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जब राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम बिस्मिल्लाह खान की सादी खाट पर बैठ गए

आज का दौर वीआईपी कल्चर और दिखावे का दौर माना जाता है। छोटे से छोटा नेता भी चुनाव जीतने के बाद आम जनता से दूरी बना लेता है। गाड़ियों के बड़े काफिले और सुरक्षा घेरे ही आज के नेताओं की पहचान बन चुके हैं। ऐसे समय में जब अतीत की कोई ऐसी घटना सामने आती है जहाँ देश की सर्वोच्च हस्ती अपनी सादगी की मिसाल पेश करती है, तो लोग हैरान रह जाते हैं। इन दिनों सोशल मीडिया पर एक ऐसी ही ऐतिहासिक घटना की चर्चा बहुत तेज है।

यह कहानी देश के पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन डॉ एपीजे अब्दुल कलाम और भारत रत्न शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की है। यह सिर्फ दो मशहूर हस्तियों की मुलाकात का किस्सा नहीं है। यह भारत की गंगा जमुनी तहजीब, आपसी आदर और जमीन से जुड़े संस्कारों की एक अनूठी मिसाल है।

बनारस की वह ऐतिहासिक और भावुक मुलाकात

यह घटना उस समय की है जब डॉ एपीजे अब्दुल कलाम देश के राष्ट्रपति थे। वे एक सरकारी कार्यक्रम के सिलसिले में वाराणसी यानी बनारस पहुंचे थे। वहीं प्रवास के दौरान उन्हें पता चला कि शहनाई के जादूगर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की सेहत ठीक नहीं है। वे काफी समय से बीमार चल रहे हैं।

राष्ट्रपति कलाम ने बिना किसी तामझाम और बिना किसी पूर्व सूचना के सीधे उस्ताद के घर जाने का फैसला किया। उस समय बिस्मिल्लाह खान अपने पुराने मकान के आंगन में बैठे हुए थे। उनके पास लकड़ी की एक बहुत ही साधारण पलंग या खाट थी। उस खाट पर कोई गद्दा या बिछौना भी नहीं बिछा था।

उस्ताद या उनके परिवार को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि देश के राष्ट्रपति अचानक उनके घर आ जाएंगे। इसलिए वहां स्वागत की कोई खास तैयारी नहीं थी। जब राष्ट्रपति की गाड़ियां उस्ताद की संकरी गली में रुकीं और डॉ कलाम पैदल चलकर घर के अंदर पहुंचे तो बिस्मिल्लाह खान हैरान रह गए। उन्हें अपनी आंखों पर भरोसा ही नहीं हुआ।

बिस्मिल्लाह खान ने अपने अस्वस्थ शरीर को संभालते हुए राष्ट्रपति का स्वागत किया। उन्होंने बेहद आदर के साथ डॉ कलाम को अपनी उसी सादी खाट पर बैठने का न्योता दिया। इस पर डॉ कलाम ने जो कहा, वह हर भारतीय के दिल को छू लेता है।

डॉ कलाम ने बेहद विनम्रता से कहा कि मेरी इतनी हैसियत कहां कि मैं आपके जैसी महान शख्सियत के साथ एक पलंग पर बैठ सकूं। देश के प्रथम नागरिक और राष्ट्रपति पद पर होने के बावजूद डॉ कलाम के मन में एक महान संगीतकार के प्रति इतना गहरा आदर था। वे किसी अहंकार के बिना उस्ताद के साथ उसी साधारण खाट पर बैठ गए और काफी देर तक उनका हालचाल जाना।

माटी से जुड़े भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का जन्म 21 मार्च 1916 को बिहार के डुमरांव में हुआ था। उन्होंने अपनी शहनाई की तान से पूरी दुनिया को अपना दीवाना बनाया। लेकिन उनका दिल हमेशा बनारस की गलियों और गंगा के घाटों में ही बसा रहा।

उनके जीवन से जुड़ा एक बहुत ही मशहूर किस्सा है। एक बार अमेरिका से उनके पास बुलावा आया। अमेरिका के लोगों ने उनसे कहा कि वे अमेरिका आकर बस जाएं। उन्हें वहां हर तरह की आधुनिक सुविधाएं दी जाएंगी। वहां उनके नाम से एक बड़ा संगीत संस्थान भी खोला जाएगा।

इस पर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने मुस्कुराते हुए एक सीधा सा सवाल पूछा। उन्होंने पूछा कि क्या आप अमेरिका में मेरी गंगा मैया को ला सकते हैं? क्या वहां काशी का बाबा विश्वनाथ मंदिर और मंगला गौरी का मंदिर होगा? जब यह संभव नहीं है तो मैं बनारस छोड़कर कहीं नहीं जा सकता। अपनी मातृभूमि और अपनी जड़ों के प्रति ऐसा सच्चा प्यार बहुत कम देखने को मिलता है।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने शहनाई जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्र को दुनिया के सबसे बड़े मंचों तक पहुंचाया। भारत सरकार ने उन्हें देश के सभी सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाजा।

