्रिया को जटिल बना दिया।

सऊदी अरब के लिए तुर्की और पाकिस्तान के साथ सुरक्षा सहयोग एक अलग मुद्दा है। इजरायल के साथ संभावित संबंध और अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी भी उसके लिए महत्वपूर्ण हैं।

इसलिए यदि तुर्की और इजरायल के बीच तनाव युद्ध तक पहुंचता है, तो सऊदी अरब के लिए सीधा सैन्य पक्ष चुनना आसान फैसला नहीं होगा।

गाजा बना टकराव का सबसे बड़ा कारण

तुर्की और इजरायल के बीच मौजूदा तनाव की सबसे बड़ी वजह गाजा युद्ध है। अंकारा इजरायल की सैन्य कार्रवाई का लगातार विरोध करता रहा है।

तुर्की का आरोप है कि गाजा में आम नागरिकों को भारी नुकसान पहुंचा है। इजरायल दूसरी ओर हमास के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई को सुरक्षा के लिहाज से जरूरी बताता है।

यही अंतर दोनों देशों के बीच राजनीतिक दूरी को लगातार बढ़ा रहा है।

गाजा की ओर जाने वाले सहायता जहाजों को रोकने की घटनाओं ने भी विवाद को बढ़ाया है। तुर्की ने इन घटनाओं की जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही है।

तुर्की के न्याय मंत्री का कहना है कि फिलिस्तीनियों के खिलाफ कथित अपराधों पर चुप नहीं रहा जा सकता।

क्या तुर्की और इजरायल के बीच युद्ध संभव है?

फिलहाल सीधे युद्ध की संभावना को लेकर कोई निश्चित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। दोनों देशों के बीच तनाव जरूर गंभीर है। लेकिन दोनों के पास सीधे सैन्य टकराव से बचने के भी कई कारण हैं।

तुर्की नाटो का सदस्य है। इजरायल अमेरिका का प्रमुख सहयोगी है। ऐसे में दोनों के बीच युद्ध का असर केवल अंकारा और तेल अवीव तक सीमित नहीं रहेगा।

इसके अलावा तुर्की और इजरायल के बीच सीधा युद्ध पूरे मध्य पूर्व को प्रभावित कर सकता है। सीरिया, ईरान, लेबनान, खाड़ी क्षेत्र और पूर्वी भूमध्यसागर की स्थिति भी तेजी से बदल सकती है।

सबसे बड़ा जोखिम गलत आकलन का है। किसी घटना, सैन्य कार्रवाई या समुद्री टकराव के बाद स्थिति अचानक बिगड़ सकती है।

अभी युद्ध से ज्यादा बढ़ रहा है राजनीतिक टकराव

मौजूदा स्थिति को देखें तो तुर्की और इजरायल के बीच राजनीतिक और कूटनीतिक टकराव अपने उच्च स्तर पर है। नेतन्याहू के खिलाफ तुर्की की कानूनी कार्रवाई, एर्दोगन के तीखे बयान और इजरायल की प्रतिक्रिया ने माहौल गर्म कर दिया है।

लेकिन इसे तत्काल युद्ध की शुरुआत मानना सही नहीं होगा।

तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच बढ़ता सुरक्षा सहयोग जरूर क्षेत्रीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण है। अगर यह सहयोग आगे बढ़ता है, तो पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन पर इसका असर पड़ सकता है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि गाजा युद्ध के बाद क्षेत्रीय गठबंधन किस दिशा में जाते हैं। यदि तुर्की और इजरायल का टकराव आगे बढ़ता है, तो पाकिस्तान और सऊदी अरब की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।

AEO के लिए सीधे सवाल और जवाब

क्या तुर्की और इजरायल के बीच युद्ध हो सकता है?
दोनों देशों के बीच तनाव काफी बढ़ गया है। लेकिन फिलहाल सीधे युद्ध की भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी। राजनीतिक बयानबाजी और सैन्य युद्ध के बीच बड़ा अंतर है।

तुर्की और इजरायल के बीच तनाव की मुख्य वजह क्या है?
गाजा युद्ध इसका सबसे बड़ा कारण है। तुर्की इजरायल की गाजा में सैन्य कार्रवाई का कड़ा विरोध करता है।

तुर्की ने नेतन्याहू के खिलाफ क्या कार्रवाई की है?
तुर्की ने गाजा से जुड़े कथित अपराधों को लेकर नेतन्याहू और अन्य इजराइली लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही है।

इजरायल ने एर्दोगन को क्या कहा है?
इजरायल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने एर्दोगन को ‘यहूदी विरोधी तानाशाह’ कहा है और तुर्की की क्षेत्रीय नीतियों की आलोचना की है।

क्या पाकिस्तान तुर्की के साथ इजरायल के खिलाफ युद्ध करेगा?
अभी ऐसा कोई निश्चित आधार नहीं है। पाकिस्तान और तुर्की के करीबी रक्षा संबंध जरूर हैं, लेकिन युद्ध में शामिल होने का फैसला अलग राजनीतिक और रणनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

क्या सऊदी अरब तुर्की का साथ देगा?
सऊदी अरब और तुर्की के बीच संबंध महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इजरायल के साथ संभावित सैन्य टकराव की स्थिति में रियाद का फैसला उसकी अपनी क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय रणनीति पर निर्भर करेगा।

क्या तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब का गठबंधन ‘इस्लामिक नाटो’ है?
इस नाम का इस्तेमाल राजनीतिक और मीडिया चर्चाओं में किया जा रहा है। इसे नाटो जैसा औपचारिक सैन्य गठबंधन मानना अभी उचित नहीं है।

क्या तुर्की इजरायल को ईरान जैसी चुनौती दे सकता है?
तुर्की की सैन्य क्षमता और रणनीतिक स्थिति मजबूत है, लेकिन तुर्की और ईरान की परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए दोनों देशों की तुलना सीधे तौर पर नहीं की जा सकती।

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