Uttar pradesh muslims success story : रिक्शेवाले की बेटी मुमताज़ बनी हॉकी स्टार
मुस्लिम नाउ ब्यूरो विशेष

लखनऊ की तंग गलियों से निकलकर भारत की जर्सी पहनना आसान नहीं होता। खासकर तब, जब घर में आठ भाई बहन हों, कमाई सीमित हो और हर दिन गुजारे की चिंता साथ चलती हो। लेकिन उत्तर प्रदेश की मुमताज़ ख़ान ने साबित कर दिया कि हालात चाहे जैसे हों, अगर इरादा मजबूत हो तो सपनों का रास्ता खुद बन जाता है।
भारत की उभरती हॉकी खिलाड़ी मुमताज़ ख़ान की कहानी सिर्फ खेल की कहानी नहीं है। यह संघर्ष, उम्मीद और मेहनत की ऐसी दास्तान है जो हर उस बेटी को हौसला देती है जो बड़े सपने देखने से डरती है।
लखनऊ के कैंट इलाके के एक छोटे से कमरे में पली बढ़ीं मुमताज़ का बचपन बेहद साधारण था। उनके पिता हफीज़ ख़ान कभी साइकिल रिक्शा चलाते थे। बाद में परिवार की जिम्मेदारियों को संभालने के लिए उन्होंने सब्ज़ी की छोटी दुकान शुरू की। बड़ा परिवार था। आमदनी कम थी। घर चलाना आसान नहीं था।
मुमताज़ और उनके भाई बहन भी छोटी उम्र से जिम्मेदारियां समझने लगे थे। स्कूल जाना, घर के काम करना और दुकान पर हाथ बंटाना रोजमर्रा का हिस्सा था। मुश्किलें बहुत थीं, लेकिन परिवार ने उम्मीद नहीं छोड़ी।
मुमताज़ की जिंदगी का मोड़ साल 2011 में आया। स्कूल की एक दौड़ प्रतियोगिता के दौरान हॉकी कोच नीलम सिद्दीकी की नजर उन पर पड़ी। तेज रफ्तार और फुर्ती देखकर कोच ने उनके पिता से मुलाकात की और कहा कि इस बच्ची को हॉकी खेलने दीजिए।
मुमताज़ आज उस पल को याद करते हुए कहती हैं, “मुझे तब यह भी नहीं पता था कि हॉकी क्या होती है। लेकिन जैसे ही हाथ में स्टिक पकड़ी, लगा कि शायद यही मेरा रास्ता है।”
यहीं से एक नया सफर शुरू हुआ। सुबह की प्रैक्टिस, घंटों पसीना और लगातार मेहनत। बाकी बच्चे जहां खेल को शौक समझते थे, वहीं मुमताज़ ने इसे अपना सपना बना लिया।
उनकी मेहनत का असर जल्द दिखने लगा। साल 2018 में ब्यूनस आयर्स यूथ ओलंपिक में उन्होंने 10 गोल दागकर सबका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया। भारत को रजत पदक दिलाने में उनकी अहम भूमिका रही। उनकी तेज़ी, सटीक खेल और गोल करने की क्षमता ने उन्हें भारतीय महिला हॉकी की सबसे होनहार फॉरवर्ड खिलाड़ियों में शामिल कर दिया।
आज 21 साल की मुमताज़ भारतीय जूनियर महिला हॉकी टीम का अहम हिस्सा हैं। दक्षिण अफ्रीका के पोटचेफस्ट्रूम में जूनियर वर्ल्ड कप में वह भारत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। लेकिन इस चमक के पीछे आज भी वही लड़की है जो अपने पिता के संघर्ष को नहीं भूलती।
वह कहती हैं, “ये अब्बू का सपना था कि मैं भारत के लिए खेलूं। मैं हर मैच में अपना सब कुछ देना चाहती हूं ताकि उन्हें मुझ पर गर्व हो।”
मुमताज़ की उपलब्धियों की सूची भी लंबी है। 2016 अंडर 18 एशिया कप में कांस्य पदक। 2018 सिक्स नेशन इनविटेशनल टूर्नामेंट में रजत। अंडर 21 इंटरनेशनल फोर नेशन्स टूर्नामेंट में स्वर्ण पदक। साल 2022 में उन्हें हॉकी इंडिया का ‘असुनता लकड़ा अवार्ड फॉर अपकमिंग प्लेयर ऑफ द ईयर’ भी मिला।

लेकिन इन तमाम सफलताओं के बीच उनका परिवार आज भी जमीन से जुड़ा हुआ है। बड़ी बहन फराह कहती हैं, “हमने बहुत मुश्किल दिन देखे हैं। लेकिन जब मुमताज़ को इंडिया की जर्सी में देखते हैं तो लगता है हमारी मेहनत रंग लाई।”
उनकी मां कैसर जहां की आंखों में भी बेटी के लिए गर्व साफ दिखता है। वह कहती हैं, “हमने बस बच्चों का साथ दिया। कभी नहीं सोचा था कि हमारी बेटी इतने बड़े मंच पर देश का नाम रोशन करेगी।”
मुमताज़ की कहानी उस बदलते भारत की तस्वीर है जहां प्रतिभा गरीबी की दीवारों में कैद नहीं रहती। जहां एक सब्ज़ी बेचने वाले की बेटी भी दुनिया के बड़े मैदानों में तिरंगा बुलंद कर सकती है।
उनकी मंजिल अभी बाकी है। सपना और बड़ा है। मुमताज़ मुस्कुराकर कहती हैं, “एक एक कदम आगे बढ़ना है। मेरा सपना है कि सीनियर टीम के लिए खेलूं और भारत को पदक दिलाऊं।”
लखनऊ की गलियों से निकली यह बेटी आज हजारों लड़कियों के लिए उम्मीद बन चुकी है। क्योंकि कुछ कहानियां सिर्फ जीती नहीं जातीं, इतिहास बन जाती हैं।

