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अमेरिकी थिंक टैंक का दुष्प्रचार, ईरान की सत्ता में बड़ी दरार

तेहरान

अमेरिकी थिंक टैंक दुष्प्रचार का रहा है कि ईरान की सत्ता पर पिछले 47 वर्षों से काबिज इस्लामिक व्यवस्था अब अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। वाशिंगटन स्थित थिंक-टैंक ‘इंस्टिट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ वॉर’ (ISW) की ताजा रिपोर्ट ने ईरान के भीतर मची भीषण खलबली का खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार भारी आर्थिक दबाव, अंतरराष्ट्रीय नाकेबंदी और जनता के गुस्से ने ईरान के नेतृत्व को दो हिस्सों में बांट दिया है। हालात इतने खराब हैं कि अब सत्ता के गलियारों में खुलेआम जासूसी के आरोप लग रहे हैं और बड़े अधिकारियों को पदों से हटाया जा रहा है।

ईरान में इस समय ‘अल्ट्रा-हार्डलाइनर्स’ और ‘प्रैग्मेटिस्ट’ (व्यावहारिक गुट) के बीच वर्चस्व की जंग छिड़ी है। एक तरफ आईआरजीसी (IRGC) के कमांडर मेजर जनरल अहमद वाहिदी हैं जो किसी भी तरह के समझौते के सख्त खिलाफ हैं। दूसरी तरफ राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन और संसद अध्यक्ष मोहम्मद गालिबाफ जैसे नेता हैं जो देश की डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए कुछ नरमी बरतने के पक्ष में दिखते हैं। हालांकि मौजूदा संकेतों से साफ है कि नीतिगत फैसलों पर कट्टरपंथी वाहिदी का दबदबा बढ़ता जा रहा है।

ईरान ने हाल ही में युद्ध खत्म करने के लिए जो प्रस्ताव पेश किया था उसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक झटके में खारिज कर दिया। ट्रंप का कहना है कि यह प्रस्ताव नाकाफी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रस्ताव पूरी तरह से वाहिदी के गुट ने तैयार किया था। इसमें परमाणु कार्यक्रम पर बात करने से साफ इनकार कर दिया गया था। यह तेहरान की एक ऐसी कोशिश थी जिसमें वह अपनी शर्तों पर शांति चाहता था। लेकिन अमेरिका की वैश्विक नौसैनिक नाकेबंदी ने ईरान की इस रणनीति को फेल कर दिया है।

ईरान की सबसे बड़ी ताकत मानी जाने वाली ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) के भीतर भी अब फूट साफ नजर आने लगी है। रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि हालिया सैन्य नाकामियों और बड़े कमांडरों की मौत के बाद आईआरजीसी के भीतर एक-दूसरे पर शक किया जा रहा है। कमांडर अब अपने ही साथियों पर गद्दारी और जासूसी के आरोप लगा रहे हैं। आईआरजीसी की अलग-अलग शाखाओं जैसे कुद्स फोर्स और एयरोस्पेस के बीच संसाधनों को लेकर भी खींचतान शुरू हो गई है। हालत यह है कि कुछ फील्ड कमांडर अब बगावत की धमकी दे रहे हैं।

आर्थिक मोर्चे पर ईरान की कमर पूरी तरह टूट चुकी है। अमेरिकी नाकेबंदी की वजह से ईरान अपना तेल न तो स्टोर कर पा रहा है और न ही निर्यात। इंटरनेट पर लगी पाबंदी ने बेरोजगारी को और बढ़ा दिया है जिससे जनता में विद्रोह की आग सुलग रही है। देश की न्यायपालिका और संसद के बीच भी तकरार बढ़ गई है। संसद में सांसद अब मंत्रियों पर भ्रष्टाचार और राजनीतिक धोखेबाजी के आरोप लगा रहे हैं। ‘देबश टी’ जैसे बड़े घोटाले सामने आने के बाद जनता का भरोसा सरकार से पूरी तरह उठ गया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान का शासन ढहने की कगार पर है। उन्होंने ईरान की नौसेना और मिसाइल क्षमताओं के नष्ट होने की बात कही है। हालांकि ईरानी अधिकारी इन दावों को आधारहीन बता रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि ईरान अब रूस और चीन के साथ अपने रिश्तों को और गहरा करने की कोशिश कर रहा है ताकि इस संकट से निकल सके।

संसद अध्यक्ष गालिबाफ खुद को बातचीत की मेज पर बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन वाहिदी का गुट उन्हें किनारे करने में लगा है। ईरान के विदेश मंत्रालय और संयुक्त राष्ट्र में उनके दूतावास के बयानों में भी विरोधाभास दिख रहा है। दूतावास परमाणु वार्ता पर विचार करने की बात करता है तो विदेश मंत्री अब्बास अराक्छी दबाव में बातचीत से इनकार कर देते हैं। यह भ्रम इस बात का सबूत है कि तेहरान में अब कोई एक स्पष्ट नेतृत्व नहीं बचा है।

ईरान के सुरक्षा बल अब देश के भीतर बड़े दंगों की आशंका से डरे हुए हैं। महंगाई और बुनियादी सुविधाओं की कमी किसी भी वक्त बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकती है। विश्लेषकों का सवाल है कि क्या बढ़ती आर्थिक बदहाली मेजर जनरल वाहिदी को झुकने पर मजबूर करेगी? फिलहाल तो अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा रहा है। हवाई डेटा से पता चलता है कि अमेरिका लगातार भारी मात्रा में सैन्य साजो-सामान मध्य पूर्व में भेज रहा है। यह शांति की नहीं बल्कि किसी बड़ी सैन्य योजना की तैयारी लगती है। ट्रंप अपनी शर्तों पर अड़े हैं और ईरान के कट्टरपंथी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। यह इंतजार का खेल अब खतरनाक होता जा रहा है।