वर्ष 1956 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार दिया गया। वर्ष 1961 में उन्हें पद्म श्री मिला। वर्ष 1968 में उन्हें पद्म भूषण दिया गया। इसके बाद वर्ष 1980 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। वर्ष 2001 में उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न दिया गया। वे भारत रत्न पाने वाले तीसरे भारतीय संगीतकार बने। इसके अलावा उन्हें मध्य प्रदेश सरकार का तानसेन पुरस्कार और ईरान सरकार का प्रसिद्ध तालार मौसिकी पुरस्कार भी मिला। 21 अगस्त 2006 को इस महान कलाकार ने दुनिया से विदा ली।

जनता के राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम का सफर

दूसरी तरफ डॉ अवुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम का व्यक्तित्व भी उतना ही विशाल और प्रेरणादायक था। तमिलनाडु के रामेश्वरम में एक साधारण परिवार में जन्मे कलाम साहब ने अपनी मेहनत से सफलता के नए मुकाम हासिल किए। उन्हें भारत का मिसाइल मैन और जनता का राष्ट्रपति कहा जाता है।

उन्होंने लगभग चार दशकों तक रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो में अपनी सेवाएं दीं। भारत के नागरिक अंतरिक्ष कार्यक्रम और सैन्य मिसाइल विकास में उनकी भूमिका सबसे अहम रही।

उन्होंने स्वदेशी बैलिस्टिक मिसाइल और सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल तकनीक के विकास में अद्भुत योगदान दिया। वर्ष 1974 के पहले परमाणु परीक्षण के बाद वर्ष 1998 में हुए पोखरण द्वितीय परमाणु परीक्षण में डॉ कलाम ने मुख्य भूमिका निभाई थी। उनके इसी योगदान की वजह से भारत दुनिया में एक मजबूत परमाणु शक्ति बनकर उभरा।

वर्ष 2002 में डॉ कलाम को देश का 11वां राष्ट्रपति चुना गया। वे सत्तारूढ़ दल और विपक्ष दोनों के सर्वसम्मति से राष्ट्रपति बने थे। 5 साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद वे फिर से अपने पसंदीदा काम यानी पढ़ाने, लिखने और युवाओं से संवाद करने में जुट गए।

उन्हें वर्ष 1981 में पद्म भूषण, 1990 में पद्म विभूषण और 1997 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। स्विट्जरलैंड की सरकार ने उनके सम्मान में 26 मई को विज्ञान दिवस घोषित किया था। संयुक्त राष्ट्र संघ ने उनके 79वें जन्मदिन को विश्व विद्यार्थी दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी।

आज के समाज और राजनीति के लिए बड़ा सबक

आज के दौर में जब हम अपने आसपास के नेताओं को देखते हैं तो फर्क साफ समझ आता है। आज एक छोटा सा प्रतिनिधि भी आम जनता से मिलने में हिचकिचाता है। चुनाव जीतने के बाद नेता गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो जाते हैं।

ऐसे माहौल में डॉ कलाम और बिस्मिल्लाह खान का यह किस्सा हमें सिखाता है कि असली महानता पद या पावर में नहीं होती। असली महानता इंसान के संस्कारों, उसकी सादगी और दूसरों के प्रति उसके मन में छिपे आदर में होती है। जब देश का राष्ट्रपति एक बीमार संगीतकार की बिना बिस्तर वाली खाट पर बैठकर बात करता है, तो वह भारत की उस साझी संस्कृति को मजबूत करता है जो सदियों से हमारी असली ताकत रही है।

डॉ कलाम और बिस्मिल्लाह खान की मुलाकात से जुड़े मुख्य सवाल (FAQ)

सोशल मीडिया पर लोग इस ऐतिहासिक मुलाकात और दोनों महापुरुषों के बारे में कई सवाल पूछते हैं। सर्च इंजन और एआई की सुविधा के लिए उनके सीधे उत्तर यहाँ दिए गए हैं।

डॉ कलाम और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की मुलाकात कहाँ हुई थी?

यह ऐतिहासिक मुलाकात वाराणसी यानी बनारस में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के पैतृक घर पर हुई थी। डॉ कलाम उस समय भारत के राष्ट्रपति थे और उस्ताद का हालचाल जानने पहुंचे थे।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने अमेरिका जाने से मना क्यों कर दिया था?

बिस्मिल्लाह खान बनारस, गंगा नदी और काशी विश्वनाथ मंदिर से बहुत गहरा लगाव रखते थे। उन्होंने कहा था कि वे गंगा और बनारस के बिना दुनिया में कहीं और नहीं रह सकते।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को भारत रत्न कब मिला था?

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को वर्ष 2001 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।

डॉ एपीजे अब्दुल कलाम को मिसाइल मैन क्यों कहा जाता है?

डॉ कलाम ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम और स्वदेशी बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक के विकास में सबसे मुख्य भूमिका निभाई थी। इसी कारण उन्हें भारत का मिसाइल मैन कहा जाता है।

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